Monday, July 25, 2011

मेलंकलिया: गुमनाम

भुट्टे का हंसता खेत और धूप में दमकती एक लाल पगडंडी, कसमसाते रिक्शे के हैंडिल बंधे लाउडस्पीकर पर चीखती लता ताई, ‘आ आ भी जा, रात ढलने लगी दिल मचलने’ के पीछे भागते भहराते, नाक पोंछते सस्ते पोस्टरों पर दिल फोड़ते बच्चे, बबीता का अन्नोइंग गुस्सा नंदा की बुड़बक हंसी, और ऐसी ही जाने कितनी तो राखसनी यादें झुलसी स्मृतियों के गांव होंगे, जहां जब-तब अचानक घिसी बैटरी का उमेंठने, बजने लगेगा साईरन, और समय की धड़धड़ाती छीन में उसी तेज़ी से फिर एकदम फुस्स जवाब भी दिये जाएगा, सिहरते सर्द अंधेरे गहरे कुएं में पानी कहीं कांप जाता होगा, पनियाये तेल के जोर पर एक बिचारा कमज़ोर लालटेन कभी बुझी आहों के बीच टिमटिमाता, दिल के काईघने अंधेरे ‘यह बेहया कौन क्यों चला आता?’ का मुंहछुपाये गाना अश्लील फुसफुसाते.

तुम साथ होगे, होगी कभी तारों भरी रात का एक लतीफ़ा हमारे बीच डोलता, खिलता खेलता, गुमनाम रातों में इक ज़रा से नेह का तेल सींझता, कुलजमा अढ़ाई पलों के छौंक की तीख़ी झांस, चित्त चमकाये जाता पलकें जलने लगतीं, मगर उसके बाद फिर ख़ौफनाक़ तेज़ी से सूना सन्नाटा घिरा भी तो आता, देर तक सूने पल्ले शोरिल बजते, कोई मछली सूनी आंखों चुपचाप तकती लम्‍बी सारी रात जगती. बेतरह झुंझलाया मैं उसके बाद याद करने में माथा पटकता कि क्या है उस गांव का नाम बहुत वर्षों पहले जहां से कभी टीन की पेटी लेकर निकला था, मकान, गली नंबर, शहर की तीन सड़कें बारह दीवारों और वर्चुअल लाइटबीमों के इशारों में घिरा रोज़-रोज़ कहां कितना चुकता रीतता, बहुत वर्षों पहले तारों भरी रात का वह कौन एक सच्चीमुच्ची का झुलसता तारा था..

3 comments:

  1. @दिल के काईघने अंधेरे ‘यह बेहया कौन क्यों चला आता?’

    अनुरित्त प्रशन...


    @बहुत वर्षों पहले तारों भरी रात का वह कौन एक सच्चीमुच्ची का झुलसता तारा था..

    था के नहीं..... कुछ याद नहीं..... उ चमकता था... या फिर झुलसता था..

    हां तारा था.

    पी एस - हमेशा की तरह

    ReplyDelete
  2. आपको पढना मानो...किसी अलग दुनिया में विचरण करना ....

    ReplyDelete
  3. झुलसी स्मृतियों के गांव जब रोजगार के लैंड-एक्विजिसन-एक्ट के पेट मे चले जाँय तो लता ताईजी की मनुहार कहां तक जाये..ग्लोबलाइजेसन के कुएं मे कितने सच्ची-मुच्ची के तारे टूट कर गरक हुए जाते हैं कि आसमान खंडहर की तरह भांय-भांय करे नहीए थकता..मछली की सूनी आंखें अब ओवेन मे पड़ी तारनहार कश्टमर के इंतजार मे सिंझी जाती है अब..यादों के अलाव का धुंआ भी मुई सिविलाइजेसन के स्मोक-डिटेक्टर के डर से तड़ीपार हुआ रहता है..अब कब आयेगी रात जाने..

    ReplyDelete