Friday, July 29, 2011

कबीता, ओह..

गोड़ हिलाते गाल बजाते हुए
दिल की सड़ंगी के तार, टिनियाते हुए
तकिये के पिछुये लिये जेर्जी चन्द्रहास
गाले उंगली गड़ाये, सोचे चंदा आकाश
खिल्ल-खिल्ल खिल लूंगा, तड़ देना
कबीता लिख दूंगा..

भोला घबरायेंगे, बैजू राहे कतरायेंगे
मौसा अचकचाये सिर नवाये, टोहायेंगे,
’तुम लिक्खे हो, अच्छा? अरे? मगर, काहे?’
कोंहड़े की तरकारी पे सब्बे खिल उट्ठेंगे
मैं नहीं लिखूंगा कोंहड़ा, टिला रहूंगा
चन्द्रहास परिहास की कबीतई में खिला, रहूंगा.

1 comment:

  1. गाले उंगली गड़ाये, सोचे चंदा आकाश
    ***
    कबीता चलती रहे जैसे चलती है धुक धुक चलती सांस!

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