Wednesday, August 31, 2011

तीन बहनें, चेख़ोव की नहीं

नाटकीयता में दौड़ी आकर टीना धम्‍म से पलंग से पर गिरी है. हाथ में मुड़ी-तुड़ी पियराये कागज़ की एक पुरानी किताब. होंठों पर राज़भरी मुस्‍कराहट. टीना से आठ साल बड़ी बीना कनखियों से देखकर मुंह फेर लेती है. पलंग के सिरहाने पीठ टिकाये वह क्‍या तो ज़रूरी कुछ सोच रही थी, छोटी के ड्रामे ने सब क्रम बिगाड़ दिया चेहरे पर ऐसा कुछ भाव. चालीस की देहरी में अकेली, चुपचाप, खाली-खाली (ओह, कितना खाली-खाली!) पैर धरती बीना को वैसे भी नाटकीयता से कोफ्त होती है, थोड़ी देर में सर दर्द करने लगता है. और तो आज यूं भी (दरअसल कल शाम से ही) बरसात की झड़ी लगी हुई है. रसोई में घुसते ही भूख मर जाती है (कितना अंधेरा रहता है हमारी रसोई में, क्‍यों रहता है इतना अंधेरा? बरसात में सभी घरों की रसोइयों में ऐसा ही अंधेरा रहता है? फिर आती है क्‍यों बरसात?). खिड़की पर परदों को पूरी तरह से खींचे नहीं रख सकते. खींचो तो कमरे में अजीब सी महक भर जाती है. और जब से नीना वाले कमरे में सामने की दीवार पर बढ़ी सीलन के फूले चकत्‍ते फूट आये हैं, टीना भाग-भागकर उसके कमरे में चली आती है. इतना बड़ा सायं-सायं करता घर है, ऐसे घर में भी, घंटे भर अकेला रहना मुश्किल!

- अब क्‍या हुआ? जवाब जानने की अनिच्‍छा से बीना पूछती है.

- पहले मेरे हाथ में ये क्‍या किताब है, बताओ!

- नीला बाबू का नाटक है? तू पहले इतना चहकना बंद कर, इट्स सो इरिटेटिंग!

- रॉंग. टेन्सी‍ जी की ‘गिलास मंजरी’ है, तुमने पढ़ा है, दीदी? प्‍लीज़, पढ़ो, इतनी उदासी है, इतनी उदासी कि तुम्‍हारा दिल खुश हो जाये! आनंद आ गया, सच्‍ची!

- रहो आनंद में. मुझे नहीं चाहिए. मैं ऐसी ही खुश हूं.

- ठीक है, मत पढ़ो. अट्ठाइस की टीना सर मोड़कर उसे दीदी के घुटनों पर गिराती, चहकती बोली- वैसे भी तुम्‍हें उदास होने की क्‍यों ज़रूरत है. ऐसा क्‍यों नहीं करते, दीदी, चलो, छाता लेकर नीचे ढलान वाली सड़क तक टहल आते हैं!

- वो भला क्‍यों? बीना को बात-बेबात छोटी का एक्‍साइटेबल होना एकदम भी अच्‍छा नहीं लगता.

- क्‍या, दीदी, थोड़ी देर घर से बाहर निकलोगी, नथुनों में ताज़ी नम हवा जाएगी, और तुम्‍हारा मन करेगा तो ‘पॉम-पॉम’ में ठहरकर हम एक आइसक्रीम भी खा सकते हैं!

- तुम्‍हीं जाकर खाओ आइसक्रीम. मेरा सर दुख रहा है, प्‍लीज़, लेट मी बी. टीना का सर एक ओर हटाकर रखते हुए बीना पलंग से उठ खड़ी हुई. परदे के नज़दीक जाकर रौशनी की ज़रा सी ओट से बाहर झांका, फिर खिन्‍न बेमन टहलती वापस पलंग के पैताने बैठ गई, एक तकिया खींचकर गोद में रखा और छोटी से बोली- अपनी उम्र वाला खोजकर कोई किसी से तू प्रेम-व्रेम करती, मुझ बूढ़ी के पीछे तू अपना समय खराब करती है, व्‍हाई, छोटी? कोई है नहीं तेरी निगाह में?

टीना के चेहरे पर इतनी देर से मुस्‍कराहट बनी थी, बड़ी बहन के सवाल ने उसे जैसे सोख्‍ता-सा सोख लिया. भावप्रवण आंखों में अन्‍यमनस्‍कता के तार खिंच गए, मुश्किल से धीमी आवाज़ बोली- हो सकता है मैं औरों की निगाह में न पड़ती होऊं.

बीना का दिल बैठ गया. प्‍यार से छोटी का गाल हाथ में लेकर बोली- नॉनसेंस! पूरे सांझनपुर में कितनी लड़कियां हैं तेरी तरह?

- नॉट अ सिंगल वन, मुरझाई हंसी हंसती टीना ने जवाब दिया, मुझसे पांच साल पहले सबकी शादी हो गई, सब अब बच्‍चों की मांएं हैं!

- शट अप! आज के ज़माने में कोई उम्र देखता है? इंटेलिजेंस से जज करते हैं. और तू इतनी फुल ऑफ लाइफ है! तेरा और नीना दोनों का हिसाब मुझे समझ नहीं आता, रियली, छोटी!

- नीना दी ने तो तय कर लिया है शादी नहीं करेंगी! कोई घोड़ी पर आकर प्रोपोज़ करेगा तो भी नहीं, जल-विभाग की क्‍लर्की में जितना जैसे बनेगा करेंगी, बट दैट्स इट.

- नॉनसेंस. ये सब बकवास उसने तुझसे कहा है?

***

नीना रोज़ सात से पहले घर लौट आती है आज आठ के बाद लौटी है. रात के खाने में टीना का हाथ बंटाती वहीं रसोई से बीना आवाज़ लगाती है,

- नीना, सुन रही है? तुम्‍हारे ऑफिस में वो जो साहनी है तू उससे शादी क्‍यों नहीं कर लेती?

नीना नहाकर बदले कपड़ों में बैठक के सोफे पर आकर ढेर हो गई है. थोड़ी देर बाद एक पैर से स्‍टूल खींचकर उस पर दोनों एड़ि‍यां जमाती है.

बीना- क्‍यों? मुझे तो अच्‍छा ही लगता है. ज्‍यादा बकबक की आदत भी नहीं.

आंखों को पंजों से मूदकर नीना जवाब देती है- फिर आप ही कर लो उससे शादी.

- फिर हमलोग तब साहनी की साली हो जाएंगी, नहीं, नीना दी? साली होने के ख़याल से टीना को इतनी हंसी आती है कि हाथ से सब्‍जी का कलछुल छूटकर फर्श पर गिर जाता है. बीना हाथ का आटा झाड़ती, पैर पटकती रसोई से बाहर निकल आती है.

बीना- तुम लोगों से एक सिंपल बात करना संभव नहीं. हर चीज़ मज़ाक हो जाती है! खाओ तुम लोग, मेरा मन नहीं, मेरे सर में दर्द हो रहा है!

***

शादी की बात नीना को मज़ाक लगती है. एक वक्‍त था जब नहीं लगती थी. मगर तब बुआ और पापा दोनों ज़ि‍न्‍दा थे, और चौंतीसवें से पैर निकालकर पैंतीसवें में जाने से वो बहुत पहले का किस्‍सा था. तब नीना जवान थी! एक जगह से उठकर ज़रा दूरी के दरमियान जाते में भी उसे महसूस होता कितनी जवान है वह. तब किस हुमस के साथ प्रेम करना चाहती थी वह, और उसी अधिकार-बोध से प्रेम की कामना करती थी. बिछौने में पैर से चादर एक ओर फेंककर उनींदे में बीना का कंधा झिंझोड़कर उसे जगा देती, उससे ज़ि‍रह करने लगती- दीदी, तुम दिल्‍ली क्‍यों नहीं चली चलतीं, इस तरह यहां समय गुजारते रहने में क्‍या तुक है, दीदी? आई नो शरद भैया के यहां हमलोग बोझ होंगे, मगर तो क्‍या? थोड़े दिन होंगे, रहने का फिर कहीं इंतज़ाम निकल आएगा, तुम हाथ-पैर चलाओगी, कहीं किसी कॉलेज में तो कुछ निकल ही आएगा, एडहॉक ही सही, दीदी, प्‍लीज़, लाइफ में सॉलिड कुछ होगा, इस सांझनपुर में मैं तुम्‍हें रहने नहीं दूंगी, हमारे जीवन में कुछ बड़ा होना है, विराट, यस?

एक बार किसी तरह कांख-कूंखकर बीना ने दिल्‍ली निकलने का मन बनाया भी था, मगर तभी पापा के अटैक हुआ था, तब तक बुआ भी नहीं बची थीं (बचीं भी होतीं तो सिर्फ़ उनके सहारे दीदी पापा को छोड़कर दिल्‍ली निकल जाती, असंभव), दिल्‍ली बिना आवाज़ कैंसल हुआ. नीना की शादी की एक कमज़ोर सी कोशिश हुई, और बनते-बनते बात फिर उतनी ही आसानी से टूट भी गया (उड़ती सी खबर उन तक पहुंची थी कि लड़के का यूं भी मनीषा नाम की किसी लड़की से अफ़ेयर चल रहा था, जयपुर पढ़ाई करने गई थी, शादी की बात की भनक मिलते ही भागी आई और लड़काजान के बड़े करम किए!). दुबारा शादी-प्रसंग नहीं उठा. न नीना ने उठने दिया. जल विभाग की क्‍लर्की से बचे समय में पापा के पीछे आधी-आधी रात जगी रहती. उनके तलुए सहलाती, बालों में तेल की मालिश करती. वो हाथ झटकते तो डांटकर उन्‍हें चुप करा देती. सुबह-सुबह टीना को उठाकर कहती चल, पापा के कमरे में बैठकर उनको कोई गाना सुना!

फिर आनंद सरुप. इंश्‍युरेंस की कोई शिकायत लेकर पानीटंकी थाने गई थी, वहीं मुलाकात हुई. सज्‍जन और मितभाषी. ऐसे पुलिसवाले से मिलकर नीना को ताज्‍जुब हुआ था. इंश्‍युरेंस का कन्‍फ्यूज़न मगर फिर जल्‍दी ही सुलट गया तो एक बार दुबारा शुक्रिया कहने थाना गई, फिर बीच-बीच में मिलना. जानकर अच्‍छा लगा कि शिक्षित भी हैं. आठ-नौ महीनों की पहचान के बाद खबर हुई कि शादीशुदा हैं, एक तीन साल की बच्‍ची भी है. नीना को काठ मार गया. पुलिसवाले को बहुत जलील किया, नाखून से गाल नोंचा, गालियां दीं, कमरे में थूककर निकल आई थी. मगर मन शांत नहीं हुआ, सज्‍जन पुरुष से मिलना बंद नहीं कर सकी थी, वो तो सरुप साहब का खुद ही आंगनडेरा तबादला हुआ तब जाकर कहीं उस कहानी पर परदा गिरा.

***

रात के ढाईएक बजे नीना पानी पीने के लिए उठी तो दिखा दीदी के कमरे की बत्‍ती जल रही है, आंखों पर हाथ धरे उठंगी बैठी हैं. पानी का गिलास हाथ में थामे नीना वापस लौटी, कमरे में झांककर बोली- सरदर्द कमा?

बीना ने हाथ के इशारे से उसे भीतर बुलाया, अपने नज़दीक बिठाकर बोली- मेरी बात तुझे ऐसी बुरी क्‍यों लग जाती है? तू सुखी रहे ऐसा सोचना मेरा गलत है? बोल.

हाथ का गिलास बाजू के स्‍टूल पर रखकर बहन के बगल लेटती नीना ने कहा- मैं सुखी हूं दीदी.

बीना दुलार से उसके सर पर हाथ फिराते हुए बोली- मालूम है, मगर थोड़ी और सुखी हो सकती थी, नहीं?

बहन से सटी नीना आंख मूंदकर बुदबुदाई- थोड़ा और सुख जैसा शायद सचमुच की दुनिया में कुछ होता नहीं दीदी, तुम बताओ, होता है?

***

तीनों बहनें चेख़ोव की ‘तीन बहनें’ नहीं थीं, मगर हो सकती थीं, जैसे जीवन में थोड़ा और सुख हो सकता, नहीं? ला, तारा ला, लारल्‍ला. कितना अच्‍छा होता मैं वॉयलिन बजाना जानता होता, या सितार ही. ज़्यादा नहीं तो थोड़ा ही, एकदम थोड़ा जितना ही?

Monday, August 22, 2011

सीढ़ियों पर..

हालांकि रोज़ का चढ़ना-उतरना था, तामकार के पैर सीढ़ि‍यों पर ढंग से नहीं पड़ रहे थे. जैसे मन में तरतीब नहीं बन रही थी. इतनी ज़रा देर में वह भूल चुका था कि आखिर ऐसी कौन ज़रुरत बन पड़ी थी जिसके दबाव में वह अचानक घर लौटा आया था. बीच दिन घर लौटकर कहीं उसने बड़ी गलती तो नहीं की? औरत तकिये पर उठंगी लेटी टीवी ताकती रहेगी, या पैर के नाखून काटती, उस चुपचाप के घरेलु संगत में तामकार क्‍या करता बैठा रहेगा? हो सकता है टीवी देखती थोड़ी देर बाद उसकी ओर पलटकर औरत उससे और तरह की बात छेड़ दे? घरेलुपन की आड़ में यूं ही तामकार के घुटने पर हाथ रख दे, उसके साथ बाहर कहीं घूम आने की ज़ि‍द करे? तामकार ने मन बनाना शुरु किया कि दरवाज़े से अंदर घुसते ही वह चीखकर औरत को खबरदार कर देगा कि आज शाम से घर में सब्‍जी बनाने की दरकार नहीं है. और रोज़-रोज़ वह रस्‍सी पर कपड़े सूखते देखने से थक गया है, डिटर्जेंट के पैसे और पानी क्‍या पेड़ पर उगते हैं? कई बार हुआ है कि तामकार की सुपरस्‍टोरों में अचानक नज़र गई और लोगों को उसने चार डिब्‍बे डिटर्जेंट, दो बोरी चावल की खरीदारी करते देखा और घबराकर एकदम से एक ओर हट गया है. ये कौन लोग हैं और कितना पैसा है इनके पास जो इतनी मात्रा में खरीदारी करते हैं. झोला-झोला फल, कौन खाता है इन्‍हें? कैसे? सीढ़ि‍यों पर एक बार फिर तामकार के पैर लड़खड़ा गए.

कोई बच्‍चा निर्ममता से पिपिहरी बजा रहा था. जालियों से बाहर लाई मुर्गी कसाई के हाथ में फड़फड़ा रही थी. लता मंगेशकर लीना चंदावरकर वाला गाना गा रही थी, ‘’जाने क्‍यों लोग मोहब्‍बत किया करते हैं,’’ और ऐसी ही दूसरी ऊटपटांग आवाज़ें. अंधेरी, संकरी सीढ़ि‍यों पर हारकर बैठते तामकार ने सोचा मुझे खबर नहीं, मगर आज ज़रूर किसी त्‍यौहार का दिन है! किसी बात की मुझे खबर क्‍यों नहीं रहती? कहां फंसा रहता है दिमाग? किसी छोटे स्‍टेशन के बाहर गुमटी पर बदरंग होता ‘’मेहबूब की मेंहदी’’ का पोस्‍टर आंखों के आगे घूम गया. ‘’गहरी चाल’’, ‘’बंधे हाथ’’ और राजेश खन्‍ना की ‘’मेरे जीवन साथी’’. नीचे के फ्लोर पर धड़ाम से कोई दरवाज़ा खुला. कोई बूढ़ी खखारी. तामकार ने उठने की कोशिश की मगर शरीर ने साथ नहीं दिया. सीले मोज़े के भीतर चींटियां चलती महसूस की, गरदन के ऊपर, बाईं कान के पीछे. बालों में धूल की किरकिराहट. आखिर इस हालत तक वह पहुंचा कैसे, सुबह तक तो सही था, साफ-सुथरा? इस तरह तो वह किसी सूरत में बची हुई चालीसेक सीढ़ि‍यां तय करने से रहा. उसे स्‍ट्रेचर की ज़रूरत है. या कोई गिलास भर पानी पिला दे. दरवाज़े के उधर जो वह स्‍त्री बैठी है, उसकी मां, औरत, बहन, जो भी, गिलास भर पानी लिये इतनी ज़रा-सी सीढ़ि‍यां उतरकर इस दुर्गम क्षण में उसे बचा लेने नहीं आ सकती? मगर तामकार को फिर अपनी कमज़ोरी, प्‍यास, ‘’गाइड’’ के देवानन्‍द के सूखे, पपड़ाये होंठों में जाकर उलझती लगी और यह सोचकर एकबारगी उसका मन बैठने लगा कि कुछ घंटों पहले, सुबह दरवाज़े, उस घर से बाहर निकलने के साथ ही वह अपने जीवन की सब उम्‍मीदों से भी बाहर निकल चुका है, और दुनिया की कोई ताक़त अब उसे उसके अंत से नहीं बचा सकेगी! मन में इस ख़याल के आते, और आकर एकदम से भीतर धंसते ही तामकार की पसलियों में एक ठंडी लहर दौड़ गई, भौं पर पसीने की बूंदें उभर आईं. पूरी जान से दीवार का सहारा लेकर उसने उठने की कोशिश की और भरभराकर वापस सीढ़ि‍यों पर बैठ गया.

तामकार ने मुंह खोलकर कुछ कहने की कोशिश की. शायद अपने अंत से पहले वह कुछ बातें साफ़ करके जाना चाहता था. लेकिन इसी बीच सूती की बदरंग साड़ी में कोई सांवली हड़ि‍यल बूढ़ी सामने चली आई. कोयले के इंजन से नहायी हवा में किसी गुमनाम हाल्‍ट पर ठहर गई पैसेंजर रेल पर चढ़ी बूढ़ी के हाथों में बासी पूड़ि‍यों और सूखे आलू का दोना था. अपने अकेलेपन की घबराहट में, संभवत: सिर्फ़ आश्‍वस्‍त होने की गरज से ही, उसने तामकार से उसका मुल्‍क पूछा था.

भौं पर की पसीने की बूंदें पोंछते तामकार ने तक़लीफ़ और कुछ शर्म से जवाब दिया था कि उसे अपने दादा या दादी किसी का भी नाम याद नहीं.. उसने तेज़ी से फिर माफ़ी मांगी, कि उसका दिमाग काम नहीं कर रहा. शायद थोड़ी देर में उसे याद पड़़े. तब संभवत: चालीस सीढ़ि‍यों के उधर दरवाज़े के पार बैठी स्‍त्री कौन है और तामकार से उसके क्‍या संबंध हैं का जवाब भी उसके माथे में साफ़ उभरकर आये.. फिर कुछ ठहरकर तामकार ने जवाब दिया कि उसका नाम महेश बिष्‍णु सरमा नहीं, न ही मिशा है, जैसाकि कुछ लोग उसके संबंध में गलतफ़हमी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं..

साठ के दशक के किसी बेमतलब शहर के किसी बदरंग मकान का छत था जिस पर हाथ में गुलेल थाम वह बच्‍चा चिड़ि‍यों के पीछे भाग रहा था. एक बेहया गोरैया थी अपना सर फूटने से बचाने के लिए कहीं भाग जाने की बजाय छत पर यहां से वहां उड़-उड़कर बैठ रही थी. पड़ोस की छत से स्‍लीवलेस ब्‍लाउज़ में श्‍लथ, एक भीमकाया अधेड़ महिला ने डांटकर बच्‍चे से सवाल किया वह किसका बेटा है, बच्‍चे ने जवाब देने की जगह अपने गुलेल का पत्‍थर दागा. यही आखिरी तस्‍वीर थी जो सीढ़ि‍यों पर भहराये गिरे मिशा की आंखों में कौंधकर अटक गई, उसके बाद वह फिर नहीं उठा.

(जारी)

Monday, August 15, 2011

कितने तो, छुटकन, काम निपटाने हैं..

कितने तो. कितने कितने कितने, आह्, कितने तो. काम, छुटकन, निपटाने हैं. तुम्हारे गोद में सर गिराके आंख मूंदनी नाक बजाना है. मुंदी आंखों सांस गिनते तुमसे तक़दीर पढ़वानी है, मन के महानगर के अरबों तुम्हें क़ि‍स्से सुनाने हैं. कान खुदवाना, गोड़़ दबवाना, गरदन के रोंओं पे हाथ फिरवाना है, तुमसे, ओह, कितने तो! धूल के बादल और सीलन-सागर में बाल्ज़ाक व बाख़ का ब बचाये रखना और पेत्रार्क व पिरमोद गंगुली का नेह दुलराये रखना, नाक से नाक सटाये तुम्हें तुमसे छुपाये रखना है, आह, कितने तो! हां, एक और, अम्मां को टहलाना है, बबुनी को कांधा चढ़ाना, मगर पहिले भीड़ में उनके ठिकाना पाना है, इंशा जी के साइकिल चढ़कर मोम्मद रफ़ी जी के गांव जाना है, आह्, कितने तो..

Thursday, August 4, 2011

घबराहट और मैं..

माफ़ कीजिए हो सकता है मैं आपको घबराया हुआ लगूं, जबकि सच्‍चाई में होऊंगा नहीं, तो इसे लेकर कृपया किसी तरह का मन में तनाव न पालें, मेरी घबराहट प्रकट व प्रच्‍छन्‍न्‍ा रुप से दीखे भी तो उसे लेकर उसे लेकर आश्‍वस्‍त रहें, राजी-खुशी, हंसते रहें, इतनी आपसे विनम्र विनती है, मेरी घबराहट घटाने में उससे मदद ही मिलेगी, हालांकि मैं उस तरह से घबराता कतई नहीं ही होऊंगा जैसा आप समझ रहे होंगे, फिर भी. कहने को एक बात कह रहा हूं. ऐसा कुछ अजीब भी नहीं, लोगों में विविध-विभिन्‍न विकार होते ही हैं, कोई एक पूरा मनुष्‍य कहां मिलता है? किसी महात्‍मा से अकेले में आंख से आंख मिलाकर पूछकर देखिए, देखिएगा महात्‍मा नज़र बचाकर शर्मिंदगी में क्‍या जवाब देते हैं! कि जो आंखों के देखे दिखता है वही सच नहीं होता. वही और उतना. सच की एक समूची दुनिया होती है. हमेशा प्रकट हो, हमारी पहचान में पड़े, ऐसा कहां होता है, हो पाता है? यही या ऐसा ही कुछ. वक्‍तव्‍य व मंतव्‍यों की ऐसी लबरी से अलग महात्‍मा में आप अन्‍य घालमेल भी पायेंगे. धीरज धरे देखना चाहें तो. असल दिक्‍कत यही है कि हमने दुनिया में और कुछ जो भी भले पा लिया है, धीरज से हाथ धो बैठे हैं. और इस तरह अंततोगत्‍वा इस समझ से भी कि धीरज के खो जाने के अनंतर हमारे अन्‍य कैसी भी प्राप्तियों का कोई कैसा भी अर्थ नहीं. स्‍वाभाविक है ऐसी प्रतीति से मनुष्‍य में घबराहट की उत्‍पत्ति होती है वह घबराया दिखता है, जैसे आप मुझे देखते हुए मेरी अन्‍य सारी लाक्षणिकताओं से ऊपर केवल मेरा घबराना लक्षित करने में उलझते जाते हैं, जबकि सच्‍चाई है जैसा मैंने पहले कहा भी, मेरी घबराहट मनुष्‍यगत लघु किंचित एक विकार मात्र है, जैसे कुछ लोग हैं किंचित लंगड़ाकर चलते हैं, कुछ खास तरीके से एक ओर को ज़रा पैर उठाकर, कुछों में गरदन एक तरफ गिराकर फोटो खिंचवाने की प्रवृति होती है तो कुछों में बेहयायी की हद तक दांत दिखाते रहकर फोटो उतरवाने की. हिंदी के अनकादमीय विज्ञ प्रबंधकार भगवान सिंह ने इतिहास की ललित पुस्‍तक लिखी भी है, अपने अपने राम’. समाज का यह स्‍पष्‍ट दायित्‍व बनता है कि वह सबको उनके निज के समझ (व असमंजस) के अंधेरों में उनकी आवश्‍यकता (व रुचिनरुप) अपना राम चुनने का हक़ दिलवा सके. राम की जगह कोई श्‍याम चुनना चाहे तो इसके लिए वह भी रामपंथी-सा ही उन्‍मुक्‍त व स्‍वतंत्र महसूस करे. हिन्‍दी फिल्‍मों के शीर्षक (व कथ्‍य) की तरह ‘सामर्थ्‍य और सीमा’ (लेखक: बीसी वर्मा) के बंधनों के जकड़ाव का अनुभव न करे. जैसे बिना घबराये- केवल अपनी ओर चढ़ी आपकी नज़रों में इशारा पाकर- मैं किंचित (व सांघातिक) घबराहट का तत्‍क्षण अनुभव करने लगता हूं!

जबकि वास्‍तविकता ऐसी कतई है नहीं. वह सिर्फ़ मेरे चेहरे का भाव भर है. जैसे राजेश खन्‍ना का हेयर-स्‍टाईल (व ऊटपटांग अभिनय) था, ‘परिचय’ में जितेंद्र का शिक्षित व सभ्‍य और ‘मेरे अपने’ में ‘कोई होता मेरा अपना’ गाते हुए श्‍याम (विनोद खन्‍ना) का दुखी दिखना था, उनका उनके जीवन की वास्‍तविक चिंताओं (व दुविधाओं) से दूर-दूर का भी संबंध नहीं. जैसे घबराहट से मेरा नहीं है. एकान्तिक व चिंतन के गहन-क्षणों में मैं कहां से एक समर जैकेट लहा लूं (किम्‍बा जापानी नवयौवना प्रेयसी) की सोचता हूं, या कसौनी में किसका कॉटेज कब्जिया लूं की सोचता भीतर ही भीतर खौलने लगता हूं, घबराहट की मेरे पास फुरसत नहीं होती. फुरसत होती ही है तो मैं सिमोन और श्‍यूस्‍टर को ईमेल पर ईमेल भेजकर हड़काते, डराते हुए कृतार्थ करता हूं कि मेरी अनलिखी पुस्‍तक पर बीस लाख का वह अडवांस वह कब भेज रहे हैं (“जब सचमुच किताब लिख ली जाएगी तब ही भेजोगे, हरामखोरो, तो तुम्‍हारे उस पैसे का मैं घेंवड़े का अचार डालूंगा, पाजियो? आर यू गाइस एस गुड पब्लिशर्स एस आई अम सम डंबऐस राइटर ऑर व्‍हॉट, अबे चिरकुटप्रसादो, इस खुशहाली, दलाली के समय में मेरे बीस लाख दांत में भींचे हो, छोड़ नहीं रहे, अबे शरम नहीं आती अपने को प्रकाशक, अगुवा धावक कहते हो?”), ईमेल इतना लंबा हुआ जाता है जितना लंबा जेम्‍स जॉयस के ‘यूलीसीस’ का अंतिम वाक्‍य भी न हुआ होता, थिरकते, सुलगते अपने नथुनों की आंच में मैं बारहवीं सिगरेट बाल लेता हूं, मगर चिड़चिड़ाता, गुस्‍साता, घबराता कहां हूं, नहीं हूं, वह सिर्फ़ आपकी पिटी हुई नज़रों को लगता है.

Wednesday, August 3, 2011

आह, एक अदद कविता के पीछे..

एक कवि का बयान..

...Ah, poems amount to so little when you write them too early in your life. You ought to wait and gather sense and sweetness for a whole lifetime, and a long one if possible, and then, at the very end, you might perhaps be able to write ten good lines. For poems are not, as people think, simply emotions (one has emotions early enough)—they are experiences. For the sake of a single poem, you must see many cities, many people and Things, you must understand animals, must feel how birds fly, and know the gesture which small flowers make when they open in the morning. You must be able to think back to streets in unknown neighborhoods, to unexpected encounters, and to partings you had long seen coming; to days of childhood whose mystery is still unexplained, to parents whom you had to hurt when they brought in a joy and you didn’t pick it up (it was a joy meant for somebody else—); to childhood illnesses that began so strangely with so many profound and difficult transformations, to days in quiet, restrained rooms and to mornings by the sea, to the sea itself, to seas, to nights of travel that rushed along high overhead and went flying with all the stars—and it is still not enough to be able to think of all that. You must have memories of many nights of love, each one different from all the others, memories of women screaming in labor, and of light, pale, sleeping girls who have just given birth and are closing again. But you must also have been beside the dying, must have sat beside the dead in the room with the open window and the scattered noises. And it is not yet enough to have memories. You must be able to forget them when they are many, and you must have the immense patience to wait until they return. For the memories themselves are not important. Only when they have changed into our very blood, into glance and gesture, and are nameless, no longer to be distinguished from ourselves—only then can it happen that in some very rare hour the first word of a poem arises in their midst and goes forth from them.
(The Notebooks of Malte Laurids Brigge” से, मूल जर्मन का अंग्रेजी रुपान्‍तर स्‍टीफन मिचेल. विन्‍टेज इंटरनेशनल से साभार)

Tuesday, August 2, 2011

मिशा: एक जीवन, बेतरतीब, संक्षिप्‍त (भारतीय सस्‍ता संस्‍करण)

सीढ़ि‍यों पर धूप वाली जगह आकर अभी मैंने चाकलेट की पन्‍नी खोली भी नहीं कि भानुप्रसाद चाकलेट के लिए हाथ मारने लगा. चाकलेट तेज़ी से ऊपर किये मैं बोली, पहले चाकलेट बोलो, भानुप्रसाद? और उसके बाद पिलीज़! कोई भी चीज मांगते समय पिलीज़ बोलते हैं तब जाके चाकलेट मिलता है, समझे? अब बोलो! ठीक है, पापा बोलो? चाकलेट खाना है कि नहीं?

भानुप्रसाद जोर-जोर से सांस की आवाज़ निकालता रहा, लेकिन बुद्धू चाकलेट का ‘च’ तक नहीं बोलेगा. पापा कहेगा ऐसी बात तो भूल ही जाओ. सीढ़ि‍यों पर फुदकता छत तक खेलने पहुंच जाता है, बरामदे या रसोई में चली आई मेंढक की पिछली टांग पकड़कर हवा में उठा देता है, भूले से मेरी नोट कापी उसके हाथ चढ़ी तो पेंसिल से कैसे उसका सत्‍यानाश करेगा आपको नहीं मालूम, या उसके सर के सामने के बालों पर कैंची चलाने के लिए उसे सैलून की कुर्सी पर बिठा के देखो ज़रा, इतना हल्‍ला करेगा कि सड़क पर रिक्‍शेवाले रिक्‍शा रोककर खड़ा हो जायें. अस्‍पताल में सुई लगवानी पड़े या घाव की मरहम-पट्टी के समय बीनू भी इतना शोर नहीं करता जितना भानुप्रसाद प्‍लेट में सिर्फ बैंगन देखकर करने लगता है!

‘क्‍यों हो तुम इतने बदमाश, भानुप्रसाद, बोलो?’ भानुप्रसाद मेरी बात का जवाब देने की जगह ‘मा, मा!’ करता मेरे हाथ से चाकलेट लेने की कोशिश करता है. मैं चाकलेट वाला हाथ ऊपर किये उससे गुस्‍से में कहती हूं, ‘तुम्‍हें शरम नहीं आती इतने बड़े होकर अभी तक चाकलेट नहीं बोल सकते? ठीक है, सिर्फ पापा बोलकर दिखाओ? पिलीज़, भानुप्रसाद?

भानुप्रसाद को समझा-समझाकर मैं थक जाती हूं, सच्‍ची. उससे कुछ भी कहने का फायदा नहीं. कोई भी बात कहनी हो उसके पास कहने के लिए सिर्फ वही एक चीज़ है- मा! आप एक लाख बार सिर पटकने के बाद भानुप्रसाद से कहो अब बोलो, भानुप्रसाद? तब भी बहुत सोचकर भानुप्रसाद सिर्फ ‘मां!’ ही कहेगा! और शरम तो इस लड़के को आती नहीं. बिना चड्डी पहने सड़क तक किसी साईकिल के पीछे दौड़ने चला जाता है. पूरे-पूरे दिन ऐसे ही बिना चड्डी के कीड़ों और मेंढकों के पीछे भागता रहता है. अभी भी बदमाश ने चड्डी नहीं ही पहनी है! मैं हारकर कहती हूं, ‘चड्डी पहनके आओ फिर चाकलेट पाओगे, पहनोगे ना?’ भानुप्रसाद बिना मेरी बात सुने चाकलेट की तरफ हाथ बढ़ाये चिल्‍लाता है, ‘मा!

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मेरे पापा का नाम है महेश बिष्‍णु सरमा. मीनाक्षी कहती है ‘है’ नहीं ‘था’ कहो. मैं गुस्‍से में मीनाक्षी के बगल से उठकर इरोम को देखती हूं, इरोम कुछ नहीं कहती. मैं तभी तय कर लेती हूं कि मुझे इस स्‍कूल में, मीनाक्षी और इरोम के पास दुबारा कभी नहीं आना.

पापा के मरने के बाद स्‍कूल जाने का मेरा एकदम मन नहीं करता. शुरु में दो-तीन बार मां हाथ में स्‍केल लेकर मुझ पर चीखी थी कि अभी कपड़े पहनकर तैयार हो नहीं तो मारते-मारते पीठ लाल कर दूंगी! उसके बाद धम्‍म से कुर्सी पर गिरके रोने लगी थी. प्रताप मुझे साईकिल के कैरियर पर बिठाकर आधे रास्‍ते तक स्‍कूल के गया भी था मगर मैं अचानक कैरियर से कूदकर सड़क के एक ओर खड़ी हो गई थी. सड़क के दूसरी ओर ज़रा आगे जाकर साईकिल रोककर प्रताप परेशान खड़ा मुझे घूरता रहा, फिर हम दोनों बिना कुछ बोले चुपचाप घर लौट आये थे.

रात पेट के बल जमीन पर लेटे ज्‍यॉमेट्री बाक्‍स में सर घुसाये बीनू ने कहा क्‍या करेगी फिर, हमेशा के लिए अब फिफ्थ क्‍लास में ही रहेगी? बीनू की बात का मैंने जवाब नहीं दिया लेकिन मन ही मन तय कर लिया है कि हां, अगर स्‍कूल नहीं जाकर मुझे हमेशा फिफ्थ क्‍लास में ही रहना है तो मैं रहूंगी फिफ्थ क्‍लास में! मुझे बीनू की तरह इंगलिश और गणित में नंबर लाने का शौक नहीं, न इरोम और मीनाक्षी से बात करने का है! मैं घर में रहकर भानुप्रसाद और मां की देखभाल करुंगी. आटा बनाना सीख लूंगी और चुपचाप रोटी बनाकर भानुप्रसाद को खिलाकर उसे पीछे वाले कमरे के बक्‍से पर सुला आऊंगी. वह रोटी के लिए हल्‍ला करता फिर मां को परेशान नहीं करेगा. भीतर से कमरा बंद किये मां फिर जितनी भी देर चाहे चैन से सोती रहेगी. मैं भी मां को परेशान नहीं करुंगी. मां कहेगी नहाई है तू? तो उसी समय जाकर नहा लूंगी. गरम पानी के लिए भी नहीं कहूंगी! अभी कुछ महीनों पहले तक प्रताप कितना हल्‍ला करता था कि हाई स्‍कूल के बाद उसे यहां नहीं रहना, वह जयपुर या दिल्‍ली जाकर पढ़ाई करेगा. मां धीमे से कहती उसके पैसे कहां से आएंगे तो रसोई के जंगले से चीखकर जवाब देता वो तुम सोचो, कहां से लाओगी पैसे, मैं क्‍या पूरे जीवन यहां बांस छीलता बैठा रहनेवाला हूं?

पापा की मौत के बाद देखो अब प्रताप सचमुच लकड़ी छीलने का ही काम कर रहा है. मतलब मकबूल चाचा की फर्नीचर की दुकान पर पाटटाइम नौकरी के लिए सुबह साढ़े आठ तक घर से निकल जाता है. उसके पहले बीनू की मदद से सबके लिए दाल, सब्‍जी और रोटी तैयार करता है. मैं एक कोने सोते भानुप्रसाद को गोद में लिये बैठी रहती हूं. जल्‍दी जब मैं रोटी बनाना सीख लूंगी फिर प्रताप को इस तरह भाग-भागकर काम करने की जरुरत नहीं रहेगी. जबकि भानुप्रसाद के सिवा रोटियों के लिए घर में अब कोई हल्‍ला भी नहीं करता. मां तो तीन-तीन दिन निकल जाते हैं रोटी की थाली की तरफ देखती भी नहीं. नींद में डूबी आंखें लिये प्रताप कहता है छोड़ दो, मां को परेशान मत करो, भूख लगेगी जब खाएगी अभी नहीं चाहती तो मत जोर डालो खाने के लिए.

कुछ दिनों पहले फतेहपुर से बड़े मामा आए थे. मकबूल चाचा की दुकान से प्रताप को अपने साथ लेकर लौटे थे. बीनू बीच स्‍कूल छोड़कर घर लौटा आया था. मामा ने प्रताप और बीनू की मदद से घर का सारा सामान बंधवाया. मैं भानुप्रसाद को साथ लेकर छत के पीछे वाली टंकी के पीछे जाकर छिप गई थी. मां ने अपने कमरे के अंदर से सिटकिनी चढ़ा ली थी कि वह और उसके बच्‍चे इस घर से दूर फतेहपुर या कहीं नहीं जाएंगे! बड़े मामा ने बहुत हल्‍ला किया, दरवाज़ा पीटते रहे, पड़ोस से रमन की मां और टिल्‍लू और कहां-कहां के सब लोग चले आये, बहुत समझाने की कोशिश की, मगर मां ने दरवाजा नहीं ही खोला.

रात को अंधेरे में आंखें खोले मैं देर तक अंधेरे में पापा को खोजती रहती हूं. मैं पापा से कहना चाहती हूं पापा तुम जानते नहीं तुमसे मुझे कितना प्‍यार है. मां तुम्‍हें बहुत पयार करती है मगर मैं तुम्‍हें और भी, उससे भी ज्‍यादा करती हूं!

रात को बिना बत्‍ती जलाये रसोई में घड़े से पानी निकालकर पीते हुए कभी लगता है मैंने गिलास नहीं पकड़ा है, खुद पापा हैं अपने हाथ में गिलास लेकर मुझे पानी पिला रहे हैं. छत की टंकी के पास भी बैठे हुए यही लगता है मैं वहां अकेली नहीं बैठी, पापा पास बैठे हुए हैं. दीखते नहीं से यह साबित नहीं होता कि पापा नहीं हैं. कहीं भी अकेली खड़ी रहूं लगता है पापा ठीक मेरे पीछे खड़े हैं. बहुत बार हुआ है मैंने आंखें मींचे फुसफुसाकर सवाल किया है, ‘पापा, तुम्‍हीं हो न?’ थोड़ी देर हवा के सरसराते रहने के बाद मुझे हमेशा जवाब मिलता! पापा चुपचाप बात कर लेते मुझसे!

ओह, कितनी मुझे खुशी होती! मैं दोड़ती मां के कमरे भागी जाती, पलंग के सिरहाने मां के सूखे बालों पर हाथ फिराते जल्‍दी-जल्‍दी कहती, ‘सब ठीक है, मां, पापा कहीं नहीं गए, पापा हमारे साथ हैं!’ मां मुझे नजदीक खींचकर अंधेरे में छुपा लेती, ‘मेरी प्‍यारी गुड़ि‍या,’ बुदबुदाती रोती रहती. थोड़ी देर में भानुप्रसाद ‘मा, मा’ पुकारता पलंग पर चढ़कर हमारे ऊपर गिरा आता, मैं उसे बाहों में खींचकर डांटती, ‘फिर मां को परेशान करने चला आया, पाजी, हां? बोल?

अंधेरे कमरे की छत की बल्लियों के पीछे पापा का चेहरा हंसता दिखता. और किसी को नहीं दिखता, सिर्फ मैं पापा को देखती रहती, मन ही मन हंसती..

(जारी)