Tuesday, August 2, 2011

मिशा: एक जीवन, बेतरतीब, संक्षिप्‍त (भारतीय सस्‍ता संस्‍करण)

सीढ़ि‍यों पर धूप वाली जगह आकर अभी मैंने चाकलेट की पन्‍नी खोली भी नहीं कि भानुप्रसाद चाकलेट के लिए हाथ मारने लगा. चाकलेट तेज़ी से ऊपर किये मैं बोली, पहले चाकलेट बोलो, भानुप्रसाद? और उसके बाद पिलीज़! कोई भी चीज मांगते समय पिलीज़ बोलते हैं तब जाके चाकलेट मिलता है, समझे? अब बोलो! ठीक है, पापा बोलो? चाकलेट खाना है कि नहीं?

भानुप्रसाद जोर-जोर से सांस की आवाज़ निकालता रहा, लेकिन बुद्धू चाकलेट का ‘च’ तक नहीं बोलेगा. पापा कहेगा ऐसी बात तो भूल ही जाओ. सीढ़ि‍यों पर फुदकता छत तक खेलने पहुंच जाता है, बरामदे या रसोई में चली आई मेंढक की पिछली टांग पकड़कर हवा में उठा देता है, भूले से मेरी नोट कापी उसके हाथ चढ़ी तो पेंसिल से कैसे उसका सत्‍यानाश करेगा आपको नहीं मालूम, या उसके सर के सामने के बालों पर कैंची चलाने के लिए उसे सैलून की कुर्सी पर बिठा के देखो ज़रा, इतना हल्‍ला करेगा कि सड़क पर रिक्‍शेवाले रिक्‍शा रोककर खड़ा हो जायें. अस्‍पताल में सुई लगवानी पड़े या घाव की मरहम-पट्टी के समय बीनू भी इतना शोर नहीं करता जितना भानुप्रसाद प्‍लेट में सिर्फ बैंगन देखकर करने लगता है!

‘क्‍यों हो तुम इतने बदमाश, भानुप्रसाद, बोलो?’ भानुप्रसाद मेरी बात का जवाब देने की जगह ‘मा, मा!’ करता मेरे हाथ से चाकलेट लेने की कोशिश करता है. मैं चाकलेट वाला हाथ ऊपर किये उससे गुस्‍से में कहती हूं, ‘तुम्‍हें शरम नहीं आती इतने बड़े होकर अभी तक चाकलेट नहीं बोल सकते? ठीक है, सिर्फ पापा बोलकर दिखाओ? पिलीज़, भानुप्रसाद?

भानुप्रसाद को समझा-समझाकर मैं थक जाती हूं, सच्‍ची. उससे कुछ भी कहने का फायदा नहीं. कोई भी बात कहनी हो उसके पास कहने के लिए सिर्फ वही एक चीज़ है- मा! आप एक लाख बार सिर पटकने के बाद भानुप्रसाद से कहो अब बोलो, भानुप्रसाद? तब भी बहुत सोचकर भानुप्रसाद सिर्फ ‘मां!’ ही कहेगा! और शरम तो इस लड़के को आती नहीं. बिना चड्डी पहने सड़क तक किसी साईकिल के पीछे दौड़ने चला जाता है. पूरे-पूरे दिन ऐसे ही बिना चड्डी के कीड़ों और मेंढकों के पीछे भागता रहता है. अभी भी बदमाश ने चड्डी नहीं ही पहनी है! मैं हारकर कहती हूं, ‘चड्डी पहनके आओ फिर चाकलेट पाओगे, पहनोगे ना?’ भानुप्रसाद बिना मेरी बात सुने चाकलेट की तरफ हाथ बढ़ाये चिल्‍लाता है, ‘मा!

***

मेरे पापा का नाम है महेश बिष्‍णु सरमा. मीनाक्षी कहती है ‘है’ नहीं ‘था’ कहो. मैं गुस्‍से में मीनाक्षी के बगल से उठकर इरोम को देखती हूं, इरोम कुछ नहीं कहती. मैं तभी तय कर लेती हूं कि मुझे इस स्‍कूल में, मीनाक्षी और इरोम के पास दुबारा कभी नहीं आना.

पापा के मरने के बाद स्‍कूल जाने का मेरा एकदम मन नहीं करता. शुरु में दो-तीन बार मां हाथ में स्‍केल लेकर मुझ पर चीखी थी कि अभी कपड़े पहनकर तैयार हो नहीं तो मारते-मारते पीठ लाल कर दूंगी! उसके बाद धम्‍म से कुर्सी पर गिरके रोने लगी थी. प्रताप मुझे साईकिल के कैरियर पर बिठाकर आधे रास्‍ते तक स्‍कूल के गया भी था मगर मैं अचानक कैरियर से कूदकर सड़क के एक ओर खड़ी हो गई थी. सड़क के दूसरी ओर ज़रा आगे जाकर साईकिल रोककर प्रताप परेशान खड़ा मुझे घूरता रहा, फिर हम दोनों बिना कुछ बोले चुपचाप घर लौट आये थे.

रात पेट के बल जमीन पर लेटे ज्‍यॉमेट्री बाक्‍स में सर घुसाये बीनू ने कहा क्‍या करेगी फिर, हमेशा के लिए अब फिफ्थ क्‍लास में ही रहेगी? बीनू की बात का मैंने जवाब नहीं दिया लेकिन मन ही मन तय कर लिया है कि हां, अगर स्‍कूल नहीं जाकर मुझे हमेशा फिफ्थ क्‍लास में ही रहना है तो मैं रहूंगी फिफ्थ क्‍लास में! मुझे बीनू की तरह इंगलिश और गणित में नंबर लाने का शौक नहीं, न इरोम और मीनाक्षी से बात करने का है! मैं घर में रहकर भानुप्रसाद और मां की देखभाल करुंगी. आटा बनाना सीख लूंगी और चुपचाप रोटी बनाकर भानुप्रसाद को खिलाकर उसे पीछे वाले कमरे के बक्‍से पर सुला आऊंगी. वह रोटी के लिए हल्‍ला करता फिर मां को परेशान नहीं करेगा. भीतर से कमरा बंद किये मां फिर जितनी भी देर चाहे चैन से सोती रहेगी. मैं भी मां को परेशान नहीं करुंगी. मां कहेगी नहाई है तू? तो उसी समय जाकर नहा लूंगी. गरम पानी के लिए भी नहीं कहूंगी! अभी कुछ महीनों पहले तक प्रताप कितना हल्‍ला करता था कि हाई स्‍कूल के बाद उसे यहां नहीं रहना, वह जयपुर या दिल्‍ली जाकर पढ़ाई करेगा. मां धीमे से कहती उसके पैसे कहां से आएंगे तो रसोई के जंगले से चीखकर जवाब देता वो तुम सोचो, कहां से लाओगी पैसे, मैं क्‍या पूरे जीवन यहां बांस छीलता बैठा रहनेवाला हूं?

पापा की मौत के बाद देखो अब प्रताप सचमुच लकड़ी छीलने का ही काम कर रहा है. मतलब मकबूल चाचा की फर्नीचर की दुकान पर पाटटाइम नौकरी के लिए सुबह साढ़े आठ तक घर से निकल जाता है. उसके पहले बीनू की मदद से सबके लिए दाल, सब्‍जी और रोटी तैयार करता है. मैं एक कोने सोते भानुप्रसाद को गोद में लिये बैठी रहती हूं. जल्‍दी जब मैं रोटी बनाना सीख लूंगी फिर प्रताप को इस तरह भाग-भागकर काम करने की जरुरत नहीं रहेगी. जबकि भानुप्रसाद के सिवा रोटियों के लिए घर में अब कोई हल्‍ला भी नहीं करता. मां तो तीन-तीन दिन निकल जाते हैं रोटी की थाली की तरफ देखती भी नहीं. नींद में डूबी आंखें लिये प्रताप कहता है छोड़ दो, मां को परेशान मत करो, भूख लगेगी जब खाएगी अभी नहीं चाहती तो मत जोर डालो खाने के लिए.

कुछ दिनों पहले फतेहपुर से बड़े मामा आए थे. मकबूल चाचा की दुकान से प्रताप को अपने साथ लेकर लौटे थे. बीनू बीच स्‍कूल छोड़कर घर लौटा आया था. मामा ने प्रताप और बीनू की मदद से घर का सारा सामान बंधवाया. मैं भानुप्रसाद को साथ लेकर छत के पीछे वाली टंकी के पीछे जाकर छिप गई थी. मां ने अपने कमरे के अंदर से सिटकिनी चढ़ा ली थी कि वह और उसके बच्‍चे इस घर से दूर फतेहपुर या कहीं नहीं जाएंगे! बड़े मामा ने बहुत हल्‍ला किया, दरवाज़ा पीटते रहे, पड़ोस से रमन की मां और टिल्‍लू और कहां-कहां के सब लोग चले आये, बहुत समझाने की कोशिश की, मगर मां ने दरवाजा नहीं ही खोला.

रात को अंधेरे में आंखें खोले मैं देर तक अंधेरे में पापा को खोजती रहती हूं. मैं पापा से कहना चाहती हूं पापा तुम जानते नहीं तुमसे मुझे कितना प्‍यार है. मां तुम्‍हें बहुत पयार करती है मगर मैं तुम्‍हें और भी, उससे भी ज्‍यादा करती हूं!

रात को बिना बत्‍ती जलाये रसोई में घड़े से पानी निकालकर पीते हुए कभी लगता है मैंने गिलास नहीं पकड़ा है, खुद पापा हैं अपने हाथ में गिलास लेकर मुझे पानी पिला रहे हैं. छत की टंकी के पास भी बैठे हुए यही लगता है मैं वहां अकेली नहीं बैठी, पापा पास बैठे हुए हैं. दीखते नहीं से यह साबित नहीं होता कि पापा नहीं हैं. कहीं भी अकेली खड़ी रहूं लगता है पापा ठीक मेरे पीछे खड़े हैं. बहुत बार हुआ है मैंने आंखें मींचे फुसफुसाकर सवाल किया है, ‘पापा, तुम्‍हीं हो न?’ थोड़ी देर हवा के सरसराते रहने के बाद मुझे हमेशा जवाब मिलता! पापा चुपचाप बात कर लेते मुझसे!

ओह, कितनी मुझे खुशी होती! मैं दोड़ती मां के कमरे भागी जाती, पलंग के सिरहाने मां के सूखे बालों पर हाथ फिराते जल्‍दी-जल्‍दी कहती, ‘सब ठीक है, मां, पापा कहीं नहीं गए, पापा हमारे साथ हैं!’ मां मुझे नजदीक खींचकर अंधेरे में छुपा लेती, ‘मेरी प्‍यारी गुड़ि‍या,’ बुदबुदाती रोती रहती. थोड़ी देर में भानुप्रसाद ‘मा, मा’ पुकारता पलंग पर चढ़कर हमारे ऊपर गिरा आता, मैं उसे बाहों में खींचकर डांटती, ‘फिर मां को परेशान करने चला आया, पाजी, हां? बोल?

अंधेरे कमरे की छत की बल्लियों के पीछे पापा का चेहरा हंसता दिखता. और किसी को नहीं दिखता, सिर्फ मैं पापा को देखती रहती, मन ही मन हंसती..

(जारी)


2 comments:

  1. कथा की अंतिम पंक्तियों में अपने को पाया..5 बरस बाद भी अपने पिता को अपने आसपास महसूस करती हूँ..कभी कभी तो अपने अन्दर ही पाती हूँ खासकर तब जब माँ वेबकैम पर मेरी बनती बिगड़ती सूरत देख कर कहती है, "बिल्कुल अपने डैडी सी लग रही हो,हरकतें भी वैसी" भारतीय सस्ते संस्करण ने भी भावुक कर दिया..

    ReplyDelete
  2. अजदक का रस ऐसा कि कुछ कहने से अच्छा मन ही मन टुगुराते रहें .... कहें भी तो क्या ?

    ReplyDelete