Thursday, August 4, 2011

घबराहट और मैं..

माफ़ कीजिए हो सकता है मैं आपको घबराया हुआ लगूं, जबकि सच्‍चाई में होऊंगा नहीं, तो इसे लेकर कृपया किसी तरह का मन में तनाव न पालें, मेरी घबराहट प्रकट व प्रच्‍छन्‍न्‍ा रुप से दीखे भी तो उसे लेकर उसे लेकर आश्‍वस्‍त रहें, राजी-खुशी, हंसते रहें, इतनी आपसे विनम्र विनती है, मेरी घबराहट घटाने में उससे मदद ही मिलेगी, हालांकि मैं उस तरह से घबराता कतई नहीं ही होऊंगा जैसा आप समझ रहे होंगे, फिर भी. कहने को एक बात कह रहा हूं. ऐसा कुछ अजीब भी नहीं, लोगों में विविध-विभिन्‍न विकार होते ही हैं, कोई एक पूरा मनुष्‍य कहां मिलता है? किसी महात्‍मा से अकेले में आंख से आंख मिलाकर पूछकर देखिए, देखिएगा महात्‍मा नज़र बचाकर शर्मिंदगी में क्‍या जवाब देते हैं! कि जो आंखों के देखे दिखता है वही सच नहीं होता. वही और उतना. सच की एक समूची दुनिया होती है. हमेशा प्रकट हो, हमारी पहचान में पड़े, ऐसा कहां होता है, हो पाता है? यही या ऐसा ही कुछ. वक्‍तव्‍य व मंतव्‍यों की ऐसी लबरी से अलग महात्‍मा में आप अन्‍य घालमेल भी पायेंगे. धीरज धरे देखना चाहें तो. असल दिक्‍कत यही है कि हमने दुनिया में और कुछ जो भी भले पा लिया है, धीरज से हाथ धो बैठे हैं. और इस तरह अंततोगत्‍वा इस समझ से भी कि धीरज के खो जाने के अनंतर हमारे अन्‍य कैसी भी प्राप्तियों का कोई कैसा भी अर्थ नहीं. स्‍वाभाविक है ऐसी प्रतीति से मनुष्‍य में घबराहट की उत्‍पत्ति होती है वह घबराया दिखता है, जैसे आप मुझे देखते हुए मेरी अन्‍य सारी लाक्षणिकताओं से ऊपर केवल मेरा घबराना लक्षित करने में उलझते जाते हैं, जबकि सच्‍चाई है जैसा मैंने पहले कहा भी, मेरी घबराहट मनुष्‍यगत लघु किंचित एक विकार मात्र है, जैसे कुछ लोग हैं किंचित लंगड़ाकर चलते हैं, कुछ खास तरीके से एक ओर को ज़रा पैर उठाकर, कुछों में गरदन एक तरफ गिराकर फोटो खिंचवाने की प्रवृति होती है तो कुछों में बेहयायी की हद तक दांत दिखाते रहकर फोटो उतरवाने की. हिंदी के अनकादमीय विज्ञ प्रबंधकार भगवान सिंह ने इतिहास की ललित पुस्‍तक लिखी भी है, अपने अपने राम’. समाज का यह स्‍पष्‍ट दायित्‍व बनता है कि वह सबको उनके निज के समझ (व असमंजस) के अंधेरों में उनकी आवश्‍यकता (व रुचिनरुप) अपना राम चुनने का हक़ दिलवा सके. राम की जगह कोई श्‍याम चुनना चाहे तो इसके लिए वह भी रामपंथी-सा ही उन्‍मुक्‍त व स्‍वतंत्र महसूस करे. हिन्‍दी फिल्‍मों के शीर्षक (व कथ्‍य) की तरह ‘सामर्थ्‍य और सीमा’ (लेखक: बीसी वर्मा) के बंधनों के जकड़ाव का अनुभव न करे. जैसे बिना घबराये- केवल अपनी ओर चढ़ी आपकी नज़रों में इशारा पाकर- मैं किंचित (व सांघातिक) घबराहट का तत्‍क्षण अनुभव करने लगता हूं!

जबकि वास्‍तविकता ऐसी कतई है नहीं. वह सिर्फ़ मेरे चेहरे का भाव भर है. जैसे राजेश खन्‍ना का हेयर-स्‍टाईल (व ऊटपटांग अभिनय) था, ‘परिचय’ में जितेंद्र का शिक्षित व सभ्‍य और ‘मेरे अपने’ में ‘कोई होता मेरा अपना’ गाते हुए श्‍याम (विनोद खन्‍ना) का दुखी दिखना था, उनका उनके जीवन की वास्‍तविक चिंताओं (व दुविधाओं) से दूर-दूर का भी संबंध नहीं. जैसे घबराहट से मेरा नहीं है. एकान्तिक व चिंतन के गहन-क्षणों में मैं कहां से एक समर जैकेट लहा लूं (किम्‍बा जापानी नवयौवना प्रेयसी) की सोचता हूं, या कसौनी में किसका कॉटेज कब्जिया लूं की सोचता भीतर ही भीतर खौलने लगता हूं, घबराहट की मेरे पास फुरसत नहीं होती. फुरसत होती ही है तो मैं सिमोन और श्‍यूस्‍टर को ईमेल पर ईमेल भेजकर हड़काते, डराते हुए कृतार्थ करता हूं कि मेरी अनलिखी पुस्‍तक पर बीस लाख का वह अडवांस वह कब भेज रहे हैं (“जब सचमुच किताब लिख ली जाएगी तब ही भेजोगे, हरामखोरो, तो तुम्‍हारे उस पैसे का मैं घेंवड़े का अचार डालूंगा, पाजियो? आर यू गाइस एस गुड पब्लिशर्स एस आई अम सम डंबऐस राइटर ऑर व्‍हॉट, अबे चिरकुटप्रसादो, इस खुशहाली, दलाली के समय में मेरे बीस लाख दांत में भींचे हो, छोड़ नहीं रहे, अबे शरम नहीं आती अपने को प्रकाशक, अगुवा धावक कहते हो?”), ईमेल इतना लंबा हुआ जाता है जितना लंबा जेम्‍स जॉयस के ‘यूलीसीस’ का अंतिम वाक्‍य भी न हुआ होता, थिरकते, सुलगते अपने नथुनों की आंच में मैं बारहवीं सिगरेट बाल लेता हूं, मगर चिड़चिड़ाता, गुस्‍साता, घबराता कहां हूं, नहीं हूं, वह सिर्फ़ आपकी पिटी हुई नज़रों को लगता है.

2 comments:

  1. आह! ये तो मेरा भी तकिया कलाम है -
    "...जब सचमुच किताब लिख ली जाएगी तब ही भेजोगे, हरामखोरो, तो तुम्‍हारे उस पैसे का मैं घेंवड़े का अचार डालूंगा, पाजियो? आर यू गाइस एस गुड पब्लिशर्स एस आई अम सम डंबऐस राइटर ऑर व्‍हॉट, अबे चिरकुटप्रसादो, इस खुशहाली, दलाली के समय में मेरे बीस लाख दांत में भींचे हो, छोड़ नहीं रहे, अबे शरम नहीं आती अपने को प्रकाशक, अगुवा धावक कहते हो?”"

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  2. पढ़ कर मजा आया...पता नहीं अवधि में है या नहीं लेकिन काशिका में खास तरह से दान्त दिखाने को दान्त निपोरना कहते हैं... :दांत निपोर-निपोर कर फोटो खींचाने वाले और अग्रिम राशि न देने वाले भी पोस्ट पढ़े इसी शुभकामना के साथ... :-)

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