Monday, August 15, 2011

कितने तो, छुटकन, काम निपटाने हैं..

कितने तो. कितने कितने कितने, आह्, कितने तो. काम, छुटकन, निपटाने हैं. तुम्हारे गोद में सर गिराके आंख मूंदनी नाक बजाना है. मुंदी आंखों सांस गिनते तुमसे तक़दीर पढ़वानी है, मन के महानगर के अरबों तुम्हें क़ि‍स्से सुनाने हैं. कान खुदवाना, गोड़़ दबवाना, गरदन के रोंओं पे हाथ फिरवाना है, तुमसे, ओह, कितने तो! धूल के बादल और सीलन-सागर में बाल्ज़ाक व बाख़ का ब बचाये रखना और पेत्रार्क व पिरमोद गंगुली का नेह दुलराये रखना, नाक से नाक सटाये तुम्हें तुमसे छुपाये रखना है, आह, कितने तो! हां, एक और, अम्मां को टहलाना है, बबुनी को कांधा चढ़ाना, मगर पहिले भीड़ में उनके ठिकाना पाना है, इंशा जी के साइकिल चढ़कर मोम्मद रफ़ी जी के गांव जाना है, आह्, कितने तो..

4 comments:

  1. कितने तो दिन बाद चहुंपे , मन मस्त हुआ -हरिअर!

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  2. बहुतय नीक लगा है, राप्चिक !

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  3. कितना कुछ करना है और वक्त है के इज़ाज़त ही नहीं दे रहा...कमबख्त....

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  4. मन के महानगर के अरबों तुम्हें क़ि‍स्से सुनाने हैं.
    ***
    आबाद रहे मन का महानगर और एकदम हमारे बीच से शब्द विम्ब उठाकर यूँ ही रच दे कविता कि बस हम यूँ ही चमत्कृत होते रहे!

    कितने तो सुन्दर पोस्ट अभी और पढने हैं...

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