Monday, August 22, 2011

सीढ़ियों पर..

हालांकि रोज़ का चढ़ना-उतरना था, तामकार के पैर सीढ़ि‍यों पर ढंग से नहीं पड़ रहे थे. जैसे मन में तरतीब नहीं बन रही थी. इतनी ज़रा देर में वह भूल चुका था कि आखिर ऐसी कौन ज़रुरत बन पड़ी थी जिसके दबाव में वह अचानक घर लौटा आया था. बीच दिन घर लौटकर कहीं उसने बड़ी गलती तो नहीं की? औरत तकिये पर उठंगी लेटी टीवी ताकती रहेगी, या पैर के नाखून काटती, उस चुपचाप के घरेलु संगत में तामकार क्‍या करता बैठा रहेगा? हो सकता है टीवी देखती थोड़ी देर बाद उसकी ओर पलटकर औरत उससे और तरह की बात छेड़ दे? घरेलुपन की आड़ में यूं ही तामकार के घुटने पर हाथ रख दे, उसके साथ बाहर कहीं घूम आने की ज़ि‍द करे? तामकार ने मन बनाना शुरु किया कि दरवाज़े से अंदर घुसते ही वह चीखकर औरत को खबरदार कर देगा कि आज शाम से घर में सब्‍जी बनाने की दरकार नहीं है. और रोज़-रोज़ वह रस्‍सी पर कपड़े सूखते देखने से थक गया है, डिटर्जेंट के पैसे और पानी क्‍या पेड़ पर उगते हैं? कई बार हुआ है कि तामकार की सुपरस्‍टोरों में अचानक नज़र गई और लोगों को उसने चार डिब्‍बे डिटर्जेंट, दो बोरी चावल की खरीदारी करते देखा और घबराकर एकदम से एक ओर हट गया है. ये कौन लोग हैं और कितना पैसा है इनके पास जो इतनी मात्रा में खरीदारी करते हैं. झोला-झोला फल, कौन खाता है इन्‍हें? कैसे? सीढ़ि‍यों पर एक बार फिर तामकार के पैर लड़खड़ा गए.

कोई बच्‍चा निर्ममता से पिपिहरी बजा रहा था. जालियों से बाहर लाई मुर्गी कसाई के हाथ में फड़फड़ा रही थी. लता मंगेशकर लीना चंदावरकर वाला गाना गा रही थी, ‘’जाने क्‍यों लोग मोहब्‍बत किया करते हैं,’’ और ऐसी ही दूसरी ऊटपटांग आवाज़ें. अंधेरी, संकरी सीढ़ि‍यों पर हारकर बैठते तामकार ने सोचा मुझे खबर नहीं, मगर आज ज़रूर किसी त्‍यौहार का दिन है! किसी बात की मुझे खबर क्‍यों नहीं रहती? कहां फंसा रहता है दिमाग? किसी छोटे स्‍टेशन के बाहर गुमटी पर बदरंग होता ‘’मेहबूब की मेंहदी’’ का पोस्‍टर आंखों के आगे घूम गया. ‘’गहरी चाल’’, ‘’बंधे हाथ’’ और राजेश खन्‍ना की ‘’मेरे जीवन साथी’’. नीचे के फ्लोर पर धड़ाम से कोई दरवाज़ा खुला. कोई बूढ़ी खखारी. तामकार ने उठने की कोशिश की मगर शरीर ने साथ नहीं दिया. सीले मोज़े के भीतर चींटियां चलती महसूस की, गरदन के ऊपर, बाईं कान के पीछे. बालों में धूल की किरकिराहट. आखिर इस हालत तक वह पहुंचा कैसे, सुबह तक तो सही था, साफ-सुथरा? इस तरह तो वह किसी सूरत में बची हुई चालीसेक सीढ़ि‍यां तय करने से रहा. उसे स्‍ट्रेचर की ज़रूरत है. या कोई गिलास भर पानी पिला दे. दरवाज़े के उधर जो वह स्‍त्री बैठी है, उसकी मां, औरत, बहन, जो भी, गिलास भर पानी लिये इतनी ज़रा-सी सीढ़ि‍यां उतरकर इस दुर्गम क्षण में उसे बचा लेने नहीं आ सकती? मगर तामकार को फिर अपनी कमज़ोरी, प्‍यास, ‘’गाइड’’ के देवानन्‍द के सूखे, पपड़ाये होंठों में जाकर उलझती लगी और यह सोचकर एकबारगी उसका मन बैठने लगा कि कुछ घंटों पहले, सुबह दरवाज़े, उस घर से बाहर निकलने के साथ ही वह अपने जीवन की सब उम्‍मीदों से भी बाहर निकल चुका है, और दुनिया की कोई ताक़त अब उसे उसके अंत से नहीं बचा सकेगी! मन में इस ख़याल के आते, और आकर एकदम से भीतर धंसते ही तामकार की पसलियों में एक ठंडी लहर दौड़ गई, भौं पर पसीने की बूंदें उभर आईं. पूरी जान से दीवार का सहारा लेकर उसने उठने की कोशिश की और भरभराकर वापस सीढ़ि‍यों पर बैठ गया.

तामकार ने मुंह खोलकर कुछ कहने की कोशिश की. शायद अपने अंत से पहले वह कुछ बातें साफ़ करके जाना चाहता था. लेकिन इसी बीच सूती की बदरंग साड़ी में कोई सांवली हड़ि‍यल बूढ़ी सामने चली आई. कोयले के इंजन से नहायी हवा में किसी गुमनाम हाल्‍ट पर ठहर गई पैसेंजर रेल पर चढ़ी बूढ़ी के हाथों में बासी पूड़ि‍यों और सूखे आलू का दोना था. अपने अकेलेपन की घबराहट में, संभवत: सिर्फ़ आश्‍वस्‍त होने की गरज से ही, उसने तामकार से उसका मुल्‍क पूछा था.

भौं पर की पसीने की बूंदें पोंछते तामकार ने तक़लीफ़ और कुछ शर्म से जवाब दिया था कि उसे अपने दादा या दादी किसी का भी नाम याद नहीं.. उसने तेज़ी से फिर माफ़ी मांगी, कि उसका दिमाग काम नहीं कर रहा. शायद थोड़ी देर में उसे याद पड़़े. तब संभवत: चालीस सीढ़ि‍यों के उधर दरवाज़े के पार बैठी स्‍त्री कौन है और तामकार से उसके क्‍या संबंध हैं का जवाब भी उसके माथे में साफ़ उभरकर आये.. फिर कुछ ठहरकर तामकार ने जवाब दिया कि उसका नाम महेश बिष्‍णु सरमा नहीं, न ही मिशा है, जैसाकि कुछ लोग उसके संबंध में गलतफ़हमी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं..

साठ के दशक के किसी बेमतलब शहर के किसी बदरंग मकान का छत था जिस पर हाथ में गुलेल थाम वह बच्‍चा चिड़ि‍यों के पीछे भाग रहा था. एक बेहया गोरैया थी अपना सर फूटने से बचाने के लिए कहीं भाग जाने की बजाय छत पर यहां से वहां उड़-उड़कर बैठ रही थी. पड़ोस की छत से स्‍लीवलेस ब्‍लाउज़ में श्‍लथ, एक भीमकाया अधेड़ महिला ने डांटकर बच्‍चे से सवाल किया वह किसका बेटा है, बच्‍चे ने जवाब देने की जगह अपने गुलेल का पत्‍थर दागा. यही आखिरी तस्‍वीर थी जो सीढ़ि‍यों पर भहराये गिरे मिशा की आंखों में कौंधकर अटक गई, उसके बाद वह फिर नहीं उठा.

(जारी)

1 comment:

  1. 'मेरे जीवन साथी " पोस्टर के साथ रचना को पढने का अद्भुत सुख रहा,,,,,,, अगली किस्त का बेसब्री से इन्तिज़ार है....!

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