Wednesday, August 31, 2011

तीन बहनें, चेख़ोव की नहीं

नाटकीयता में दौड़ी आकर टीना धम्‍म से पलंग से पर गिरी है. हाथ में मुड़ी-तुड़ी पियराये कागज़ की एक पुरानी किताब. होंठों पर राज़भरी मुस्‍कराहट. टीना से आठ साल बड़ी बीना कनखियों से देखकर मुंह फेर लेती है. पलंग के सिरहाने पीठ टिकाये वह क्‍या तो ज़रूरी कुछ सोच रही थी, छोटी के ड्रामे ने सब क्रम बिगाड़ दिया चेहरे पर ऐसा कुछ भाव. चालीस की देहरी में अकेली, चुपचाप, खाली-खाली (ओह, कितना खाली-खाली!) पैर धरती बीना को वैसे भी नाटकीयता से कोफ्त होती है, थोड़ी देर में सर दर्द करने लगता है. और तो आज यूं भी (दरअसल कल शाम से ही) बरसात की झड़ी लगी हुई है. रसोई में घुसते ही भूख मर जाती है (कितना अंधेरा रहता है हमारी रसोई में, क्‍यों रहता है इतना अंधेरा? बरसात में सभी घरों की रसोइयों में ऐसा ही अंधेरा रहता है? फिर आती है क्‍यों बरसात?). खिड़की पर परदों को पूरी तरह से खींचे नहीं रख सकते. खींचो तो कमरे में अजीब सी महक भर जाती है. और जब से नीना वाले कमरे में सामने की दीवार पर बढ़ी सीलन के फूले चकत्‍ते फूट आये हैं, टीना भाग-भागकर उसके कमरे में चली आती है. इतना बड़ा सायं-सायं करता घर है, ऐसे घर में भी, घंटे भर अकेला रहना मुश्किल!

- अब क्‍या हुआ? जवाब जानने की अनिच्‍छा से बीना पूछती है.

- पहले मेरे हाथ में ये क्‍या किताब है, बताओ!

- नीला बाबू का नाटक है? तू पहले इतना चहकना बंद कर, इट्स सो इरिटेटिंग!

- रॉंग. टेन्सी‍ जी की ‘गिलास मंजरी’ है, तुमने पढ़ा है, दीदी? प्‍लीज़, पढ़ो, इतनी उदासी है, इतनी उदासी कि तुम्‍हारा दिल खुश हो जाये! आनंद आ गया, सच्‍ची!

- रहो आनंद में. मुझे नहीं चाहिए. मैं ऐसी ही खुश हूं.

- ठीक है, मत पढ़ो. अट्ठाइस की टीना सर मोड़कर उसे दीदी के घुटनों पर गिराती, चहकती बोली- वैसे भी तुम्‍हें उदास होने की क्‍यों ज़रूरत है. ऐसा क्‍यों नहीं करते, दीदी, चलो, छाता लेकर नीचे ढलान वाली सड़क तक टहल आते हैं!

- वो भला क्‍यों? बीना को बात-बेबात छोटी का एक्‍साइटेबल होना एकदम भी अच्‍छा नहीं लगता.

- क्‍या, दीदी, थोड़ी देर घर से बाहर निकलोगी, नथुनों में ताज़ी नम हवा जाएगी, और तुम्‍हारा मन करेगा तो ‘पॉम-पॉम’ में ठहरकर हम एक आइसक्रीम भी खा सकते हैं!

- तुम्‍हीं जाकर खाओ आइसक्रीम. मेरा सर दुख रहा है, प्‍लीज़, लेट मी बी. टीना का सर एक ओर हटाकर रखते हुए बीना पलंग से उठ खड़ी हुई. परदे के नज़दीक जाकर रौशनी की ज़रा सी ओट से बाहर झांका, फिर खिन्‍न बेमन टहलती वापस पलंग के पैताने बैठ गई, एक तकिया खींचकर गोद में रखा और छोटी से बोली- अपनी उम्र वाला खोजकर कोई किसी से तू प्रेम-व्रेम करती, मुझ बूढ़ी के पीछे तू अपना समय खराब करती है, व्‍हाई, छोटी? कोई है नहीं तेरी निगाह में?

टीना के चेहरे पर इतनी देर से मुस्‍कराहट बनी थी, बड़ी बहन के सवाल ने उसे जैसे सोख्‍ता-सा सोख लिया. भावप्रवण आंखों में अन्‍यमनस्‍कता के तार खिंच गए, मुश्किल से धीमी आवाज़ बोली- हो सकता है मैं औरों की निगाह में न पड़ती होऊं.

बीना का दिल बैठ गया. प्‍यार से छोटी का गाल हाथ में लेकर बोली- नॉनसेंस! पूरे सांझनपुर में कितनी लड़कियां हैं तेरी तरह?

- नॉट अ सिंगल वन, मुरझाई हंसी हंसती टीना ने जवाब दिया, मुझसे पांच साल पहले सबकी शादी हो गई, सब अब बच्‍चों की मांएं हैं!

- शट अप! आज के ज़माने में कोई उम्र देखता है? इंटेलिजेंस से जज करते हैं. और तू इतनी फुल ऑफ लाइफ है! तेरा और नीना दोनों का हिसाब मुझे समझ नहीं आता, रियली, छोटी!

- नीना दी ने तो तय कर लिया है शादी नहीं करेंगी! कोई घोड़ी पर आकर प्रोपोज़ करेगा तो भी नहीं, जल-विभाग की क्‍लर्की में जितना जैसे बनेगा करेंगी, बट दैट्स इट.

- नॉनसेंस. ये सब बकवास उसने तुझसे कहा है?

***

नीना रोज़ सात से पहले घर लौट आती है आज आठ के बाद लौटी है. रात के खाने में टीना का हाथ बंटाती वहीं रसोई से बीना आवाज़ लगाती है,

- नीना, सुन रही है? तुम्‍हारे ऑफिस में वो जो साहनी है तू उससे शादी क्‍यों नहीं कर लेती?

नीना नहाकर बदले कपड़ों में बैठक के सोफे पर आकर ढेर हो गई है. थोड़ी देर बाद एक पैर से स्‍टूल खींचकर उस पर दोनों एड़ि‍यां जमाती है.

बीना- क्‍यों? मुझे तो अच्‍छा ही लगता है. ज्‍यादा बकबक की आदत भी नहीं.

आंखों को पंजों से मूदकर नीना जवाब देती है- फिर आप ही कर लो उससे शादी.

- फिर हमलोग तब साहनी की साली हो जाएंगी, नहीं, नीना दी? साली होने के ख़याल से टीना को इतनी हंसी आती है कि हाथ से सब्‍जी का कलछुल छूटकर फर्श पर गिर जाता है. बीना हाथ का आटा झाड़ती, पैर पटकती रसोई से बाहर निकल आती है.

बीना- तुम लोगों से एक सिंपल बात करना संभव नहीं. हर चीज़ मज़ाक हो जाती है! खाओ तुम लोग, मेरा मन नहीं, मेरे सर में दर्द हो रहा है!

***

शादी की बात नीना को मज़ाक लगती है. एक वक्‍त था जब नहीं लगती थी. मगर तब बुआ और पापा दोनों ज़ि‍न्‍दा थे, और चौंतीसवें से पैर निकालकर पैंतीसवें में जाने से वो बहुत पहले का किस्‍सा था. तब नीना जवान थी! एक जगह से उठकर ज़रा दूरी के दरमियान जाते में भी उसे महसूस होता कितनी जवान है वह. तब किस हुमस के साथ प्रेम करना चाहती थी वह, और उसी अधिकार-बोध से प्रेम की कामना करती थी. बिछौने में पैर से चादर एक ओर फेंककर उनींदे में बीना का कंधा झिंझोड़कर उसे जगा देती, उससे ज़ि‍रह करने लगती- दीदी, तुम दिल्‍ली क्‍यों नहीं चली चलतीं, इस तरह यहां समय गुजारते रहने में क्‍या तुक है, दीदी? आई नो शरद भैया के यहां हमलोग बोझ होंगे, मगर तो क्‍या? थोड़े दिन होंगे, रहने का फिर कहीं इंतज़ाम निकल आएगा, तुम हाथ-पैर चलाओगी, कहीं किसी कॉलेज में तो कुछ निकल ही आएगा, एडहॉक ही सही, दीदी, प्‍लीज़, लाइफ में सॉलिड कुछ होगा, इस सांझनपुर में मैं तुम्‍हें रहने नहीं दूंगी, हमारे जीवन में कुछ बड़ा होना है, विराट, यस?

एक बार किसी तरह कांख-कूंखकर बीना ने दिल्‍ली निकलने का मन बनाया भी था, मगर तभी पापा के अटैक हुआ था, तब तक बुआ भी नहीं बची थीं (बचीं भी होतीं तो सिर्फ़ उनके सहारे दीदी पापा को छोड़कर दिल्‍ली निकल जाती, असंभव), दिल्‍ली बिना आवाज़ कैंसल हुआ. नीना की शादी की एक कमज़ोर सी कोशिश हुई, और बनते-बनते बात फिर उतनी ही आसानी से टूट भी गया (उड़ती सी खबर उन तक पहुंची थी कि लड़के का यूं भी मनीषा नाम की किसी लड़की से अफ़ेयर चल रहा था, जयपुर पढ़ाई करने गई थी, शादी की बात की भनक मिलते ही भागी आई और लड़काजान के बड़े करम किए!). दुबारा शादी-प्रसंग नहीं उठा. न नीना ने उठने दिया. जल विभाग की क्‍लर्की से बचे समय में पापा के पीछे आधी-आधी रात जगी रहती. उनके तलुए सहलाती, बालों में तेल की मालिश करती. वो हाथ झटकते तो डांटकर उन्‍हें चुप करा देती. सुबह-सुबह टीना को उठाकर कहती चल, पापा के कमरे में बैठकर उनको कोई गाना सुना!

फिर आनंद सरुप. इंश्‍युरेंस की कोई शिकायत लेकर पानीटंकी थाने गई थी, वहीं मुलाकात हुई. सज्‍जन और मितभाषी. ऐसे पुलिसवाले से मिलकर नीना को ताज्‍जुब हुआ था. इंश्‍युरेंस का कन्‍फ्यूज़न मगर फिर जल्‍दी ही सुलट गया तो एक बार दुबारा शुक्रिया कहने थाना गई, फिर बीच-बीच में मिलना. जानकर अच्‍छा लगा कि शिक्षित भी हैं. आठ-नौ महीनों की पहचान के बाद खबर हुई कि शादीशुदा हैं, एक तीन साल की बच्‍ची भी है. नीना को काठ मार गया. पुलिसवाले को बहुत जलील किया, नाखून से गाल नोंचा, गालियां दीं, कमरे में थूककर निकल आई थी. मगर मन शांत नहीं हुआ, सज्‍जन पुरुष से मिलना बंद नहीं कर सकी थी, वो तो सरुप साहब का खुद ही आंगनडेरा तबादला हुआ तब जाकर कहीं उस कहानी पर परदा गिरा.

***

रात के ढाईएक बजे नीना पानी पीने के लिए उठी तो दिखा दीदी के कमरे की बत्‍ती जल रही है, आंखों पर हाथ धरे उठंगी बैठी हैं. पानी का गिलास हाथ में थामे नीना वापस लौटी, कमरे में झांककर बोली- सरदर्द कमा?

बीना ने हाथ के इशारे से उसे भीतर बुलाया, अपने नज़दीक बिठाकर बोली- मेरी बात तुझे ऐसी बुरी क्‍यों लग जाती है? तू सुखी रहे ऐसा सोचना मेरा गलत है? बोल.

हाथ का गिलास बाजू के स्‍टूल पर रखकर बहन के बगल लेटती नीना ने कहा- मैं सुखी हूं दीदी.

बीना दुलार से उसके सर पर हाथ फिराते हुए बोली- मालूम है, मगर थोड़ी और सुखी हो सकती थी, नहीं?

बहन से सटी नीना आंख मूंदकर बुदबुदाई- थोड़ा और सुख जैसा शायद सचमुच की दुनिया में कुछ होता नहीं दीदी, तुम बताओ, होता है?

***

तीनों बहनें चेख़ोव की ‘तीन बहनें’ नहीं थीं, मगर हो सकती थीं, जैसे जीवन में थोड़ा और सुख हो सकता, नहीं? ला, तारा ला, लारल्‍ला. कितना अच्‍छा होता मैं वॉयलिन बजाना जानता होता, या सितार ही. ज़्यादा नहीं तो थोड़ा ही, एकदम थोड़ा जितना ही?

1 comment:

  1. क्या कहें जी! काश हम सरकार होते और हमारे खजाने में सुख-दुख का भंडार होता तो थोड़ा सा सुख इन बहनों को अलाट कर देते।

    क्या लिखते हैं जी!

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