
एक कहानी का जन्म होता है. रांची, पलामू, सतना, मथुरा, अजमेर, मुंगेर, पिथौरा की इतना भर पगडंडियां झांक जाती हैं, भोपाल का ताल औ’ लखनउव्वा ढाल चंद स्मार्ट वन-लाइनर्स बोल जाता है, सड़क शिलॉंग तक पहुंचती नहीं. ज्ञानपीठ औ’ सरकारी तालियों पे ज़िन्दा ढाई अन्य साहित्यपीठों की धूलसनी अलमारियों में कभी ब्रह्मपुत्र का मैदान, कश्मीरी सूनसान खुलता भी है तो साहित्य के बियाबान में ही खुलता है, घमासान में हमेशा दो कौड़िया सूचकांक, प्रेमकथा विशेषांक रहते हैं. तीन तिलंगों की तिगड़बाजी एक बूढ़े का प्रलाप और कुलजमा डेढ़ पत्रिकाई प्रताप होता, फकत चार शहर, बहत्तर गांवभर के झमेलों, फटे चादरों के मेले में साहित्यिक खेला होता है. एक कहानी का जन्म होता है.
नई उम्र के साहित्य-धांसू को छेड़कर साहित्यिकी की टोह लीजिए, देखिएगा, चेहरे पर मुर्दनी गिराये खबरदार करेगा, ‘सब गोबर है!’ और फिर उतनी ही निश्चिंतता से, दांत चियारे आत्मविगलित सूचना में नहलाये जाएगा, ‘वो सिर्फ़ मेरा है अनूठा, अनुपम है. अपने साहित्य में मेरी बड़ी आस्था है!’ वैसे ही जैसे शरद पवार की स्वयं में और आपकी बीवी की आपके बच्चों में है. प्रकाशक की दो आलोचक और सात सरकारी अफ़सरों में है. पाठक की टेलीविज़न और अख़बारों की स्थानीय अधिकारियों में है. इस बंदसभा में अनुवाद किसी साहित्य-सुगंधी की खोज में नहीं निकलती, दूतावासी सांठ-गांठ की चार कौड़िया कमाइयों के मोह में मिलती है, मरते-मरते बारहा कैसे तो कुजन्म होता है. एक कहानी का जन्म होता है.
स्कूलों के मास्टर दल बांधकर साहित्य हांक रहे हैं, हालांकि फिर भी सच यही है शालाओं से हिन्दी बहरियाई गई है. घर में माएं हांफ-हांफकर बेबी और बाबू लोग से अंग्रेजी संवादालोड़न आजमाय रही हैं. हैरतअंगेज़ कभी जांघ के नीचे छिपी कभी कांख की फुंसी सा निकली आती है हिन्दी, नवोदित कवियत्री की अपने नाम तक की हिज्जे की ग़लती में, लजाकर मुस्कराकर कहती हैं, ‘ओ शिट! क्या बताऊं एकदम प्रैक्टिस छूट गई है!’ प्रैक्टिस में होने की प्रैक्टिस लगी रहती है, नंगी हिन्दी में कपड़े की कहानी की कहानी तक मुहैय्या नहीं होती. एक कहानी का जन्म होता है.