Wednesday, October 12, 2011

छोटे शहर में..



दिन की छाती पर सवार
कमअक़्ल क़ाहिली रंगियाती है मंज़र
हरियाये बाइकर्स लड़ि‍याये चूतियामदन
मीसते हैं सैरे, रोज़ का जीवनधन
खरीदारियों के मेहराये ठेलों पर होता
चीकटइयों का बसाइन आधुनिकीकरण
बेमुरव्वत फ़ि‍ज़ाओं में बेहया पादों-सी
धड़धड़ाती छूटती इमारतें, फूटतीं
किसी तीन साला बच्ची का कूकना भी
मोबाइल के कैमरे के क्लिकयाने का बहाना होता
जैसे चमकती, नई सुबह में घर से निकलना
फिरंगी जोगर्स जूतों को आजमाने का
बाप की बूढ़ी भारी, हांफी सांस
सिरे से उठती, पसरती जाती
नाख़ून पर खिंचा भोंथरा चोट दीखता
तुम्हारे खरीदे नये कपड़े दीखते
तुम नहीं दीखतीं
मानो ख़याल थीं कोई
और ख़यालों की इस जगह में कोई जगह नहीं
जैसे लेटे में मैं खुद को भागता देखता
और किसी सूरत अपनी पकड़ नहीं पाता.

3 comments:

  1. जी, वास्तव में छोटे शेहर में... क्या है कि बड़े शहर इससे ज्यादा विभत्स्व होते हैं

    ReplyDelete
  2. क़ाहिली नहीं काहिली। नेट पर उर्दू पढ़ने का भी शौक़ पालिए थोड़ा।

    ReplyDelete
  3. हम सोच रहे हैं हमारा शहर छोटा है कि बड़ा! कि शहर है भी कि नहीं! :(

    ReplyDelete