Wednesday, October 26, 2011

आह रे दिवाला..

दुनिया में कौनो जगह हो, कोई सा भी अवसर हो, उसमें उपस्थित होते ही मोटलकुमारी, सब नियम और सौजन्‍यता गोड़ से एक ओर ठेल, देह के लिए जगह निकालकर तड़ देना लेट लेना खूब जानती हैं. इंची-टेप से लंबाई में चार फुट नौ इंच का जगह का छेका बनता है (चौड़ाइयो में, जल्‍दी ही, मो कुमारी इतना ही बिस्‍तार पा जायें ओ में कौना आश्‍चर्ज नहीं! क्‍योंकि भकोसती तो रहती है हरामखोर, दायां-बायां जो हाथे चढ़ जाये, मूढ़ी-सन्‍देश, चिनिया बदाम, पापड़ी, प्‍याजी, डीम के तरकारी, कोंहड़ा के फूल का पकौड़ी, बीच में नारियल का चटनी धरके पावरोटी, जौनो सामने दीख जाये, मोटलिया खसोट सके! चंदरमोहन तो कहते हैं उन्‍होंने भैंसीन को थरिया के दाल में चोरी से ग्राइप वाटर मिलाके सर्ड़-सर्ड़ पीते देखा है! देखा ही होगा. कवनो ताजुब्‍ब ताजुब्‍ब नहीं. मोटलकुमारी को कलाहांडी के अकाल-पीड़ि‍त एरियो में छोड़ के देख लीजिए, हरामीन छत्‍तीस व्‍यंजन के इंतजाम नै कै लीहिस तो हम्‍मर नाम बदल दीजिएगा! जगह का कइसे कर लेती है जी? मजाक बात है? भभुआ रोड वाला रूट पर, एतना धसर—पसर पसिंजर का बीच, जहां एगो पाद तक धरने का जगह नहीं रहता, हरामीन जाने त कवन टेकनीक से, इसको ठेल उसको ठूल के, कांख के टांख के, बस का भीतरी गोड़ ढुकाये पांच मिनिट नहीं निकलता कि बरोबर बिश्राम वाला मुद्रा में पाइल जाती है! मजाक बात है जी? (भले बकिया सब पसींजर मुर्दाइल हालत में पाया जाये!) कोई जरुरतमंद का बच्‍चा, ढुलकल, तनि मोटलकुमारी का कांधा पे गिरल पड़े, देखिएगा, करेजा का छोर से कइसन दरद-बूड़ल कसाईन ओसांस छोड़ती है, जैसे जीवन-लीला का आजे, अभिये, अंत हो रहा हो! तीन मिनिट बाद, बस के उसी खिड़की पर कवनो चनाजोर गरम वाले को ठाड़ा करवा दीजिए, देखिए, जीवन लीला का आज, अभिये अंत होय रहा है का पार्ट अभिनित करे वाली नायिका कितना फुरती से चनाजोर तौलवा रही है! दुनिया में नवटंकीबाज जनाना का कमी नहीं है, मगर मोटलकुमारी का नवटंकी, फार, फरदेस्‍ट बियांड कंपरीजन!

हरामीन को कवनो निर्दयी पुरुष बियाहे कै के लिये गए होता! कि पल्‍ली का लोग चैन का सांस लेते, पूड़ी और पुआ छानते, छेना का मिठाई खा सकेंगे का सपना देखते. क्‍योंकि मोटलकुमारी के पल्‍ली में रहते तो और केऊ कुच्‍छो खा सके का सोचना सपने ही देखना है. हरामीन के मुंह में कब्‍बो छाला और पेट में कीड़ो नहीं पड़ता. सुबह-सकाली अभी जब पंडिजी का पंजीरी और चरनामृतो तैयार नहीं हुआ होता, कितना लोग दिसा-मैदान से फारिगो नै हुए होते, भकोसनकुमारी तीन दोना दही-बड़ा साफ कै गई होती! और अभी दांत में बड़ा फंसले होता कि सोना माउसी को आवाज दिये बिना बाज नहीं आती, कि का माउसी, रात में तीन कनस्‍तर नीमकी तू बनाई हो और चाय पिये हम कहिंयो अउर जायेंगे?

रे मलेच्‍छकोआंरी, सुधर जा रे? मगर काहे ला सुधरेगी? ई मुलुक तनिको सुधर रहा है?

भैंसीन अभी जो है राजू गनेशन का दोहन कै रही है. बारह साल का छौंवा, बेचारा रजुआ, शोषन में सूखके छोहाड़ा हो रहा है. मोटलकीकुमारी के देह दाबना कवनो हंसी-मजाक है जी? आपके देह के सब ताकत का अंत हो जाता है मगर भैंसीन के देह का नहीं होता! देह का होइयो जाता है तो हरमखोर के इच्‍छा का नै होता! डेढ़ घंटा कंड़वाने, खून चुसवाने के बावजूद मुंह खोलबो करेगी तो यहीये बोलने के लिए कि ओह, बयंका कांधा से केतना दरद उमिड़ रहा है! अउर उधर दायें कमर का नीचे नहीं कांड़ोगे, राजू मुन्‍ना?

जबकि रजुआ गनेशन मथवा में अम्‍मां जवनो नारियल तेल का थापा चढ़ाये होगी, सब सामना का बाल और भौं का जंजाल से बहा-बहाके, नथुना फुलाये, खूंखार एमजीरआर हो रहा होगा, मगर क्‍या मजाल कि भकोसनकुमारी एतनो के बवजूद बाबू बच्‍चा को अपना खूनी चंगुल से निकल जावे दे? न्‍ना! पीठ के बाद अब बीस मिनिट वाला पेटकुनिया वाला करवट लेगी, देह कंड़वाये का स्‍वर्णिक आनंद में बूड़ल, आंखी मुंदल, दरद-नहाया गुनगुनाइन (ओह, केतना कसाईन) शुरु करेगी, ‘रोला के गया सपना मेरा, बइठी हूं कब होगा सबेरा..’

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