
गरीबी के सैरे में ठिठककर खड़े होने के बाद, फिर तेज़ी से दौड़ लैने का कौशल संदीप पाल ने सीख लिया था. दीपशिखा गोप सीख लेने से बार-बार खुद को बचा ले जाती. बाकी लड़कियां गुट में बैठकर हाथों में मेंहदी रचतीं, दीपशिखा मासी की गाय का सानी करने चली जाती. दीवाली के वक़्त पड़ोस के किसी बच्चे को गोद में लिये उसके हाथ की फुलझड़ी से चेहरा रौशन करने की जगह, शोर-शराबे से दूर अस्पताल के कैजुअल्टी की बेंच पर बैठी समय गुज़ार आती. हाथ की चूड़ी और कान के टॉप में ही नहीं, पूजा-त्यौहार में भी दीपशिखा की दिलचस्पी नहीं थी, मगर दो दिन उपवास करना ही पड़े तो बिना आवाज़ किये भूखे रह लेने का सहज कौशल था उसमें. संदीप काम से लौटकर दीपशिखा की कहानी मालूम पड़ने पर सन्न हुआ उससे कहता, “तुमि पूरो पागोल, तुमि जानो तो?”
दीपशिखा ने पहले भी यह वाक्य सुना था. यह भी कि उसका व्याह नहीं होगा, वह सुंदरी नहीं है. दीपशिखा की छाती में उंगलियों की पोर पर और कांख के सूने नमियों में संगीत बजता था, वह सुनती थी, उसे किसी व्याह की क्यों ज़रुरत थी? वह गिलहरी की तरह इस ठेर से उस टेर तक चुपचाप दौड़ जाना चाहती थी, देह झाड़कर हड़ियल चेहरे पर धूप की गरमी ले लेना चाहती थी, वह क्यों चाहे जो बाकी सब चाहते थे?
मगर संदीप चाहता था, शायद इसीलिए वह इतना दौड़ता दिखता था. दीपशिखा संदीप का दौड़ना सुनकर आंखें मूंद लेती.
“गिरती ढलानों पे डेरे थे, कैसे रहस्यमयी घेरे, ढलती संझाओं में छुपे जुगनुओं के सबेरे थे..” ऐसी ही कुछ उड़ती पंक्तियां, बेख़्याली में पिरोई तुकबंदियां, माने खालिस बकवास, गुनगुनाता संदीप भागा जाता, दीपशिखा उसका हाथ थामे हंसती बेहाल हुई जाती. हंसते-हंसते थक जाने के दरमियान फिर पूछती, “तार पोर? उसके आगे?” संदीप भागने की बहक में गाल में तर्जनी धंसाये सोचने का अभिनय करता कहता, “रात और दिन दीया जले, फिर भी मगर जाने केनो आंधारा है..” हंसती दीपशिखा संदीप को मारने लपकती, “शड्अप! चुप्प!” दौड़ते बेहाल दोनों गिर पड़ते. लस्तम-पस्तम की बेध्यानी में पिंडलियों में कहीं ठोकर लगती, या यूं ही कहीं नस खिंचने की तक़लीफ़ में दीपशिखा के मुंह से दबी आह छूटती, “मेरा हुआ!”
“कहां? कैसे?” घूमते आसमान में घूमती दीपशिखा के चित्र को स्थिर करने की कोशिश करता संदीप कहता. साड़ी और साये को ऊपर सरकाती दीपशिखा दर्द टटोलती, कि चोट कहां है. संदीप मुंह बनाकर कहता, “मुझे बस दीख रहा है कि तुम पैरों के बाल कभी शेव नहीं करती.”
दीपशिखा कुहनी से संदीप को परे ठेलकर कहती, “मुझे भी दिखता है तुम्हारे नाक की उगी हुई फुंसी. भौं पर कटे का निशान.”
“और कंधे पर? पीठ पर?” संदीप वापस दीपशिखा के नज़दीक आकर मनुहार करता.
“कंधे की खिंची हड्डयां. पीठ पर चोट खाया एक चांद..”
“मगर पसलियों की नुमाइश तुम्हीं दिखाती हो, ना की, ना की? बोलो! कितनी बार गिना है मैंने?” हंसते हुए संदीप कहता.
“इसलिए कि तुम्हें गिनती का शौक है,” पैरों पर साड़ी गिराती दीपशिखा बोलती, “मुझको नहीं है.” वह ज़मीन पर पेट के बल लेट जाती.
“फिर किसका है?” संदीप दीपशिखा के नज़दीक लेट कर बोलता. अब दोनों एक दूसरे की सांसों की बहक सुन सकते. हालांकि दीपशिखा ज़मीन से लगे अपने गाल पर सोई घासों का जलना सुनती होती, फुसफुसाकर कहती, “मैं सुनती हूं.”
“मगर पैर की उंगलियों पर चढ़ा नेल पॉलिश सुनाई नहीं देता. बांह पर बंधा काला तागा, मेरी बनियाइन का फटा, मासी के पैर के बिवाय, उनके गाय की फटी आंखें, मेरी उंगलियों का कांपना दीखाई देगा, तुम्हें सुनाई नहीं दे सकता.”
“मैं सुनती हूं,” घास के अंधेरों में आंखें मूंदकर दीपशिखा बोलती.
ढलान से नीचे रेतभरा एक ट्रक गुज़रता होता. रपटी बकरियों का एक झुंड बेतहाशा सड़क के किनारे भागा जाता, साइकिल की हैंडिल पर मछली का झोला टांगे शंखधर मैत्र ढलती सांझ की लकीर पर लौटते; संदीप की आंखों में वह समूची दुनिया धुंधलके का उजास-सा अस्पष्ट बनी रहती, सिर्फ़ दीपशिखा की नंगी पिंडलियों के महीन रेशों में घने जाल नज़रों में तैरते रहते.
दीपशिखा विक्षिप्त मां के अकेलेपन के सूनसान का बुदबुदाना सुनती. छोटे भाई खोकोन की बहू की निस्संग, आत्मलीन खुशी का बाजा बजाना, भाई की लापरवाह थकान और किसी सूरत में जो जैसा है, चलता रहे, की तरतीब भिड़ाने की बेचारगी, खुद अपनी जवानी का बेआवाज़ गुज़रते जाना, दीपशिखा सब बिना आवाज़ किये सुनती.
“एक तंग छोटे से घर में कितनी खुशी आ सकती है? कहां से आ सकती है?” दीपशिखा उमस नहाई गरदन पर हाथ फिराती कहती.
“उस तंग छोटे से घर में पहुंचकर आखिर तुम्हें मैंने खोज लिया, नहीं खोजा? उसे नहीं सुना तुमने?” संदीप कहता और एकदम उदास हो जाता.
संदीप पाल छोटी-मोटी नौकरी करता है, छोटी-मोटी कविताएं करता है, हंसता है तो अच्छा लगता है, उदास होने पर किसी बीमारी के असर में है जैसा लगता है. दीपशिखा संदीप से प्यार नहीं करती, प्यार जैसा प्यार दुनिया में किसी से भी नहीं करती, मगर संदीप बीमारी के असर में लगे सो भी नहीं चाहती. दांत दिखाये जवाब देती, “मैं सुनती हूं तुम मुझसे पूरे पांच वर्ष छोटे हो! फिर मुझसे व्याहकर वह कुछ भी नहीं पाओगे जो तुम्हारी उम्र के तुम जैसे एक होशियार लड़के का पाने का हक बनता है!”
“ऐसा? अच्छा? सुन लेती हो ये सब?” संदीप आंख चढ़ाकर चिढ़ा सवाल करता.
दीपशिखा होंठ भींचे मुस्कराती सिर हिलाती जवाब देती, हां हां.
दीपशिखा की हड़ियल देह पर के टूटे बटन वाले ब्लाउज़ के भीतर किसी रहस्यलोक की रक्षा के सरंजाम के बतौर बताने लायक ब्रेसियर जैसा कोई ब्रेसियर नहीं होता. उधड़ी हड़ियल छातियों पर किन्हीं चांद-सितारों के रहस्यमयी अरमान भी नहीं टंके होते; उन पर संदीप के गिरे चेहरे के घने बालों पर दुलार का हाथ फेरती दीपशिखा कहती, “पूरो पागोल तुमि, यहां कुछ नहीं है तुम्हारे लिए, तुम्हें क्यों नहीं दिखता? ”
किसी चिड़िया के नम होंठों की तरह दीपशिखा की छातियों को अपने मुंह और आंख के सपनों में कैद करता संदीप फुसफुसाता, “मेरी चीख़ तुम्हें सुनाई नहीं देती? कुछ सुनाई नहीं देता, तुम बहरी हो!”
आंखें मूंदकर दीपशिखा मुस्कराती, “हां, हूं. जैसे तुम पागल हो, इस जनम क्या किसी जनम मैं शादी करनेवाली नहीं..”
नीचे कोई बदतमीज गिरहत्थिन फिर बेसुरा गाना शुरु करती, “रात और दिन दीया जले..”
1 comment:
रात और दिन दीया जले, फिर भी मगर जाने केनो आंधारा है..”
अंधारघर के ढिबरी कैरियर्स..
फिर भी अँधियारा है
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