Wednesday, November 9, 2011

बेताल सत्‍तीसी, कि बेताल चालीसा?..

बिजली आई. बिजली गई. फिर आई. फिर गई. जसोदा और गोदावरी दोनों बहनें फ्रॉक की बांह की सिलाई के वाजिब तरीके को लेकर सिर-फुटव्‍वल कर रही थीं, अजीजन बी की फुलझड़ी “आग लगे इन हरामिन को!” को सुनकर पटा गईं. अंधेरे में गोदावरी माथे के जुएं टटोलने लगी. सिर पर जसोदा के हाथ का पटका पड़ा, “दुई मिनट चैन से बिठात ना है?”

गोदावरी बहन पर एकदम से पलटवार करना चाहती थी मगर ज़हर का घूंट पीकर रह गई.

जसोदा पंद्रहवें वर्ष में पैर रख रही थी, गोदावरी उससे दो साल छोटी ठहरी. जदुनंदन पंडित की दूसरी पतोहु और अपनी सौतेली मां की दुत्‍कारी दोनों बहनें बिना झगड़े आधे घंटे साथ बैठ नहीं सकती थीं. दोनों बहनें आधे घंटे एक दूसरे से दूर नहीं रह सकती थीं.

बुन्‍नन अंधेरे में मुस्‍करा रहे थे. सधी उंगलियां बटन टांकने में बझी थीं, अनसधी आंखें अजीजन बी की दिशा में घुमी उन्‍हें टटोल रही थीं, मन की खिलन खुदी में सहेजे रखना और संभव न हुआ तो हारकर बोले, “फूफी, तू हम्‍मर बियाह कराय दो!”

इतने में बिजली आ गई. गोदावरी और जसोदा ने एक सुर ताली बजाई. नाक के बीच मोटी ऐनक दुरुस्‍त करती अजीजन बी ने खरखराती लम्‍बी सांस छोड़ी. मशीन के नीचे सीधा करने को पैर किया और तड़पकर फिर उसी सूरत बैठी रहीं!

जाने अब किस निगोड़ी नस ने अपना मुंहजार करम किया! देह का भारीपन ही एक दिन उनकी जान लेगा! नहीं तो चौंसठ की उमिर में कोई दीवार थामकर चलता है? कहीं चार सीढ़ि‍यां चढ़नी पड़ती हैं तो कनपटी लाल हो जाती है, पसीने छूटने लगते हैं. क्‍या करें मुये देह का, सुब्‍हो से लेकर रात तक खटती तो रहती ही हैं, ज़रा खुटुर-खुटुर की धीमी गति में खटती हैं, मगर एक्‍को दिन कहां निकलता है कि खाली बैठी हों? खाली बैठना होता तो इस उमर में इत्‍ती चिथड़े-सी जगह में यह चिथड़ा दरजी दुकान ढोती माथे पर? फिर खुद का उनका खरचा ही क्‍या है, कबूतर की सी तो खुराक है. एक बकरी है घर में, उनसे ज्‍यादा तो वह खा जाती है. हां, रात को कभी बुन्‍नन को रोक लिया तो यह बेशरम ज़रूर उस दिन की रोटियां सधा जाता है. एक बेआसरे बच्‍चे को भरपेट खिलाने की अजीजन बी को दिली खुशी भी होती है, मगर देखो, हरामी की हड्डियों पर पैसे भर का जो मांस चढ़ता हो, और वो हैं कि दो निवालों पर फैली जाती हैं!अजीजन बी ने हिम्‍मत करके अब पैर हिलाने की कोशिश की.

“बियाह होई जाई तS लइका-फइका होइहें, घरे केतना हरियाली आय जाई, ना फूफी? सब तोहार सेवा करिहें!” खुशी में नहाये बुन्‍नन का रेकार्ड जारी था.

“खूब करिहें,” अजीजन बी धीमे-धीमे घुटने और पिंडलियों पर हाथ फेरती रहीं. उनके अपने दो हैं, अल्‍ला के फजल से तंदरुस्‍त हैं, रोजगार से हैं, हाथ की तंगी की तक़लीफ़ नहीं, मोहसिन तो कम अज़ कम, दिखावे को ही सही, बीच-बीच में अपने पास गाज़ि‍याबाद चले आने की बात करता है, मज़हर के मुंह से तो कोई बात ही नहीं निकलती. कितना बखत हुआ जब पिछली मर्तबा हियां आया था, वो बुखार में थीं, नट्टन की पतोह उनकी देखभाल किये रही, कितना टैम हुआ ऊ बात को? अब सब अपनी जिन्‍नगी जीते हैं, बौआ, केकरे पास अब केहू के सेवा करे की फुरसत है, महतरियो खातिर नहीं है!

“लइकन हम्‍में बहुते पसंद हैं, फूफी, बस तू एक बार हम्‍मर बियाह कराय दो, देखS कउने इस्‍पीड से लइकन तोहर आगे सजावत हैं!” अधमुंदी आंखों आसन्‍न खुशी की सोच-सोचकर बुन्‍नन निहाल हुए जा रहे थे.

“और लइकन के खियइबे कहां से रे?” फूफी ने लाल लुकाठी फेंकी.

बेहया बुन्‍नन की खुशी को ज़रा हरज न पड़ा, वैसे ही मुस्कियाये बोले, “का फूफी, हमके रोज रोटी खिवायत हऊ, हम्‍मर लइकन के न खियउबू? ऊ तोहरो तs होइहें!”

अजीजन बी बरसीं, “तू पैदा करे और खियाये के ठेका हम उठाईं? चइली-चइली पीटके तोहर चाम ना उधेड़ दीं?”

गोदावरी व जसोदा द्वय मुंह पर हाथ धरे खी-खी में उमगती रहीं. चइली की चोट की आशंका में बुन्‍नन खिसियाये नहीं, अधमुंदी आंखों मुस्कियाते ही रहे.

गो बुन्‍नन की उम्र अट्ठारह की हो रही थी, बाहर से देखने पर जसोदा से डेढ़ बरस छोटे ही दिखते. सोच-विचारने की उम्र गोदावरी से भी कम थी, और आगे भी मालूम नहीं कब तक ऐसी ही रहे. कौन जानता है शायद हमेशा ही रहे, अजीजन बी सोचीं और हलक में एक उदास घूंट पीकर रह गईं, चइली फेंकने के अपने गुस्‍से पर शर्मिंदा हुईं ऊपरी मन से बात बनाती बोलीं, “और तोसे होनहार के के आपन लइकी दी, बताओ जरा?”

बुन्‍नन उंगलियों से अगले बटन की जगह टटोलते मुस्कियाते रहे, मुस्कियाये-मुस्कियाये सोचते रहे. फूफी गोदावरी की तरफ पलटीं, “तैं करबे रे बियाह बुन्‍नन से?!”

“मियां से हम कब्‍बो बियाह ना कर सकीत हैं,” गोदावरी ने चट सिर झुकाकर गंभीरता से कहा.

जसोदा मुंह पर हाथ धरे हंसती रही, “एक तs मियां, ऊपर से लंगड़, अऊर हमसे तs उमिरो में छोट है, हम्‍मर तs बाते भूल जाओ, फूफी!”

अबकी अजीजन बी से भी मुस्‍कराये बिना रहा न गया, “सुन लेव, मियां जी!”

जसोदा का कसूर था भी नहीं, बुन्‍नन सचमुच उससे उम्र में छोटे लगते थे. फिर बायें पैर में सच्‍चो एकदम ताक़त न थी. ऊपर से कंधे से लेकर पसलियों के बीच तक जली हुई पीठ के साथ बड़े हुए थे. आंखों में उतनी ही रौशनी थी कि ज़ि‍द ठानकर किसी चीज़ को देख लें, मगर फिर घंटों गनगनाता सिर हाथों में लिये बैठे रहने की नौबत भी हो आती थी. ग्‍यारह की उमिर के रहे होंगे जब फसाद में पूरा परिवार उठ गया गया था. यही बहुत था कि पिछाड़े की गली में कमरबंद संभाले तन्‍ने की साइकिल के पीछे भागते उनकी नन्‍हीं जान बच गई थी. अब चूंकि जलती आंधी के चपेटे में पूरा महल्‍ला आया था, थोड़ी कीमत बुन्‍नन को भी चुकानी पड़ी. हाय-तौबा की भगदड़ में किसी जलते ड्राम से टकरा गये, पैर फिसला और गिर पड़े. होश लौटने पर जिस सूरत में खुद को पाया आज तक उसी जली, तबाह को साथ लिये घूम रहे हैं. मगर चेहरे की मुस्‍कान तो आज भी कोई उनसे छीन न सका है. दो मीठी-मीठी बातें करके बुन्‍नन से उनका सिर उतरवा लो, देखो, कैसे खुशी-खुशी अपने हाथ अपना सिर उतारकर आपकी हाथ में धरते हैं!

“ई बकलोल संगे के बियाह करी, केऊ ना करी!” जसोदा दीदी ने अपनी ओर से आखिरी फ़ैसला दिया. गोदावरी बबुनी खी-खी में निहाल होने लगीं, इतने में निगोड़ी बिजली फिर गई.

दुबारा आई तो अपने साथ पांच साल की रौशनजहां मुनमुन सिंह को लिये आई. हमेशा की तरह, चिरकुट कपड़ों और कांथे में लिपटी, मुनमुन की दुलारी गुड्डन रौशनजहां के चंदोवे छाती पर सो रही थी.

मशीन के सामने बच्‍ची पर नज़र जाते ही अजीजन बी का थका चेहरा खुशी में खिल गया, शरारत से हाथ नचाती बोलीं, “का हो, मुनमुन, तू हम्‍मर बुन्‍नन से बियाह करबूs?”

फूफी के सवाल से नन्‍हीं मुनमुन फेर में पड़ गई. आधा दर्जन बेटियों वाले राम इकबाल सिंह के परिवार में हमेशा चिखचिख मची रहती और मुनमुन के लिए अपनी गुड्डन को दो कौर खिलाना, या चैन से एक घड़ी किसी कोने सुला लेना, मुहाल था. उससे बड़ी बहनें हमेशा उसके सिर चढ़ी रहतीं, या वह गुड्डन को सुलाने का जतन करती होती कि मां छुटकी उसके हवाले करके आटा सानने चली जाती, गुस्‍से में मुनमुन का दिमाग ‘फेल’ हो जाता, अभी भी दिमाग फेल ही हुआ है जो वह सबसे जी छुड़ाके भागी आई है, मगर इस भागे में व्‍याह कर ले? अभी, इतनी जल्‍दी? मुनमुन सोचती रही.

सोचकर समझदार पुरइनों सा बोली, “अब्‍भी तs हम्‍म इस्‍कूलो ना गये, कइसे बियाह कइ लें. हां, बुन्‍नन हम्‍मर गुड्डन से बियाह कइ सकत हैं! वइसहो हम्‍में गुड्डन खातिर एगो दुल्‍हा के दरकार रहा.”

जवाब सुनकर बुन्‍नन लाजवाब हो गए. मुनमुन के मुंह का कुछ भी सुन लें, उनकी गोद में चढ़कर बच्‍ची कुछ भी कह दे, उनकी नाक खींच ले, भौं बकोट ले, बुन्‍नन का मन मनभर खुशी में डूब जाता है, और फिर देर तक डूबा रहता है. फूफी इतना भर कह दें, "रौशनजहां, हियां आवs बौआ!" बुन्‍नन के कानों में बरफी और कलाकंद पिघलकर बरसने लगता है. दिक्‍कत यह है कि ऐसे मौक़े बहुत बनते नहीं. मुनमुन फूफी की दुकान के दौरों पर आती भी है तो पीछे-पीछे उसकी खोज में उसकी बड़ी बहनें भी चली आती हैं. फिर कुछ के कुछ की कहा-सुनी में कुछ कटी बातें फूफी को भी सुनना पड़ती ही हैं. ऐसे मौक़ों पर तब बुन्‍नन को अपनी चाहना से फिर शरम लगने लगती है. इसीलिए तो बियाह करके अपने बच्‍चे पैदा करना चाहते हैं. एक नहीं चार-चार मुनमुन होंगे, नाक-आंख काटकर बुन्‍नन को जीना मुहाल कर देंगे! कितना अच्‍छा लगेगा! ओह, सोचकर मन तर जाता है. मगर मुनमुन के भी क्‍या दिमाग है, अपनी गुड़़ि‍या से व्‍याहना चाहती है! कहीं गुड्डन से बुन्‍नन का व्‍याह थोड़ी हो सकता है!

फूफी भी मुनमुन को यही समझाती रहीं. मक़्क़ार मनभर खायेगी परातभर सोएगी, काम एक घेले का ना करेगी, और बच्‍चे तो कवनो सूरत न जनेगी, फिर किस उम्‍मीद आदमी ऐसी दुलहिन घर लाये?

मुनमुन का चेहरा उतर गया. बुन्‍नन उदास हो गये.

गोदावरी के “चकलेट खइबू, मुनमुन?” को अनसुना करके मुनमुन तेजी से बुन्‍नन के गोदी चढ़ गईं, नाराज़गी से बोली, “तs हम्‍म इस्‍कूल न जाईं? अउर कालिच? हमें डाकटर बने का है, गुड्डन के रोज-रोज सरदी पड़त है, ओकर इलाच के करी? हमसे बियाह करे के है ते तs तोके अभी इंतचार करे के पड़ी, करबs?”

बुन्‍नन से चेहरा भिड़ाये मुनमुन बुन्‍नन के कान नहीं खींच रही थी, लेकिन उसके सवाल की गरमी में कान खींचने का सा ही शोर था. उस गरमी में नहाये बुन्‍नन वापस मुस्कियाने लगे. जली पीठ पर मानो किसी ने फूलों की लतरों की छत छवा दी हो, उस नेह-नमी में लगभग लजाते-लजाते बोले, “करब, मुनमुन, करब!”

गोदावरी और जसोदा मुस्‍करा दीं. अजीजन बी चश्‍मा साफ़ करने के बहाने नम आंखें पोंछने लगीं, मुनमुन ताली बजाकर हंसने लगी. कौन पाजी न हंसता?

अबकी बिजली गई तो उस ज़रा सी उजाड़ जगह में अभी भी बहुत रौशनी बची थी..

1 comment:

  1. बहुत मजेदार, जबरदस्‍त.

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