Wednesday, November 9, 2011

जगहदीन के रंग औ' रौशन..

कितनी रौशनी है जगह कितनी है, धीमान? पैरों से एक चक्‍कर लगाना हुआ तो, ठीक से किसी को समझाना हुआ तो, कितनी है कितनी है, जगह कितनी है, धीमान?

नाक की सीध में साढ़े पांच कदम चलता हूं उसके बाद सामने खिड़की खड़ी है, नहीं, उजाला खिड़की में नहीं बिजली की बत्‍ती में पड़ी है, खिड़की तो सामने लगी दूसरी इमारतों की पीठ में जड़ी है (आलमोस्‍ट, खिड़की प्रतीकात्‍मक है, मित्र, जैसेकि इस अभागे मुल्‍क की राष्‍ट्रभाषा है, है है और नहींये है, इज़ंट ईट? इट्स सो फ़न्‍नी ना? इट्स सो फकिंग फ़न्‍नी दैट इट प्रोवोक्‍स माई डोरमेंट प्रोस्‍टेट, एंड हू नोज़ इफ टुमोरो वन विल बी पिसिंग ब्‍लड?), और अब तुम सामने की इमारतों की तो नहीं ही पूछना, उनका होना तो बस मेरे एड्रेस की नाक चढ़ाना और उनकी अपनी कटाना है, उससे ज़्यादा हमारे आपस का क्‍या सम्‍बन्‍ध, इतना यही ना कि हम शहर के आंकड़ों में हैं और वो रोकड़ों में, रोकड़े होंगे तो इमारत मज़बूत होगी ही, बड़ी और महंगी भी, क़ायदे से तो मुझे खुश ही होना चाहिए कि मेरी खिड़की को छेके खड़ी हैं, चिन्‍ता मत करो क्‍या मालूम एक दिन खुश भी होने लगूं, मगर इससे ज़्यादा उनके बाबत कभी जानूं कुछ बता सकूं की हालत में माफ़ करो कभी नहीं रहूंगा, इंसिस्‍ट करोगे तो आऊटलुक, इंडिया टुडे, एचटी के सप्‍लीमेंटों से खोजकर उसके आंतरिक डिज़ाइन की तुम्‍हें फ़ोटो दिखला दूंगा.

ओह, हाऊ डिस्‍ट्रैक्‍टेड यू आर, धीमान? मैं तुमसे तुम्‍हारी रौशनी और जगह पूछ रहा हूं तुम पड़ोस की इमारतों में उलझ रहे हो, आयम नो बायर तुम्‍हारा दोस्‍त हूं, यू रिमेम्‍बर? जस्‍ट अ लिटिल बिट प्रेस्‍ड विद् टाईम!

वी आल आर, कैन आई हैव अ स्‍माईल? मेरे यहां तो आई स्‍वेयर सभी कुछ प्रेशर में है, रौशनी का तो पूछो मत, हमेशा बेचारी शरमाई घबराई रहती है (महीने के आखिर रेलायंस एनर्जी है जो बिल बनाते में शरमाता नहीं), मगर इस देश में, जहां अभी भी बिजली बोलने से पहले लोग इंवर्टर बोलते हैं, मैं क्‍यों क्‍या रौशनी की इतनी कहानी बनाऊं, रहती है रौशनी, हाथ की रेखाएं और इतने और उतने भर दिखते दीवारों की गंदगी पढ़ सकता हूं, पलथी मारे पंखे की हवा के नीचे बहल सकता हूं (पलथी मारने जितनी जगह है, और हां, तुम दूसरी हवाओं का मत पूछना, शहर-समुंदर एंड ऑल दैट, मैं सिर्फ़ पंखे की हवा का जानता हूं, बस की खिड़की पर बैठे किसी हवा के झोंके ने उनिंदियाया होगा तो वह बारह वर्षों पहले का क़ि‍स्‍सा है, और ऐसे कुलजमा साढ़े तीन क़ि‍स्‍से होते हैं जीवन में, जैसे समुंदर में नौका-विहार के, उसका सामान्‍यीकरण करके पंखे की हवा से मेरे अंतरंग संबंध को कमतर मत करो, जितना जीवन में मां को और पिता को नहीं जाना, उससे कहीं ज़्यादा इस पंखे की हवा को जानता हूं दैट्स अ फैक्‍ट), इस इतनी ज़रा सी जगह में यह भी सच है कि दीवारों से टकराता रहूं, मगर शहर के शोर, आदमख़ोर में मुंह धंसाने से कम घिनौना दीवारों से सिर भिड़ा लेना लगता है, दोस्‍त, तुम कहोगे, और सही ही कहोगे, उल्टा-सीधा सिकुड़ा संकीर्णयाया जीवन यह जो जी रहा, वाजिब शहरी व सामाजिक आचरण नहीं, मगर तुम्‍हीं बताना, सच्‍ची, शहर और समाज अब हमसे मामूलियों की कहां पकड़ आता है, शहर के बाइस्‍कोप से शहर पहचानने की जगह मेरी धंसन में शहर की तस्‍वीर बुनो, कैन यू? वर्ना तो सब तरफ़ शहर की स्‍थूल सेंसेशनल फ़ि‍ल्‍मी इमेज़री है ही, खरीद के काउंटर हैं धंधों की बाजीगरी है, त्‍यौहारी शोर है, समाज में किसकी दिलचस्‍पी और सामाजिकता का कहां ज़ोर है? आई मीन, कमॉन मित्र, आप हैं कहां खड़े?

धीमान, धीमान? विल यू शट अप एंड गिव मी अ क्‍लि‍यर पिक्‍चर, प्‍लीज़? हैलो हैलो, हू इज़ देयर ऑन द अदर साइड, कैन यू हियर मी?

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(कल अख़बार में दिखी एक ख़बर के अंधियाये अंजोर में)

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