
क्लास में फ़र्स्ट आने से अलग सैदुल्ला की कोई पहचान नहीं थी. उसे फिरोज़ ख़ान, जितेंद्र की फ़िल्मों के नाम नहीं पता थे, ना ही ऑस्ट्रेलिया के सबसे डेंजरस बॉलर के बारे में कोई जानकारी थी. जबकि बेनी का बड़ा भाई बैंजो बजाना जानता था, सुदीप्तो रथयात्रा के रथ पर घंटे भर के लिए चढ़ा था, संजय गुरुवारा (उसके पापा अस्पताल के स्टोररुम में काम करते थे) असल ऑपरेशन थियेटर के अंदर जाकर घूम आया था, प्रोबीर मंडल सोनापानी वाले टूर्नामेंट के एक ओवर में दो चौके और दो छक्के पीट चुका था. बलविंदर कोहली के घर में रेकार्ड प्लेयर था और उसकी मां रसोई में लौकी का कोफ्ता बनाते हुए गुनगुनाया करती, कृष्णन साइकिल के राड और कैरियर पर दो लड़कों को बिठाकर पंद्रह मिनट में दीपा टाकीज़ की दूरी नाप लेता, जबकि सैदुल्ला के हाथ अभी भी साइकिल चलाते में कांपते थे, देह तनी रहती और तनाव में गोरा चेहरा सुर्ख़ लाल हो जाता और कोई उसके कैरियर की तरफ चढ़ने को लपके, उसके पहले ही वह साइकिल से उतर जाता! सच्चाई थी सैदुल्ला साइकिल चलाना जानता नहीं था. चमड़े के जूते और दो जोड़ी लाल मोज़ों और क्लास में फ़र्स्ट आते रहने की कमाई के सिवा सैदुल्ला के पास कुछ नहीं था. सैदुल्ला कुछ नहीं था. सच्चाई थी सैदुल्ला से सुधीर को नफ़रत थी.
क्लास में मनप्रीत, शंकर और सेक्शन बी से सुकांत तीन लड़के थे जो नदी पार पहाड़ियों की दूसरी तरफ़ आदिवासियों का गांव घूम आये थे, निकलने के ठीक पहले सुधीर की हवा निकल गई थी कि भैया को पता चल जाएगा और उसकी पिटाई होगी और वह नदी-पहाड़ और आदिवासियों का गांव घूमने से रह गया था और उसमें सैदुल्ला की कोई भूमिका नहीं थी. मगर फिर भी सुधीर किसी को पीट देना चाहता था. अच्छा होतो वह सैदुल्ला को पीट सकता. हालांकि सुधीर की देह में जान नहीं थी और डील-डौल में सैदुल्ला उस पर भारी पड़ता. लेकिन नफ़रत की अपनी ताक़त होती है. और वह शरीरी ताक़त पर हमेशा भारी पड़ती है. नफ़रत की ताक़त में आक्रांत सुधीर दास आंटी के जामुन के पेड़ चढ़कर उसकी फुनगियों तक पहुंच जाता, जबकि सब जानते कि उस ऊंचाई तक पहुंचने के बाद जामुन के पेड़ से नीचे ज़मीन पर लौट आना असंभव है. फिर दास आंटी को ख़बर हुई कि कोई पेड़ पर चढ़ा है तो वह नीचे से बंगला में गालियां देतीं ढेले मारतीं. पसलियों में एक ख़ास झुरझुरी महसूस करता सुधीर लेकिन तब दास आंटी की गालियां, ढेले, मौत किसी चीज़ की परवाह नहीं करता क्योंकि वह अपने भीतर की नफ़रत और गहरी उदासी से किसी भी सूरत मुक्त हो जाना चाहता था! इसीलिए तब बलविंदर की मां के हाथ के बने उसे प्याज़ के भजिये भी पसन्द नहीं आते, न बलविंदर का चित्रा सिंह की ‘तुम्हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहां जाते’ सुनते हुए ऐसे मुंह बनाना मानो कोई उसे कान के रास्ते करैले की बरफ़ी खिला रहा है, या उसके कंधों में स्क्रू-ड्राइवर घुमा रहा है, और उसके बाद सोफ़े के पीछे जाकर खड़े हुए सवाल करना कि “यार, कहां से निकालती है ये ऐसी आवाज़? तू समझ रहा है मैं क्या कह रहा हूं? माने परेशां रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ ये ऐसे नहीं गाती..”
बलविंदर उसका इतना गहरा दोस्त था क्यों नहीं समझता कि जैसे, जहां से भी गाती चित्रा सिंह सुधीर को परवाह नहीं थी.
सुधीर को दरअसल प्रीति जैन की भी परवाह नहीं थी जो सैदुल्ला के पीछे-पीछे क्लास में नियम से सेकेंड आती और उनका फ़र्स्ट और सेकेंड आना कुछ उसी तरह की बकवास कहानी होकर रह गई थी जैसे मनोज कुमार की फ़िल्मों में महेंद्र कपूर के गाने को होना ही होता और किसी भी मैच में ओपन करने के लिए फील्ड पर उतरते ही तीसरे ओवर के पहले सुधीर का स्लिप या मिड ऑन के कैच में आउट हो जाना! सुधीर को क्रिकेट और प्रीति दोनों से नफ़रत थी जो साइंस के पीरियड में सैदुल्ला को ऐसे देखती जैसे ‘गोपी’ में सायरा बानो दिलीप कुमार को देखती है.
सुधीर जानता था उसकी नफ़रत गहरी गड़बड़ियों का कारण हो सकती हैं तब भी वो सरस्वती पूजा के आसपास भैया की नोटबुक प्रीति को दिखाने ले गया था. भैया ग़ज़लों के दीवाने थे और उसके पीछे वैसे ही पागल रहते जैसे राजू और उसके गुट के लड़के किसी के साथ बिना वज़ह मारपीट करने को लेकर रहते. ग़ज़लों के कंसर्ट के लिए भैया दूर और अनजानी जगहों उसी हिम्मत से चले जाते जैसे पहले के समयों में लोग लड़ाई के मैदानों में पहुंचते होंगे, कृष्णन और प्रोबीर मंडल ‘यादों की बारात’ के पहले दिन का पहला शो देखने पहुंचते थे. भैया की नोटबुक अमानत अली, नय्यरा नूर, क़तील शिफ़ाई, मेंहदी हसन, जगजीत सिंह और जाने किन-किन उस्तादों की लिखाइयों से अंटी पड़ी रहती. भैया की अनुपस्थिति में सुधीर नोटबुक उलटता-पुलटता कि कोई गंदी चीज़ पढ़ने को मिले और मज़ा आये. प्रीति को वह ख़ास तौर से ‘सबको हम भूल गए जोशे-जुनूं में लेकिन, एक तेरी याद थी जो भुलाई ना गई’ पढ़ाना चाहता था.
उसके बाद सुधीर की निगाह में नोटबुक आई तो वह प्रीति के पास नहीं, सिहंदेव सर के हाथ में थी और कॉमन रुम में सिंहदेव सर अकेले नहीं, पाणिग्राही, उपाध्याय सर और दास, टिग्गा आंटी के साथ बैठे थे. सिंहदेव सर जानना चाहते थे आखिर क्या सोचकर उसने प्रीति जैन को ऐसी चीज़ दी थी. ऐसे सीधे सवाल का जवाब देना सुधीर को बहुत टेढ़ा लगा था लेकिन कुछ देर चुप रहने, वह किस-किस तरह से पिट सकता है की विहंगम कल्पनाओं के बाद उसने निर्दोष तरीके से जवाब दिया था कि वह प्रीति को भैया की अच्छी हैंडराइटिंग दिखाना चाहता था!
सिहंदेव सर के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, अलबत्ता रजिस्टर चेक करती टिग्गा आंटी मुस्कराने लगीं. सिंहदेव सर यूं भी चेहरे पर बिना भाव लाये पीटने के लिए, और बहुत-बहुत देर तक पीटते रहने के लिए मशहूर थे, बोले, “तुमको क्या लगा तुम जगजीत सिंह का सवाल करेगा प्रीति तुमको चित्रा का जबाब देगा? अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की, तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की, क्यों?” उपाध्याय सर अपनी कुर्सी से उठने लगे, सिंहदेव सर के हाथ का स्केल उनके हाथ में मचलता रहा, चीख़कर बोले, “अभी बोलता काहे नहीं? दिल को ग़मे हयात गवारा है इन दिनों, पहले जो दर्द था वही है प्यारा है इन दिनों, हां, नहीं?”
सुधीर ने मन में हिसाब लगाया सिंहदेव सर से आज जितने स्केल खाये से ज़्यादा ज़रूरी है उनके हाथ से भैया का नोटबुक वापस हासिल कर ले, वर्ना भैया स्केल नहीं लात और कुहनियों से हिसाब बराबर करेगा, उसे प्रीति से इंतहा नफ़रत होती रही, वह किसी भी सूरत में ऐसी लड़की से कभी, अगले जनम में भी, शादी नहीं कर सकता, उस पर और सैदुल्ला पर तरस खाते हुए भी नहीं, बिना थूक गटके सिंहदेव सर से आंख मिलाकर सुधीर ने हिम्मत से जवाब दिया, “चित्रा सिंह क्या गाई है, कहां से गाई है, मुझे नहीं मालूम, सर, भैया सुनता है, मैं ग़ज़ल नहीं क्रिकेट कमेंटरी सुनता हूं?”
(जारी)