Monday, November 14, 2011

धीमे-धीमे, कभी

धीमे-धीमे पानी के अतल में उतरते ही सुन पड़ने लगी पंखे की घरघराहट वह मशहूर, बंद अलमारियों के खुले खुलने लगे दृश्‍यबंध, होंठ भींचे अपनी हिचकियों के बीच मैंने खोल लीं झक्‍क आंखें, चिपचिपाहटों से गुज़रते दीखने लगे जीव-जंतु जिन्‍हें खुले दिन खुली नज़रों देखने की हिम्‍मत न होती कभी बेहोशी में भी भूलकर. दीखी वह औरत जो मेरी ज़ि‍न्‍दगी नहीं मेरे ख़्याल के तवह्हुमात में भरी मुझे घुमाने, डॉक्‍टर दिखाने लिए गई थी, मैं दीखा पागलों की सभा में मरने की सूरतों की एक कार्रवाई क़लमबंद करता, सिर व कंधे खुजाता, एक बहक में सुलगकर दूसरे की फुनगियों पर फुदका गया आंखें मूंदता चौंककर जागता. सरसराते पन्‍नों की गलियों के अंधेरों के पार किताबें दीखीं जिनके बालों में एक उम्र से तेल न पड़ा था, सफ़री झोले में संतरों के ताज़ा छिलके और गंदे नाख़ूनों की पपड़ि‍यां और एक जोड़ी नये मोज़े, सपनों की चंद जवान कमीज़ें दिखीं, अलसाई, जो किन्‍हीं और शहरों में खरीदी किन्‍हीं और शहरों भूल आया था. पान की गुमटी में एक कुम्‍हलाई औरत ज़ि‍द करके हंसती, गंदे दांत दिखाती बताती दिखी कि भैया, तुम्‍हारी बहन नहीं हूं, तुम्‍हारी कोई भी नहीं हूं, तुम ग़़लती से ‘पहचान’ के सेट पर भटके आये दीवाना हो रहे हो, यहां तुम्‍हारा कोई नहीं है, कोई किसी का नहीं है. बकरियों के एक झुंड को ठुमरी सुनाता, रुलाता एक बूढ़ा कसाई दिखा, जासूसी उपन्‍यास से निकली कुछ उदास मछलियां जो ख़ून के सूराग में निकली हाईवे के ट्रैफिक में रास्‍ता भूल गई थीं.

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