Friday, November 25, 2011

बाजना बाजाओ ना ओ गान्‍ना गावैया..

ओ बुल्‍गरिया के गवैया मत आओ येह गली मत गाओ गाना, बाजना तो मत्‍ते बजाना, बिस्‍कुट और चाह पर खिंचता है दिन, भूले कब्‍बो सीढ़ी चढ़ मुस्‍की एक ऩज़र देख जाती है (उस एक्‍के नज़र में हरमख़ोर सत्रह मर्तबे लजाती है), का चाहते हो तुमरे चक्‍कर में ऊहो बंद करे ई घर का पानी-दाना? ना बाबू मत भरो बैगपैपी में हावा (फट्टल चदरा से बाजा ढांके रक्‍खो, गांजा पिये सुत्‍तल) गरीब पे रहम करो, मत छेड़ो हियां दरद के तराना.

पिट्टल सब राष्‍ट्रीयता के दरदभरा तान, पिटइलों के सोगगीत गान का बाबू अब कवन मतलब है, अट्ठारह के काननबाला अऊर अड़तालीस के बुझव्‍वलबीन सब सड़क अऊ संडास में रनबीर का कपूर साट रहे चाट रहे हैं, तुम झुट्ठे आत्‍मा का चित्‍कार हाहाकार का हिनहिनायन फैला रहे हो, काहे बाबू गाल बजा रहे हो? हमरे माफिक तीन तिलकुट होंगे गंदा बिछौना से भहराकर ज़मीनी कीच पे गिर रहे हैं, मन के बकरी घबराकर दिल के कोना तोड़ सब सुरच्‍छाकवच फोड़ जाने कवन अंधारबन भाग जाती, मिमियाती हेराये रहती दोबार हाथ नै आती है, बकिया कोई अऊर सुनता है जी? सन् उन्‍चालिसे में बूझ लिये थे ई गहिरा रहस्‍स महापरान श्री सूरजकांत, आपको अब्‍बो ले नै बूझ रहा है जी?

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