Nov 29, 2011

एक आवारा तिलवा-बंदी

दिनभर जतन किये जिन्‍हें बुहारते रहते हो

रात की गोद में फिर वही संवारते रहते हो


देखा न साथ संगत किये कभू, अमां फिर कौन हैं

जौन दीना शंकर त्रिभुवन मुरारी पुकारते रहते हो


यहां रात-दिन बरसती हैं चोटें, औ' तब्‍बो गुज़र होता है

बस इक तुम्‍हीं हो कि छाती की सीलन उघारते रहते हो


मन भर जाये कह लेना, सुन लेंगे वो दिन हम

अभी कुच्‍छ नहीं जो जागी रातें गुज़ारते रहते हो.


(यह ख़ास मिस बोकारो सुरंदरी के लिए)