
उन ज़मानों की बात है जब ज़िया उल हक़ और एलीस भट्टी के पीछे मोहम्मद हनीफ़ की रूह अभी फ़ना हुई नहीं थी. पृथ्वीराज पाकिस्तान से निकल लिये थे, गो पाकिस्तान के विधिवत ऐलान होने में तब भी अभी समय था. दुनिया में मेरे आने में तो था ही. पाकीज़ा औरंगाबाद-बंबई मार्ग पर मुझे ‘ठाड़े रहियो ओ बांके यार’ के संगीन इशारों से असमंजस में नहीं डाल रही थी, जैसाकि ‘जाने भी दो यारो’ का विनोद डिमैलो को ‘थोड़ा खाओ थोड़ा फेंको!’ के पाठ पढ़ाकर ह्यूजली कन्फ्यूज़ कर रहा था. जवाहरलाल ने तेजी से सपने देखना शुरु कर दिया था लेकिन अभी पंचवर्षीय योजनाओं के फ़रेब में गिरे नहीं थे. अलबत्ता गांधी की लाख लेक्चर व पर्चेबाजियों के बावजूद गांव गिरे ही हुए थे, और आनेवालो वर्षों में कांग्रेस के काफी ऊपर उठ जाने के उपरांत भी, वहीं नीचे, गिरे ही रहे. हालांकि नेहरू की दुलकी दौड़ में शहरों ने बाजी मार ली, गांव खेत रहे कहना ज़्यादा वाजिब होगा. लेकिन साथ ही, इस प्रसंग में कुछ नहीं कहना भी उतना ही वाजिब होगा. आई-पॉड तो दूर अभी स्टीव जॉब्स ने रेडियो की सूरत भी नहीं देखी थी. रेडियो के लिए फ़िराक़ का लिखना ‘ग़रज़ कि काट दिये ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त, वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में’ और उसे तब रेडियो पर अपनी बिगड़ी आवाज़ में मेरा गुनगुनाना भी बाकी था. मैंने पहले कहा ही, अभी मैं बाकी था. छोटे, तीन कमरों के क्वार्टर को जो मैंने बहुत बाद घर की सूरत में पहचाना, वह तब साल का जंगल और साम्भर और बारहसिंहों का ठिकाना था. या ऐसी ही किन्हीं अन्य जंगली जानवरों का[1].
गांव और जंगलों के अंधेरों से घबराये लोग तब तेल की रोशनी पर टिके कलकत्ता में ज़िन्दगी की खोज में भागे आते और थियेटर-कंपनी की तारिकाओं के छलावेभरे चकमक के पीछे, बड़ाबाज़ार की जगमग रौशनियों के नीचे गुम होते रहते. जिनकी धोती की गांठ में अभी कुछ सिक्का-धन होता वो मुन्नीलाल, या तपोधन मईती के ठेके पर ग़म ग़लत करने पहुंचते, वर्ना ज्यादों की कथा यही होती कि वे अपनी शांतिपुरी धोतियों के घेरों में उलझे फड़फड़ाते रहते, रास्तों की भटकन कहीं उन्हें पहुंचाती न होती. दीना, शंकर, त्रिभुवन, मुरारी को नहीं ही पहुंचा रही थी. अलबत्ता मुरारी के कुरते की जेब की सुनहली पन्नियों में सिहजा, अभी एक का एक टंका सुरक्षित बचा पड़ा था. मगर सुखोमोयी राखाल स्ट्रीट के उस तेलियाये पथ की तेलियायी रौशनी में मित्रगणों के चेहरे से रौनक लापता थी, इसलिए कि जिले-ज्वार का चिरसंगी बिंदेश्वर संध्या के रसअनुसंधान की उनकी यात्रा में उनके संग नहीं आया था?
“बिंदेस्सरजी ने एकदम्मे दग़ा दे दिया!” त्रिभुवन होंठों से बाहर आ रहे जर्दा की पिचकारी सड़क के बाजू उड़ाते हुए बोले.
“वो अभी पहिले गाये से फुरसत पाय लें, ‘रात की रात कभी मेरा घर, तेरा रैनबसेरा होता’?” शंकर हाथ का लाल रुमाल लहराते आंखों ही आंखों मुस्कराकर चुटकी लिये.
तो मित्रगण समझ रहे थे कि बिंदेश्वर अब उनके साथ नहीं आ सकता था? क्योंकि अब वह अपने वश में नहीं था, रात और उसके अकेलेपने का साथी था? और उसके साथ-संग के लिए बाबुलबाला की ठुमरी का कोई एक ग्रामोफ़ोन रेकॅर्ड नहीं था, दरअसल सस्ते दारु की पव्वेवाली बोतल तक न थी!
फ़िराक़ साहब होते तो गुनगुनाकर घाव सहलाते, ‘तरके-मोहब्बत करने वालो, कौन ऐसा जग जीत लिया, इश्क़ से पहले के दिन सोचो कौन बड़ा सुख होता था’, मगर जैसा मैंने पहले कहा ही, यह फ़िराक़ साहब के गोरखपुर, लखनऊ, कानपुर की महीन सवारियां, कारगुज़ारियों से पहले का क़िस्सा है. फिर बिंदेश्वर तब यूं भी उर्दू नहीं जानते थे, और बाद में भी हमेशा किबला कमज़ोर ही रहे. बंग्ला के छोटे-मोटे सरल पद टेढ़े स्वर गुनगुना लिया करते थे. छाती पर कटार चलवाने का काम भी, अल्ला-कसम, उसी रस्ते हुआ था! सुनिये, धीरज धरे सुनिये, बात खुलती चलेगी.
पड़ोस के पोखरे से नहा और धोती साफ़ कर, चाटुर्ज्या प्रेस की नौकरी से छुट्टी के दिन, बाबू ब्रह्मदेव मिसिर तंग बाईस सीढ़ियों की ऊंचाई तय करके जो उस डेढ़ तल्ला के तंग कमरे में पहुंचे तो सांझ के उस झुटपुटे बिंदेश्वर को खटिये पर औंधे मुंह लेटा पाया. उठकर बैठे तो जवान का चेहरा लाल हो रहा था. जाने भूख से कि शर्म से. सही है मनुष्य निज स्वार्थ में अंधा होता है, और प्रेस की नौकरी में रहते हुए ब्रह्मदेव बाबू यूं भी कुछ अंधाये चल रहे थे, मगर मित्र की दशा की जैसी भी, धुंधली ही सही, झलक देखकर स्वाभाविक था बेचारे एकदम-से विचलित हो गए, बोले, “ये क्या हालत बना रखी है, बच्चा? क्यों, किसने?”
धीरे-धीरे उसका भी ज्ञान प्राप्त हुआ. बिंदेश्वर झा के कुम्हलाये मुख और कृशकाय स्वर से ही हुआ.
खबर हुई झमेले की जड़ में षोडशवर्षीय बंगबाला सांओलीदेबी सरकार थी, जो घटक के सीन में एंट्री से पहले ही उनके प्रथम छोबिचित्र ‘नागरिक’ के नायक-परिवार की नायिका वाला पार्ट खेल गई थी, मतलब तथाकथित भद्र परिवार की तथाकथित होनहार कन्या को जीवन की कर्मनाशा नदी ने भद्र समाज से स्थान्तरित, पददलित, अंतत: बहिष्कृत करके झुग्गी-झोपड़ियों के अनिश्चित निराश्रय में पटक दिया था. और भद्रकन्या (नायिका) गश खाकर सन्नभाव नितांत कलाविहीन क्षण निकाल रही थी. फ़िलहाल चाटुर्ज्या प्रेस तो नहीं मगर वैसे ही एक अन्य बंगभाषी छापेखाने के बाहर लोगों को पानी पिलाकर दो पैसे कमाते हुए जीवन-यापन कर रही थी. अजी क्या जीवन-यापन कर रही थी, ऐसे में कितने ही उम्दा, पहुंचे हुए किरदार क्यों न हों (सांओलीदेबी थी. ठुमरी, दादरा और ख़याल गाती थी, बाकी की संभावनाओं का संसार अभी खुलना बाकी था!) एक बार झुग्गी-झोपड़ियों की दुनिया में पैर धरते ही यक्ष्मा और टीबी की दुनिया में का अपना अलग ही यक्षगान शुरु हो जाता है. सारी होशियारी सिर के बल खड़ी हो जाती है. बिंदेश्वरनाथ की हुई ही, जबकि वह तो उस यक्ष्माग्रस्त यथार्थ का वास्तविक पार्ट भी न हुए थे, पार्ट मात्र सांओलीदेबी का हुए थे, वह भी वेरी-वेरी पार्शियल, क्लोस टू प्लैटोनिक. ख़ैर, पार्ट हुए सत्य यही है. और सत्य और स्वार्थ की ही तरह आप ज्ञानीजन यह भी जानते हैं कि संवेदना मनुष्य को कहीं का नहीं छोड़ती. ग़ालिब छूट सके थे? दिल ही तो है न संगो-ओ-ख़िस्त दर्द से भर न आए क्यों, रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों, बताइए?
“इस सताए में तुमरी यह दुरदसा हुई है?” बाबू ब्रह्मदेव घबराये पूछे.
चेहरे को उल्टी हथेली से रगड़ते हुए बिंदेश्वरनाथ झा ने जो सीन इनैक्ट किया उसमें नायिका-नायक संवाद की दृश्यावली सतावन-प्रसंग का स्वयंमेव प्रमाण थी.
नायक (भरे कंठ से): अमीर होता तुम्हारी मदद कर सकता, सुश्री सांओलीदेबी, लेकिन ईश्वर को, समय, हमारे समाज को स्वीकार्य न हुआ मैं किसी रूप तुम्हारे कार्य आ सकूं!
नायिका (उससे कहीं ज़्यादह भरे कंठ से): जानती हूं, हृदयसम्राट, मुझे और कष्ट से न भरो. मुझे याद है अर्थधनी वह अनोखी घड़ी, जिस दिन तुमने कहा था मुझे देने के लिए तुम्हारे पास सिर्फ़ प्रेम है, जो किन्हीं कतिपय अल्पक्षणों तुमने दिया भी, अपने प्रेम का वह कोमल पुष्प-दान! मैं ही मूर्खबाला ठहरी जो उन अमूल्य क्षणों का संरक्षण न कर सकी. मेरे जीवन के वे बहुमूल्य रत्न मेरे आंचल से छूटकर निकल गए, पूजा का वह स्वर्णथाल छूटकर जाने किस अतल गुम गया! हा: जीबोन, उस प्रेममणि के विलुप्त हुए जाने के बाद भी अन्यायी, निष्ठुर जीवन तो किन्तु तब भी शेष है! (फूट-फूटकर अब क्रंदन-गर्जना करती) और रोज़-रोज़ उस निशेष को मुझे जीते जाना है, तुम्हारे प्रेमाभाव में, हे, ओ मेरे हृदयप्राण!
कंपनी थियेटर के किसी भी उज्जवलाकांक्षी मंचन से वंचित, ज्येष्ठ मास की उस क्लांत संध्या सड़क पर आवारा टहलते दीना, शंकर, त्रिभुवन, मुरारी कभी नहीं जान सके कि चिरसंगी बिंदेश्वर से दूर रहकर उस सांझ वे किस अनूठे नाट्य-प्रस्तुति से हाथ धो रहे थे.
[1] . बाद में जंगली आदमियों का हो गया. जंगली जानवर दुम दबाकर जाने किन जंगलों में भाग गए. भगोड़न की उस गौरवशाली परम्परा को पुष्ट करता हुआ मैं महाराष्ट्र के जंगल अर्थात बंबई की तरफ़ निकल आया, जहां मनुष्य की शक्ल में साम्भरों की कमी नहीं थी. आज भी नहीं है.