Monday, December 19, 2011

आंवड़ा का अचार कैसे न खायें..

सबसे आसान तरीका है आनेवाले यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कार्यकर्ता राहुलजी गांधीजी के सिपाही हो जायें, मुंह में लोहे के चनों का ऐसा स्‍वाद उतरेगा कि आंवड़े के अचार से यूं ही मज़े-मज़े बच जायेंगे. या और आसान है गंभीरली मेरा ब्‍लाग पढ़ने लगें, ऊपर से नीचे तक पोस्टों‍ का अर्थ भेदने में जुट जायें, देखें, अर्थ तरसकर बाहर आता है कि हरमखोर आंवड़े का अचार! दूसरा तरीका है वीसा को धता बताते, फ्रांस में कुसकुस, या इज़राइली कब्‍जे के लेबनानी समुंदरी तीरों पर नमक का स्‍वाद खोजने निकल चलें, जैतुन की नस चटकाती हवाओं में आंवड़ा, अमरुद, आंवले का मुरब्‍बा, मुंह के अन्‍य सब सारे स्‍वाद चट बेमतलब हो जाएंगे, आत्‍मा में सिर्फ़ एक टीस की जगह और हारी, दीवार पर सर पटकती उम्‍मीद बची रहेगी, यकीन न हो तो अभी आजमाकर देखिए. तीसरा, सबसे आसान रास्‍ता है, हाथ के सारे काम छोड़ भागकर बंबई चले आइये, फुसफुसाकर मेरे कान में गुनगुनाइए: “तुम अपना रंजो-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो”, और आपका हुक्‍म मैं अपने सिर-आंखों लेता, तड़ जुगलबंदी में गाल बजाना शुरु कर दूं, “मेरे दु:ख अब तेरे, तेरे सुख अब मेरे, मेरे ये दो नैना, चांद और तारे तेरे, तेरे!”, इतने में जैसाकि सहज स्‍वाभाविक है आपकी चेतना लौट चुकी होगी, और घबराहट में जो आपका दम फूलेगा, उतने में तो आंवड़े के गंवार अचार की भुरकस निकल चुकी होगी, शर्तिया.

आंवड़ा का अचार न खाने के इन तीन मुख्‍य तरीकों से अलग तैंतीस और तिहत्‍तर दूसरे तरीके हैं, सबसे आसान और मुफ़्ति‍या फिर वही है कि लौट-लाटकर मेरा ब्‍लाग पढ़ते रहें, अनंतर मन में प्रेममय धीरज और आत्‍मा में मेरे प्रति विनम्र श्रद्धा धरें (प्रेम तो धरें ही), आपके आंवड़े के अचार (और आपका) काम बहुत आसानी से तमाम होगा, मेरा विश्‍वास करें. विश्‍वास भय और आशंका की सौत और विजयभावी की अनुचर ठहरी. मन में विश्‍वास हो तो मनुष्‍य सात समंदुर पार कर जाता है (मनुष्‍य होना, और बने रहना, ज़रूरी है. मनुष्‍यत्‍व आपसे छूट रहा हो तो अपने से छुपाते हुए धीमे-धीमे मन में गुनगुनाते रह सकते हैं, मन में है विश्‍वास, पूरा है विश्‍वास, हम होंगे क़ामयाब एक दिन, आंवड़े का अचार छूटेगा पीछे, एक दिन!). बंगला के नवारुण भट्टाचार्य का पतला उपन्‍यास है, मुनमुन सरकार का अनुवाद है, हरबर्ट, राधाकृष्‍ण ने निन्‍यानबे में छापा था, अभी इस महंगाई के दौर में भी पचास टाका में उपलब्‍ध है, घर में ज़रूर होगा (नहीं होगा तो मालूम नहीं फिर आप मनुष्‍य कैसे होंगे), निकालकर पढ़ने लगिए, सत्‍तर के दशक की शुरुआत के अंतरंग चित्र उतारती, किताब के ढेरों पन्‍ने हैं कलकतिया जीवन के भेद और पुलिसिया गोलियों से पैदा हुए छेद में आपको ऐसे नचाये रहती है कि आंवड़ा, किम्‍बा उसका अचार, बेमतलब पड़ा रहता है. जैसे बुल्‍गाक़ोव की इतनी पुरनकी किताब है, मास्‍टर और मारगरिटा, उस शुरुआतीये दौरे में ही, जहां वाम-प्रभुओं को मुंह चिढ़ाती सारी बामपंथी जिरह-बीरमर्श, सर के बल खड़ी हो जाती है, और किताब के खत्‍म होने के बहुत-बहुत बाद तक फिर आपके मन, और मन के बाहर समाज के जीवन में, सर के बल ही खड़ी रहती है! किताबें क्‍यों ऐसे, इतनी, गड़बड़ि‍यां कर जाती हैं? चेतन (चहुंपा) भगत सर्वसुलभ होता है और मांदेलस्‍ताम की कहो तो क्रॉसवर्ड का बच्‍चा चौंककर पूछता है, मांदेल हू? क्‍या दुनिया है, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है? ऐसे ही नहीं है कि हारकर सिर नवाये मैं क्रॉसवर्ड के बच्‍चे पर हाथ छोड़ने से खुद को बचाता, बुदबुदाता हूं, ठीक है, बाबू, रहने दे मांदेलस्‍ताम, मेरी कविताओं की किताब ही बाहर कर, लड़का घबराकर दो कदम पीछे करके कहता है, अज़दक हू? जबकि मेरी कोई एक सिंगल किताब तक छपी नहीं होती है, राधाकृष्‍ण और राधाकुमुद वाले ही नहीं, कविता कोश के वाचस्‍मति तक मुझसे अपने को बचाते चलते हैं? और दोष बेचारे हमेशा आंवड़े के अचार के सर मढ़ा जाता है? यूं ही नहीं है कि आप आंवड़े के अचार से घबराये हुए हैं.

घबराने की बात नहीं है. मुंह पर रुमाल धरे रहें, आंवड़े का अचार क्‍या कोई माई का लाल आपके मुंह में सवार होने की कोशिश न करेगा. और आसान है कि इस बमचख से निकल कर जिशु संतानों के मोहल्‍लों की तरफ निकल लें, उधर इन दिनों केकों का जलवा है, आंवड़ों की कोई नहीं सोच रहा. चुप्‍पे किसी सुलक्षणा गोम्‍स के बाजू खड़े हो जाइए, कंधा सटाये हारी, नीची (नीच नहीं!) नज़रों से मनुहार करिये, सुलच्‍छना, का रे, लगता है तोरा बिन हम्‍मर जीबन और जोबन के काज नै होगा? अब और केतना साल इंतजार करें, सलम, क्रिसमस तक हम फेरा नै ले सकते हैं, का बोलती है? देखिए सुलक्षणा गोम्‍स का बोलती है. उसकी बजाय उसका ब्‍वॉयफ्रेंड बोलने चला आये तो अपने वाला आंवड़ा का अचार उसीके मुंह में ठेल दीजिए, और रहीं सुलक्षणाजी गोम्‍सजी तो उन्‍हें चार ज़रा ठोसवाला सुनाके हुआं से चुप्‍पे से सरक लीजिए! मेरी वाली उमर में धंसे हों, यानी शादी की उमिर निकल चुकी हो तब और आसान है, सुलक्षणा बेबी से मुस्कियाये साफ़ बता दीजिए कि का रे, अब तो बॉयफ्रेंड और हस्‍बैंड के टंटे नहीं है, न तुमरे पुत्ररतन को स्‍कूल पहुंचाये और घर लावे की हम्‍मर जिम्‍मेदारी है, फिर काहे ला फुटानी फेर रही है? डैरेक्‍ट खाएगी चार लात तब गाएगी हमरे साथ? ऐं, बेबी?

एतनो के बावजूद आंवड़े के अचार से पिंड नहीं छूट रहा तो सबसे छुपाके रॉकस्‍टार के अंधारे में घुसके लैपटाप का उजियारा फैला लीजिए, चूंकि मेरी अभी चढ़ी नहीं हैं, तब तक अदमजी गोंडवीजी की ही कुछ कबित्‍त का स्‍वाद लीजिए, टाइम्‍स नाऊ और एनडीटीवी वाले तो ये सुनायेंगे नहीं, लोकल केबल पर कहीं कोई बताये भी तो हमेशा खतरा रहेगा कि दू मिनिट के बाद आंवड़े के अचार का विज्ञापन चालू कर दे! या उससे आगे येहो रस्‍ता बचता है कि बेचारे देबानंद की दीवानी कहानी के रोमानी कंधे पर खामखा अपनी तिलकुट चिमरख लादने का ऐसा क्रूर खेल खेले लगें कि बेचारा देवेनंद घबराकर आंबड़ा के अचार खा लेवे, चट हुएं सारी कहनिये खतम होय जाये! उसके अनंतर अच्‍छा होगा मैं इतमीनान से जुसेप्‍पे को जिरह में खींचे दुखी होता रहूंगा, आप शर्मिला और राजिंदर कुमार की सुरमई देखे-देखे सिर फोड़ना.. दुनिया तब्‍बो रहेगी, आंबड़ा का अचार खाये वाला कोई नै रहेगा!

Sunday, December 18, 2011

आंवड़ा का अचार कैसे खायें..

हमेशा की तरह मुंह पर अंगोछा लपेटे जैतराम का जवाब होगा आवंड़ा का अचार वैसे ही खाएंगे जैसे अमरुद और अनार का खाते हैं. हद्द अमदी है भई ई जैतराम, सब समय मुंह पर अंगोछा फेरे रहता है, मंजी महतो हाथ का छोटका हथौड़ी चमरख बंडी का पाकिट में खोंसते, कान की बीड़ी को सुक्‍खल होंठ में खोंसते गरमी निकालते हैं, ई आप अंगोछा काहे ला फेरे रहते हैं, भाई साहेब? राज के चहुंपे हुए डकैत हुए, आपका माथा पर सरकार दू लाख का ईनाम रखे है? अरे, अरैनी का अंसारी का जनानो तक अब मुंह पर बुरका नहीं रखती फिर आप फलतुए काहे ला छुपा-छुपावन का रहस्‍सबाद खेल रहे हैं, भाईजानी? आंवड़ा के अचार को अमरुद और अनार से जोड़ रहे हैं, अरे? खाये का छोड़ि‍ये, कबहूं देखे हैं अमरुद और अनार के अचार? जवाब तीन दिन बाद आता है, सियाबुर्ररहमान मनिहारीवाले बंद मदरसे के पिछवाड़े नीम के पेड़ से दतुअन तोड़ते, सुरती से करियाये मुंह से कमल-वचन बोलते हैं, देखे भी हैं और खाये भी हैं, और अमरुदे का नहीं, परवल का, भिंडी का, अऊर तो अऊर, अन्‍नानासो का खाये हैं, मगर ऊ बात नहीं है जौन अंवड़े के अचार में है!

ए मियां मोहम्‍मत, हियां खाये के बात नै हो रही थी, कैसे खायें के हो रही थी, उत्‍तर के कहानी को दक्खिन नै ठेलो, हं?

कटोरा भर सूजी के हलुआ लै लीजिए, अऊर एक छोट कटोरी में आंवड़ा के एगो छोट अचार.. या फिर तश्‍तरी में जरा-जरा जरल भिंडी के गरम भुजिया सजाइए, मेहरारु से तीन गो ताजा फुलका सेंकाइये, भिंडी में फेर के मुंह में कौर रखिए, अऊर पीछे-पीछे एक तनि-सी कटनी अंवड़े के अचारे का काटिये, देखिए, मुंह में कइसन आनन्‍न उतरता है!

चिरंतनकाल के नारसिसिस्‍ट हताशाबादी इशार्दुलआलम सबकुछ सुनकर भी कुछ नहीं सुन रहे, पेट में भूख की घूमड़ पलटकर लहर खाती है, जैसे कस्‍बाई सांझ में छतों पर ताज़ा जले चूल्‍हों का धुआं नदी बनकर धीरे-धीरे आसमान में उतरता है, दबी आवाज़ ललियाने, गुनगुनाते सबको झुठलाने लगते हैं: ये बातें झूठी बाते हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं, तुम इशार्दुल का नाम न लो, क्‍या इशार्दुलवा सौदाई है.

लब्‍बोलुबाब के? अताउद्दसमद पूछे हैं.

राधामनि के नवके घर के लिए बगान से कटी लकड़ी लादे बैलगाड़ी आई है. हांकेवाले बच्‍चे से बिष्‍टु महतो सवाल करते हैं किसके बागान का है रे? लकड़ी कौन? घर के अंदर से कोई औरत भागी बाहर आती है और बाहर के जमावड़े पर नज़र जाते ही उसी तेजी से फिर भीतर लौटती है. कुएं के पास पंडित राधामोहन का सबसे छोटा बेटा हाथ में तीन अंडे सहेजे, साथ लगी बिल्‍ली की संगत में असहज होता, अंतत: हवा में पैर लहराकर खुर्राता है, ज्‍जा! बिल्‍ली सामने के पैरों को जमीन पर दाबकर ब्रूस ली वाला पोज़ लेती, गुर्राये जवाब देती है, म्‍याऊं.

लब्‍बोलुबाब ये कि आंवड़े का अचार कैसे खायें की जगह कैसे न खायें? ठीक है, चलिए, इसी पे बिचार-प्रजनन कीजिए, ज्ञानदान दीजिए?

Wednesday, December 14, 2011

नीली रात किताबी बात, बहकी-बहकानियां..

इस रेस्‍तरां से यह बाहर का दरवाज़ा कहां खुलता है? सुख की यह सीढ़ी कहां पहुंचाती है, या सपनीला एक महीन जाल बुनती चलती है, कहीं से निकलकर कहीं पहुंचती है तो वहां भी यही सूचना पट्टी लगी दिखती है: “फॉलो दिस मार्क टू रीच नोव्‍हेयर” ? जुसेप्‍पे, प्‍लीज़, यार, इस तरह हम भागते न रहें, ठहरो, पहचानने दो यह निशान किस एयरपोर्ट की तरफ़ जाता है, व्‍हॉट अ मेस दिस जर्नी हैज़ बीन; लंबी चूल और कान में बुनकी वाले ओ भाई साब, यहां जो अभी ज़रा देर पहले आपलोगों की सभा हो रही थी, वो अधेड़ बेसहारा औरत अपने मुल्‍क के बिकते जाने की बाबत जो धारदार प्रवचन पेल रही थी, किस ज़बान में और किस मुल्‍क के मुल्‍लाओं और उनके अर्थशास्‍त्र का क्रियाकर्म पढ़ रही थी, बतायेंगे, हमें कुछ रास्‍ता दिखायेंगे आप? साहित्‍य में इकॉनमी और इकॉनमी में कविता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं भटक गया हूं, जुसेप्‍पे की बुद्धि तक अकड़ गई है? मालूम नहीं किस मुल्‍क के बिके हुए पहाड़ी मैदानों से भागते किस भंवरी रेगिस्‍तानों में हम गोते लगा रहे हैं, इज़ इट टेकिंग अस एनीव्‍हेयर एट ऑल? ओ भाई साब? ओ मिस्‍सी, ओ सिस्‍टर जमैका?

हाथ में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर नज़र फिरवाती आठ लेखों की एक पतली किताब है, और लेख मेरी तरह टेढ़े नहीं, फिर भी मैं (किताब के शीर्षक ‘द फेस यू वर अफ्रेड टू सी’ के असर में?) कांप रहा हूं, जुसेप्‍पे की आस्‍तीन खींचता, मेले में ज़ि‍द्दी हारे बच्‍चे–सा हास्‍यास्‍पद हो रहा हूं, भले आदमी से गिड़गिड़ाकर चिरौरी करता हूं, “प्‍यारे, ये क्‍यों मुझ पर डेविड बी के ज़्यां क्रिस्‍तोफ़ वाले एपिलेप्टिक दौरे छूटते रहते हैं, आफ्टर ऑल, आई अम नॉट लिविंग फ्रॉम द पेज़ेस ऑफ़ अ ग्राफ़ि‍क नॉवल, अम आई?” जुसेप्‍पे मेरे गंदे नाख़ूनों की जकड़ से अपने रिलेटिवली साफ़ आस्‍तीन छुड़ाता दूसरी दिशा में मुंह फेरे बुदबुदाता है, “मैंने तुमसे कहा था हनीफ पर इतनी मुहब्‍बत कुरबान मत करो, बट यू नेवर लिसन टू मी, बट्ट एंड भट्टी एंड ऑल, दे आर नॉट पंजाबी ऑर उर्दू स्‍पीकिंग पीपल फ्रॉम रियल लाइफ़. उनकी स्‍मार्ट वन लाईनों की सारी होशियारी, और फक्‍डअपपने की बेक़रारी अंग्रेजी लिटररी एस्‍टैबलिशमेंट के मन-रंजन के लिए है, पाकिस्‍तानी पीपल से किसी डायरेक्‍ट गुफ़्तगू, सच्‍ची साहित्यिक संगीनी के कंपैशन की कामना लिये नहीं.. मैं और दस लाइनें कहूंगा, मगर क्‍या फ़ायदा, तुम कहोगे मैं देव डीओं के अंधेरों और एलिस भ‍ट्टी को एक पटरी पर उतार रहा हूं?”

“ओ शटअप्, जुसेप्‍पे, जस्‍ड सडअप!” बिना हाथ की आस्‍तीन छोड़े मैं भागता जाने कहां चला आया था, कहां? जिस पिछवाड़े मसूद के ताऊस चमन की मैना बसती थी, या राल्‍फ़ रसेल और खुर्शीदुलइस्‍लाम ग़ालिब के बहाने गाते थे? या खड़खड़ाती साइ‍कल की सवारी बदलकर पैदल गरम पगड़ंडी पहचानते साइनाथ गरीबी का नक़्शा जानते थे?

बाजू में कहीं बुढ़ाये पिल्‍जर के जीवट का वीडियो चल रहा है, उनींदे, अधमुंदी आंख मैं नेट पर दानियेल यर्गिन के पोथे पर सरसरी नज़र फेरता हूं, स्‍टैंडर्ड ऑयल, शेल, रॉयल डच की दुनिया जानकर मैं दुनिया जान लूंगा, जुसेप्‍पे? ईराक से अमरीकी फौजों के हटने के कूट नाटक में हम राजनीति का ‘र’ जान पा रहे हैं? कविताई विरोध के महीन बीस साल गुज़ारकर इरानी सिनेकार ही, अपना संसार ठीक से पहचान पा रहे हैं, आं जुसेप्‍पे?

मगर जुसेप्‍पे कहीं नहीं है, सिर्फ़ मैं हूं, जाने किस मुल्‍क के किस कस्‍बे में बैठा, उडुपी की इडली कुतरता ब्राइसन के ऑस्‍ट्रेलियाई पन्‍नों से गुज़र रहा हूं, ‘तिलिस्‍म-ए-होशरुबा’ कह रही है मुझसे गुज़रो, मुझसे, मैं चिढ़कर नज़रों के एक थप्‍पड़ से उसे नवाजता झींकता हूं, “तिलिस्‍म में उतरकर जान जायेंगे, कहां जा रहे हैं? बोल?”

Saturday, December 3, 2011

फूलों का तारों का..

भागते-भागते मैं अपना हिसाब दुरुस्‍त कर लेना चाहता था; मतलब मेरे पैरों के हिस्‍से किसी सूरत नॉर्थ स्‍टॉर के जूते आयेंगे, या अबे ओय, फिर एक साल बीएससी (या, करोना?) के नीले हवाई चप्‍पलों पर काटना होगा (ठीक है नीला मत लेना, भूअरका खरीदवा लेना, अब खुश?”) की सोचकर गिरा-गिरता जाता. जबकि सच्‍चाई थी गिरते रहने को भले उम्र के बहुत छुटपने से बनी रहती हो, भागने की जगहों का कोई बहुत चौड़ा या लम्‍बा भूगोल था नहीं. ज़रा-ज़रा और ज़रा-सी जगह नज़र आती, मगर उतनी ही ज़रा देर में फिर नज़र नहीं भी आती. रिक्‍तस्‍थान भभ्‍भड़ के साथ फिल-अप होता चलता. पलक झपकाये के तत्‍क्षणोपरांत के पलक खोले के पल में अभी के रिक्‍तस्‍थान पर तभी बच्‍चे गिल्‍ली-डंडा खेलते नज़र आते. या लड़कियां साइकिल सीखतीं. और किसी तरह जो लड़कियां भजन व सोहर और सूरन का अचार बनाने और स्‍वेटर का पैटर्न सीखने में फंसी रह गईं तो वैसी ही तेज़ी से काकी और अंकल लोग खुरपी चलाते व फावड़ा घुमाते खुले दालान को भंटा और भिंडी के बगान में बदल देते! कहने का मतलब असल भागने की जगहें लगभग नहीं के बराबर थीं. जो था वो भय और तनावों का मैदान था. या बीएससी का हवाई चप्‍पल पाने की खुशी. नीले रंग वाला. बहुत पैर पटकने पर उसके बाजू भूरे का ऑप्‍शन निकलता.

सीमाबद्ध संसार में मेरा पैदाइशी हरामीपन होगा कि मगर मैं फिर भी भागता रहता. क्‍लास की अपनी सीट से भाग जाता. खाने की थाली, आंगन की जाली, और अमरुद के पेड़ के अनघने पत्‍तों की आड़, जहां एकदम गुंजाइश न रहती, वहां-वहां तक से भागता रहता. चावल की बोरियों में पकने को छुपाकर रखे शरीफे और पूजा वाले तखत के सिंदूर-नहाये पौने तीन रुपये के चिल्‍लर के बीच से भागता. भागकर मालूम नहीं मैं कहां निकल जाना चाहता था. क्‍योंकि उन दिनों मुझे केप टाउन और कैंसास सिटी का ‘क’ भी नहीं मालूम था. बम्‍बई का ‘ब’ मालूम था, लेकिन फिर, सिर्फ़ उतना ही मालूम था; ‘धर्मयुग’ के ढब्‍बूजी का काला कोट दिख गया था, ‘फिल्‍मी कलियां’ पर नवीन निश्‍चल और रेखा ‘सावन-भादों’ में नहाये अभी नहीं दिखे थे! और इस अभागे के भागे में ऊपर से नुनकी परेशान किये रहती. उसकी शिकायतों का रिकार्ड ‘उपकार’ के महेंद्र कपूर के ‘कस्‍मे वादे प्‍यार वफ़ा के, वादे हैं वादों का क्‍या’ पर भारी बना गूंजता रहता. दायें-बायें शिकायत बोलती डोलती रहती, झूले में पींग लेती भी याद करते रहने से बाज नहीं आती, “भैया, तू हमको ऊ फरीदा जलाल वाला फिलिम नै दिखाये न?” मैं ट्रांजिस्‍टर पर बजते वेस्‍ट इंडीज़ की जीत की कमेंट्री के पीछे छिपकर भाग निकलना चाहता, मगर तब तक किसी और सवाल का कांटा पीछे से उछलकर मुझे फांस लेता, “हमरे पहिलके बच्‍चे की पैदाइश के बखतो तू नै आये, भैया, तोरा कवनो ममता नै छू गया है, भैया, आं?”

नुनकी के तीरों से तार-तार मेरी कनपटियों पर फिर दीवाली में छोड़े पगलाये राकेटों की सूं-शां की बहकदार बारिश गूंजने लगती! सत्‍पथी आंटी के अमरुद के पेड़ से कूद मैं दास अंकल के छत पर छलांग लगाने के बाद वहां से फटे कंठ नुनकी के चिथड़े उड़ाता, चिल्‍लाता, “अबे, हरमखोर की बहिन, अबहीं ले जया भादुड़ी के बियाहो नै हुआ अऊर तू महतारियो बन गईं? सीन में चुप्‍पे पीछे बने रहने को बोले तो तब से डैलग पे डैलग ठेल के नाक में दम कर दी है रे, हरामी?”

नुनकी अभी बहुत छोटी थी उसे कुछ समझ नहीं आता. मेरा गुस्‍सा भी. मुझे भी नहीं आता शायद जभी मैं इस तरह भागता फिरता. मां पीठ फेरे अपने बाल काढ़ती होती, सुनंदा मौसी होतीं जो चिरौरी करतीं कि आ, बाबू, हमरी गोदी में लेट जा, दिनभर सगरे घामा घूमने से तोरा माथा खौराया हुआ है!

मैं दास अंकल की छत पर से ही मां को सुनाता सुनंदा मौसी से ज़ोर-जोर से कहता, “सरमीला टैगोर एतना प्‍यार से गाती है बड़ा नटखट है किस्‍न कन्‍हैया, तू कब्‍बो हमरा बास्‍ते गाई है? हम नै आऊंगा, ज्‍जा!”

किस दुनिया में खोई नुनकी जैसे इशारा पाते ही उल्‍टा-सीधा गुनगुनाना शुरु कर देती है, “मेरा चन्‍ना है तू, मेरा सूरज है तू, तू हमरे आंखी का तारा है तू,”

मेरी इच्‍छा होती है वहीं से बम फेंककर नुनकी को शेख मुजीबुर्ररहमान के बंग्‍लादेश में फोड़मफोड़ कर दूं, मगर बदकार पर कवनो हमरे गुस्‍से का रियेक्‍सन है? प्रेम से अब एक नवनका गुनगुना रही है, “फूलों का तारों का सबका कहना है, एग हजारों में हमरी बहिना है, भैया, ई वाला नै गाओगे? एगो हाली गा दो न, पिलीज?”

(बाकी)

Thursday, December 1, 2011

जेब में ब्‍लेड और आंखों में फटिहारापन..

इसे उनका समय के अंधकूप में छिपे रहना कहो या बड़े संसार के प्रति उनकी शाश्‍वत की उदासीन लापरवाही, उनका यथार्थ था कि वह बाहरी यथार्थ से कटे हुए थे. मध्‍ययुग के बाद सामाजिक गतिशीलता में जो अचानक उछाल आया, नई यात्राओं और नये लक्ष्‍यों के रास्‍ते खुले, बाज़ार की ज़रुरतों में नई गोलबंदियां हुईं, अलक्षित-रक्षित समाजों की सुरक्षा के पुराने कवचबंध टूटने लगे. पियराये पन्‍ने के पुराने लेटरप्रेस में छपा कोई आदिकालीन पुर्चगाली पाठ था जिसे पढ़ते-पढ़ते तोमासिनो अनुवाद करता चल रहा था. मैं झपकियों में जाग-जागकर सो रहा था. पैसेंजर ट्रेन छुक-छुक की मंथरगति में कहीं जाने का भ्रम बुन रही थी, हालांकि मैं जानता था हम कहीं नहीं जा रहे. तोमास से वही मैंने कहा. या नींद में लगा मुझे कि मैंने कहा है, क्‍योंकि दुबारा आंख खुलने पर उसके चेहरे पर चिंता नहीं दिखी, निश्चितभाव वह अपने कथापाठ में ही डूबा था. मेरे कान में फिर से वह अप्रीतिकर लोरी बजने लगी, लगातार तीन पीढ़ि‍यों से बाहरी शत्रुओं से लड़ते-लड़ते मादी समुदाय का हौसला पस्‍त हो चुका था. उनके जंगल, उनकी आजीविका, ढोर, डेरे, सबकुछ नष्‍ट हो चुका था, और ज़ि‍न्‍दा रहने की इकलौती सूरत यही बची थी कि हमलावरों के आगे वे हथियार डालकर समझौता कर लें. मगर मादियों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि बाहरी शत्रु के आगे उन्‍होंने कभी हथियार डाला हो, सिबोला जानती थी और पेट से थी इसीलिए घबराई हुई थी. वह मादी परम्‍परा का असम्‍मान नहीं करना चाहती थी मगर पेट में पल रहे अपने शिशु की रक्षा भी करना चाहती थी. और उस अजन्‍मे शिशु की रक्षा का सिर्फ़ एक तरीका था कि सिबोला मादियों का जीवन नरक किये उनके शत्रुओं की शरण में चली जाये.

सफ़र की थकान का असर होगा होटल पहुंचते ही तोमासिनो बिस्‍तरे पर निढाल हो गया, जबकि मेरी आंखों में असमंजस, अविश्‍वास और साज़ि‍श के घेरे घूम रहे थे! जाने कंठ की प्‍यास थी या दीवार पर अचानक तैरती कोई परछाई दिखी थी, मुझपर बेचैनी का जैसे बुखार सा चढ़ रहा था, हालांकि इसका पक्‍का भरोसा भी था कि इस भंवर को भेद कर मैं सच्‍चाई तक किसी न किसी तरह पहुंच ज़रूर जाऊंगा. मगर साथ ही फिर ऐसी बदहवासी क्‍यों छा रही थी. औंधे मुंह बिछौने पर गिरा मैंने अपनी जेब की सारी चीज़ें अपने बगल निकालकर रख दिया और अंधेरे में हथेली से उन्‍हें टटोलता रहा. तकिये में मुंह धंसाये उस तस्‍वीर को साफ़ करने की कोशिश करता रहा जो उजाले में अदृश्‍य बनी हुई थी, फिर मैं एकदम से घबराकर उठ गया.

तोमास की नाक बज रही थी. धीमे से हाथ बढ़ाकर मैंने अपने कोने की बत्‍ती जला दी, झोले का सामान बिस्‍तरे पर उलटकर एक-एक चीज़ की जांच करने लगा. तीनों पैंट बारी-बारी से पहनकर देखा, वे मुझपर बराबर आ रहे थे की बात से लगातार विस्मित होता रहा. बाथरुम की उलट-पुलट में भी किसी नयी या अजीब चीज़ के हाथ न आने पर मेरी परेशानी बढ़ गई. बिस्‍तरे के कोने पर बैठे कुछ देर सोचते रहने के बाद खिड़की के परदे की ओट से मैंने बाहर होटल के अंधेरे को पढ़ने की कोशिश की, कि कुछ नज़र आ जाये, कोई एक इशारा. मैं क्‍या खोज रहा था?

जेब में दो ब्‍लेड और सौ रुपये का एक नोट खोंसे, होटल के रिसेप्‍शन के लड़के की नज़र बचाकर मैं एकदम से बाहर निकल आया. सड़क पर किसी एक भी संदिग्‍ध व्‍यक्ति के न मिलने से अब मुझे सचमुच हैरानी हो रही थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम रास्‍ता भटक गए थे? ग़लत होटल में चले आये थे? लेकिन तोमास फिर मुझे सिबोला की कहानी क्‍यों सुना रहा था? दांग वान से उसका क्‍या संबंध था? ऐसे किसी भी संबंध में मैं ख़ामख़्वाह क्‍यों उलझ रहा हूं? कुछ कदम आगे एक रिक्‍शावाला मिला, रात के सवा दस बज रहे थे मगर जब उसने भी कोई हुज्‍जत नहीं की तो मैं सचमुच डिस्‍टर्ब होने लगा.

आधे घंटे में मैं वापस स्‍टेशन की इमारत की पुरानी छतों के नीचे टहल कर रहा था. स्‍टेशन से गुज़रनेवाली सब रेलों के आने-जाने की मैंने सिलसिलेवार पड़ताल की. फिर बाजू के फाटक से होता हुआ पीछे की एक गली में निकल आया. एक आधा गिरे टीन की आड़ में दो कमउम्र लड़के गांजा पी रहे थे, या छुपकर दूसरा नशा कर रहे थे, उनकी बुझी आंखों में हल्‍की चमक का अंदाज़ होते ही मैं ख़बरदार हो गया. हथेली में ब्‍लेड कसे मैं किसी भी हरामीपने के लिए तैयार था, मगर नशेड़ी लड़कों का हौसला पिटा हुआ था, वह एकदम से डरकर पीछे हो लिये, मैं तीर की तरह अंधेरे में आगे निकल गया.

वह कोई सरकारी अस्‍पताल था, या ऐसी ही कोई बदहाल जगह. कमरों के भर जाने के बाद मरीज गलियारे और बरामदों तक ठेल दिये गए थे. फ़र्श पर लेटा एक बूढ़ा कराहता दीखा. उसके चेहरे से ज़ाहिर था वह ज्यादा दिन बचेगा नहीं. मगर बिजली के बल्‍बों की फीकी, मुरझाई रौशनी में सब चेहरे कमोबेश उसी मुर्दई में नहाये दिख रहे थे. अचानक कहां से एक नर्स निकल आई, मुझसे पूछने लगी मैं किसे खोज रहा हूं. हथेली में ब्‍लेड कसे मैं मुंह सिये एकदम मुर्दा हो गया!

कौन है यह नर्स, इसे किसने भेजा था मेरी सूराग में? मैं इस चेहरे को पहचानता हूं, ये होंठ, ये आंखें मैंने पहले देख रखी हैं!

मैं बताता क्‍यों नहीं किसकी खोज में आया हूं? नर्स नाराज़ हुई मेरे माथे चढ़ी आ रही है. हथेली में कसे ब्‍लेड को उंगलियों से उसकी पन्‍नी से अलग करता हूं.

कौन, कौन? नर्स चीख़ती है.

मैं मन ही मन बुदबुदाता हूं, सिबोला, लीलामाला, सुखोमोनी, प्रकट गूंगा बने रहता हूं.

नर्स के हल्‍ले-गुल्‍ले में और लोग बाहर निकल आये हैं, मैं घिर गया हूं.

मेरी रीढ़ में घबराहट की झुरझुरी दौड़ती है. पसीने से भीज रही उंगलियों से सरककर ब्‍लेड नीचे ज़मीन पर गिरता है. और तभी तोमासिनो के झिंझोड़े जाने से मेरी आंख खुलती है. हमारी पैसेंजर रेल उसी स्‍टेशन पर आकर ठहरी है जहां से गुज़रनेवाली रेलों का ज़रा पहले मैंने हिसाब-किताब किया था!

(ऊपर की चिचरीकारी: अजय कुमार)