Thursday, December 1, 2011

जेब में ब्‍लेड और आंखों में फटिहारापन..

इसे उनका समय के अंधकूप में छिपे रहना कहो या बड़े संसार के प्रति उनकी शाश्‍वत की उदासीन लापरवाही, उनका यथार्थ था कि वह बाहरी यथार्थ से कटे हुए थे. मध्‍ययुग के बाद सामाजिक गतिशीलता में जो अचानक उछाल आया, नई यात्राओं और नये लक्ष्‍यों के रास्‍ते खुले, बाज़ार की ज़रुरतों में नई गोलबंदियां हुईं, अलक्षित-रक्षित समाजों की सुरक्षा के पुराने कवचबंध टूटने लगे. पियराये पन्‍ने के पुराने लेटरप्रेस में छपा कोई आदिकालीन पुर्चगाली पाठ था जिसे पढ़ते-पढ़ते तोमासिनो अनुवाद करता चल रहा था. मैं झपकियों में जाग-जागकर सो रहा था. पैसेंजर ट्रेन छुक-छुक की मंथरगति में कहीं जाने का भ्रम बुन रही थी, हालांकि मैं जानता था हम कहीं नहीं जा रहे. तोमास से वही मैंने कहा. या नींद में लगा मुझे कि मैंने कहा है, क्‍योंकि दुबारा आंख खुलने पर उसके चेहरे पर चिंता नहीं दिखी, निश्चितभाव वह अपने कथापाठ में ही डूबा था. मेरे कान में फिर से वह अप्रीतिकर लोरी बजने लगी, लगातार तीन पीढ़ि‍यों से बाहरी शत्रुओं से लड़ते-लड़ते मादी समुदाय का हौसला पस्‍त हो चुका था. उनके जंगल, उनकी आजीविका, ढोर, डेरे, सबकुछ नष्‍ट हो चुका था, और ज़ि‍न्‍दा रहने की इकलौती सूरत यही बची थी कि हमलावरों के आगे वे हथियार डालकर समझौता कर लें. मगर मादियों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि बाहरी शत्रु के आगे उन्‍होंने कभी हथियार डाला हो, सिबोला जानती थी और पेट से थी इसीलिए घबराई हुई थी. वह मादी परम्‍परा का असम्‍मान नहीं करना चाहती थी मगर पेट में पल रहे अपने शिशु की रक्षा भी करना चाहती थी. और उस अजन्‍मे शिशु की रक्षा का सिर्फ़ एक तरीका था कि सिबोला मादियों का जीवन नरक किये उनके शत्रुओं की शरण में चली जाये.

सफ़र की थकान का असर होगा होटल पहुंचते ही तोमासिनो बिस्‍तरे पर निढाल हो गया, जबकि मेरी आंखों में असमंजस, अविश्‍वास और साज़ि‍श के घेरे घूम रहे थे! जाने कंठ की प्‍यास थी या दीवार पर अचानक तैरती कोई परछाई दिखी थी, मुझपर बेचैनी का जैसे बुखार सा चढ़ रहा था, हालांकि इसका पक्‍का भरोसा भी था कि इस भंवर को भेद कर मैं सच्‍चाई तक किसी न किसी तरह पहुंच ज़रूर जाऊंगा. मगर साथ ही फिर ऐसी बदहवासी क्‍यों छा रही थी. औंधे मुंह बिछौने पर गिरा मैंने अपनी जेब की सारी चीज़ें अपने बगल निकालकर रख दिया और अंधेरे में हथेली से उन्‍हें टटोलता रहा. तकिये में मुंह धंसाये उस तस्‍वीर को साफ़ करने की कोशिश करता रहा जो उजाले में अदृश्‍य बनी हुई थी, फिर मैं एकदम से घबराकर उठ गया.

तोमास की नाक बज रही थी. धीमे से हाथ बढ़ाकर मैंने अपने कोने की बत्‍ती जला दी, झोले का सामान बिस्‍तरे पर उलटकर एक-एक चीज़ की जांच करने लगा. तीनों पैंट बारी-बारी से पहनकर देखा, वे मुझपर बराबर आ रहे थे की बात से लगातार विस्मित होता रहा. बाथरुम की उलट-पुलट में भी किसी नयी या अजीब चीज़ के हाथ न आने पर मेरी परेशानी बढ़ गई. बिस्‍तरे के कोने पर बैठे कुछ देर सोचते रहने के बाद खिड़की के परदे की ओट से मैंने बाहर होटल के अंधेरे को पढ़ने की कोशिश की, कि कुछ नज़र आ जाये, कोई एक इशारा. मैं क्‍या खोज रहा था?

जेब में दो ब्‍लेड और सौ रुपये का एक नोट खोंसे, होटल के रिसेप्‍शन के लड़के की नज़र बचाकर मैं एकदम से बाहर निकल आया. सड़क पर किसी एक भी संदिग्‍ध व्‍यक्ति के न मिलने से अब मुझे सचमुच हैरानी हो रही थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम रास्‍ता भटक गए थे? ग़लत होटल में चले आये थे? लेकिन तोमास फिर मुझे सिबोला की कहानी क्‍यों सुना रहा था? दांग वान से उसका क्‍या संबंध था? ऐसे किसी भी संबंध में मैं ख़ामख़्वाह क्‍यों उलझ रहा हूं? कुछ कदम आगे एक रिक्‍शावाला मिला, रात के सवा दस बज रहे थे मगर जब उसने भी कोई हुज्‍जत नहीं की तो मैं सचमुच डिस्‍टर्ब होने लगा.

आधे घंटे में मैं वापस स्‍टेशन की इमारत की पुरानी छतों के नीचे टहल कर रहा था. स्‍टेशन से गुज़रनेवाली सब रेलों के आने-जाने की मैंने सिलसिलेवार पड़ताल की. फिर बाजू के फाटक से होता हुआ पीछे की एक गली में निकल आया. एक आधा गिरे टीन की आड़ में दो कमउम्र लड़के गांजा पी रहे थे, या छुपकर दूसरा नशा कर रहे थे, उनकी बुझी आंखों में हल्‍की चमक का अंदाज़ होते ही मैं ख़बरदार हो गया. हथेली में ब्‍लेड कसे मैं किसी भी हरामीपने के लिए तैयार था, मगर नशेड़ी लड़कों का हौसला पिटा हुआ था, वह एकदम से डरकर पीछे हो लिये, मैं तीर की तरह अंधेरे में आगे निकल गया.

वह कोई सरकारी अस्‍पताल था, या ऐसी ही कोई बदहाल जगह. कमरों के भर जाने के बाद मरीज गलियारे और बरामदों तक ठेल दिये गए थे. फ़र्श पर लेटा एक बूढ़ा कराहता दीखा. उसके चेहरे से ज़ाहिर था वह ज्यादा दिन बचेगा नहीं. मगर बिजली के बल्‍बों की फीकी, मुरझाई रौशनी में सब चेहरे कमोबेश उसी मुर्दई में नहाये दिख रहे थे. अचानक कहां से एक नर्स निकल आई, मुझसे पूछने लगी मैं किसे खोज रहा हूं. हथेली में ब्‍लेड कसे मैं मुंह सिये एकदम मुर्दा हो गया!

कौन है यह नर्स, इसे किसने भेजा था मेरी सूराग में? मैं इस चेहरे को पहचानता हूं, ये होंठ, ये आंखें मैंने पहले देख रखी हैं!

मैं बताता क्‍यों नहीं किसकी खोज में आया हूं? नर्स नाराज़ हुई मेरे माथे चढ़ी आ रही है. हथेली में कसे ब्‍लेड को उंगलियों से उसकी पन्‍नी से अलग करता हूं.

कौन, कौन? नर्स चीख़ती है.

मैं मन ही मन बुदबुदाता हूं, सिबोला, लीलामाला, सुखोमोनी, प्रकट गूंगा बने रहता हूं.

नर्स के हल्‍ले-गुल्‍ले में और लोग बाहर निकल आये हैं, मैं घिर गया हूं.

मेरी रीढ़ में घबराहट की झुरझुरी दौड़ती है. पसीने से भीज रही उंगलियों से सरककर ब्‍लेड नीचे ज़मीन पर गिरता है. और तभी तोमासिनो के झिंझोड़े जाने से मेरी आंख खुलती है. हमारी पैसेंजर रेल उसी स्‍टेशन पर आकर ठहरी है जहां से गुज़रनेवाली रेलों का ज़रा पहले मैंने हिसाब-किताब किया था!

(ऊपर की चिचरीकारी: अजय कुमार)

5 comments:

  1. ना ना पहलेही वाला ठीक था... सबसे सुन्दर.....
    पुराना भी खोजना आसान रहता था.. बदल दीजिये.

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  2. अरे, पगलाये हो रे, छौंरा?
    मेयानी से बहिरियाया तरवाल फिर मियानी में लौटता है हो?
    पुरनका टेम्‍पलेट अब गिया, धूर कुआं के गहिर पानी में..
    खेला खतम पइसा हजम, ज्‍ज्‍ज्‍जा!

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  3. हाँ अब ठीक.

    काहे से कि पॉडकास्ट में अकसरे जरा सा जापान, एक गो पॉकेट और दीदी चलो ना सुनना होता था...

    और प्यासा भी...
    थैंक यू भी

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