
भागते-भागते मैं अपना हिसाब दुरुस्त कर लेना चाहता था; मतलब मेरे पैरों के हिस्से किसी सूरत नॉर्थ स्टॉर के जूते आयेंगे, या अबे ओय, फिर एक साल बीएससी (या, करोना?) के नीले हवाई चप्पलों पर काटना होगा (“ठीक है नीला मत लेना, भूअरका खरीदवा लेना, अब खुश?”) की सोचकर गिरा-गिरता जाता. जबकि सच्चाई थी गिरते रहने को भले उम्र के बहुत छुटपने से बनी रहती हो, भागने की जगहों का कोई बहुत चौड़ा या लम्बा भूगोल था नहीं. ज़रा-ज़रा और ज़रा-सी जगह नज़र आती, मगर उतनी ही ज़रा देर में फिर नज़र नहीं भी आती. रिक्तस्थान भभ्भड़ के साथ फिल-अप होता चलता. पलक झपकाये के तत्क्षणोपरांत के पलक खोले के पल में अभी के रिक्तस्थान पर तभी बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते नज़र आते. या लड़कियां साइकिल सीखतीं. और किसी तरह जो लड़कियां भजन व सोहर और सूरन का अचार बनाने और स्वेटर का पैटर्न सीखने में फंसी रह गईं तो वैसी ही तेज़ी से काकी और अंकल लोग खुरपी चलाते व फावड़ा घुमाते खुले दालान को भंटा और भिंडी के बगान में बदल देते! कहने का मतलब असल भागने की जगहें लगभग नहीं के बराबर थीं. जो था वो भय और तनावों का मैदान था. या बीएससी का हवाई चप्पल पाने की खुशी. नीले रंग वाला. बहुत पैर पटकने पर उसके बाजू भूरे का ऑप्शन निकलता.
सीमाबद्ध संसार में मेरा पैदाइशी हरामीपन होगा कि मगर मैं फिर भी भागता रहता. क्लास की अपनी सीट से भाग जाता. खाने की थाली, आंगन की जाली, और अमरुद के पेड़ के अनघने पत्तों की आड़, जहां एकदम गुंजाइश न रहती, वहां-वहां तक से भागता रहता. चावल की बोरियों में पकने को छुपाकर रखे शरीफे और पूजा वाले तखत के सिंदूर-नहाये पौने तीन रुपये के चिल्लर के बीच से भागता. भागकर मालूम नहीं मैं कहां निकल जाना चाहता था. क्योंकि उन दिनों मुझे केप टाउन और कैंसास सिटी का ‘क’ भी नहीं मालूम था. बम्बई का ‘ब’ मालूम था, लेकिन फिर, सिर्फ़ उतना ही मालूम था; ‘धर्मयुग’ के ढब्बूजी का काला कोट दिख गया था, ‘फिल्मी कलियां’ पर नवीन निश्चल और रेखा ‘सावन-भादों’ में नहाये अभी नहीं दिखे थे! और इस अभागे के भागे में ऊपर से नुनकी परेशान किये रहती. उसकी शिकायतों का रिकार्ड ‘उपकार’ के महेंद्र कपूर के ‘कस्मे वादे प्यार वफ़ा के, वादे हैं वादों का क्या’ पर भारी बना गूंजता रहता. दायें-बायें शिकायत बोलती डोलती रहती, झूले में पींग लेती भी याद करते रहने से बाज नहीं आती, “भैया, तू हमको ऊ फरीदा जलाल वाला फिलिम नै दिखाये न?” मैं ट्रांजिस्टर पर बजते वेस्ट इंडीज़ की जीत की कमेंट्री के पीछे छिपकर भाग निकलना चाहता, मगर तब तक किसी और सवाल का कांटा पीछे से उछलकर मुझे फांस लेता, “हमरे पहिलके बच्चे की पैदाइश के बखतो तू नै आये, भैया, तोरा कवनो ममता नै छू गया है, भैया, आं?”
नुनकी के तीरों से तार-तार मेरी कनपटियों पर फिर दीवाली में छोड़े पगलाये राकेटों की सूं-शां की बहकदार बारिश गूंजने लगती! सत्पथी आंटी के अमरुद के पेड़ से कूद मैं दास अंकल के छत पर छलांग लगाने के बाद वहां से फटे कंठ नुनकी के चिथड़े उड़ाता, चिल्लाता, “अबे, हरमखोर की बहिन, अबहीं ले जया भादुड़ी के बियाहो नै हुआ अऊर तू महतारियो बन गईं? सीन में चुप्पे पीछे बने रहने को बोले तो तब से डैलग पे डैलग ठेल के नाक में दम कर दी है रे, हरामी?”
नुनकी अभी बहुत छोटी थी उसे कुछ समझ नहीं आता. मेरा गुस्सा भी. मुझे भी नहीं आता शायद जभी मैं इस तरह भागता फिरता. मां पीठ फेरे अपने बाल काढ़ती होती, सुनंदा मौसी होतीं जो चिरौरी करतीं कि आ, बाबू, हमरी गोदी में लेट जा, दिनभर सगरे घामा घूमने से तोरा माथा खौराया हुआ है!
मैं दास अंकल की छत पर से ही मां को सुनाता सुनंदा मौसी से ज़ोर-जोर से कहता, “सरमीला टैगोर एतना प्यार से गाती है बड़ा नटखट है किस्न कन्हैया, तू कब्बो हमरा बास्ते गाई है? हम नै आऊंगा, ज्जा!”
किस दुनिया में खोई नुनकी जैसे इशारा पाते ही उल्टा-सीधा गुनगुनाना शुरु कर देती है, “मेरा चन्ना है तू, मेरा सूरज है तू, तू हमरे आंखी का तारा है तू,”
मेरी इच्छा होती है वहीं से बम फेंककर नुनकी को शेख मुजीबुर्ररहमान के बंग्लादेश में फोड़मफोड़ कर दूं, मगर बदकार पर कवनो हमरे गुस्से का रियेक्सन है? प्रेम से अब एक नवनका गुनगुना रही है, “फूलों का तारों का सबका कहना है, एग हजारों में हमरी बहिना है, भैया, ई वाला नै गाओगे? एगो हाली गा दो न, पिलीज?”
(बाकी)