
इस रेस्तरां से यह बाहर का दरवाज़ा कहां खुलता है? सुख की यह सीढ़ी कहां पहुंचाती है, या सपनीला एक महीन जाल बुनती चलती है, कहीं से निकलकर कहीं पहुंचती है तो वहां भी यही सूचना पट्टी लगी दिखती है: “फॉलो दिस मार्क टू रीच नोव्हेयर” ? जुसेप्पे, प्लीज़, यार, इस तरह हम भागते न रहें, ठहरो, पहचानने दो यह निशान किस एयरपोर्ट की तरफ़ जाता है, व्हॉट अ मेस दिस जर्नी हैज़ बीन; लंबी चूल और कान में बुनकी वाले ओ भाई साब, यहां जो अभी ज़रा देर पहले आपलोगों की सभा हो रही थी, वो अधेड़ बेसहारा औरत अपने मुल्क के बिकते जाने की बाबत जो धारदार प्रवचन पेल रही थी, किस ज़बान में और किस मुल्क के मुल्लाओं और उनके अर्थशास्त्र का क्रियाकर्म पढ़ रही थी, बतायेंगे, हमें कुछ रास्ता दिखायेंगे आप? साहित्य में इकॉनमी और इकॉनमी में कविता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं भटक गया हूं, जुसेप्पे की बुद्धि तक अकड़ गई है? मालूम नहीं किस मुल्क के बिके हुए पहाड़ी मैदानों से भागते किस भंवरी रेगिस्तानों में हम गोते लगा रहे हैं, इज़ इट टेकिंग अस एनीव्हेयर एट ऑल? ओ भाई साब? ओ मिस्सी, ओ सिस्टर जमैका?
हाथ में भारतीय अर्थव्यवस्था पर नज़र फिरवाती आठ लेखों की एक पतली किताब है, और लेख मेरी तरह टेढ़े नहीं, फिर भी मैं (किताब के शीर्षक ‘द फेस यू वर अफ्रेड टू सी’ के असर में?) कांप रहा हूं, जुसेप्पे की आस्तीन खींचता, मेले में ज़िद्दी हारे बच्चे–सा हास्यास्पद हो रहा हूं, भले आदमी से गिड़गिड़ाकर चिरौरी करता हूं, “प्यारे, ये क्यों मुझ पर डेविड बी के ज़्यां क्रिस्तोफ़ वाले एपिलेप्टिक दौरे छूटते रहते हैं, आफ्टर ऑल, आई अम नॉट लिविंग फ्रॉम द पेज़ेस ऑफ़ अ ग्राफ़िक नॉवल, अम आई?” जुसेप्पे मेरे गंदे नाख़ूनों की जकड़ से अपने रिलेटिवली साफ़ आस्तीन छुड़ाता दूसरी दिशा में मुंह फेरे बुदबुदाता है, “मैंने तुमसे कहा था हनीफ पर इतनी मुहब्बत कुरबान मत करो, बट यू नेवर लिसन टू मी, बट्ट एंड भट्टी एंड ऑल, दे आर नॉट पंजाबी ऑर उर्दू स्पीकिंग पीपल फ्रॉम रियल लाइफ़. उनकी स्मार्ट वन लाईनों की सारी होशियारी, और फक्डअपपने की बेक़रारी अंग्रेजी लिटररी एस्टैबलिशमेंट के मन-रंजन के लिए है, पाकिस्तानी पीपल से किसी डायरेक्ट गुफ़्तगू, सच्ची साहित्यिक संगीनी के कंपैशन की कामना लिये नहीं.. मैं और दस लाइनें कहूंगा, मगर क्या फ़ायदा, तुम कहोगे मैं देव डीओं के अंधेरों और एलिस भट्टी को एक पटरी पर उतार रहा हूं?”
“ओ शटअप्, जुसेप्पे, जस्ड सडअप!” बिना हाथ की आस्तीन छोड़े मैं भागता जाने कहां चला आया था, कहां? जिस पिछवाड़े मसूद के ताऊस चमन की मैना बसती थी, या राल्फ़ रसेल और खुर्शीदुलइस्लाम ग़ालिब के बहाने गाते थे? या खड़खड़ाती साइकल की सवारी बदलकर पैदल गरम पगड़ंडी पहचानते साइनाथ गरीबी का नक़्शा जानते थे?
बाजू में कहीं बुढ़ाये पिल्जर के जीवट का वीडियो चल रहा है, उनींदे, अधमुंदी आंख मैं नेट पर दानियेल यर्गिन के पोथे पर सरसरी नज़र फेरता हूं, स्टैंडर्ड ऑयल, शेल, रॉयल डच की दुनिया जानकर मैं दुनिया जान लूंगा, जुसेप्पे? ईराक से अमरीकी फौजों के हटने के कूट नाटक में हम राजनीति का ‘र’ जान पा रहे हैं? कविताई विरोध के महीन बीस साल गुज़ारकर इरानी सिनेकार ही, अपना संसार ठीक से पहचान पा रहे हैं, आं जुसेप्पे?
मगर जुसेप्पे कहीं नहीं है, सिर्फ़ मैं हूं, जाने किस मुल्क के किस कस्बे में बैठा, उडुपी की इडली कुतरता ब्राइसन के ऑस्ट्रेलियाई पन्नों से गुज़र रहा हूं, ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ कह रही है मुझसे गुज़रो, मुझसे, मैं चिढ़कर नज़रों के एक थप्पड़ से उसे नवाजता झींकता हूं, “तिलिस्म में उतरकर जान जायेंगे, कहां जा रहे हैं? बोल?”
2 comments:
हैंग ओवर रहेगा सर जी
नीली रात किताबी बात एक नशा सा तारी हो गया है....पढ़ कर. एक शब्द में कहूंतो उम्दा !
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