Sunday, December 18, 2011

आंवड़ा का अचार कैसे खायें..

हमेशा की तरह मुंह पर अंगोछा लपेटे जैतराम का जवाब होगा आवंड़ा का अचार वैसे ही खाएंगे जैसे अमरुद और अनार का खाते हैं. हद्द अमदी है भई ई जैतराम, सब समय मुंह पर अंगोछा फेरे रहता है, मंजी महतो हाथ का छोटका हथौड़ी चमरख बंडी का पाकिट में खोंसते, कान की बीड़ी को सुक्‍खल होंठ में खोंसते गरमी निकालते हैं, ई आप अंगोछा काहे ला फेरे रहते हैं, भाई साहेब? राज के चहुंपे हुए डकैत हुए, आपका माथा पर सरकार दू लाख का ईनाम रखे है? अरे, अरैनी का अंसारी का जनानो तक अब मुंह पर बुरका नहीं रखती फिर आप फलतुए काहे ला छुपा-छुपावन का रहस्‍सबाद खेल रहे हैं, भाईजानी? आंवड़ा के अचार को अमरुद और अनार से जोड़ रहे हैं, अरे? खाये का छोड़ि‍ये, कबहूं देखे हैं अमरुद और अनार के अचार? जवाब तीन दिन बाद आता है, सियाबुर्ररहमान मनिहारीवाले बंद मदरसे के पिछवाड़े नीम के पेड़ से दतुअन तोड़ते, सुरती से करियाये मुंह से कमल-वचन बोलते हैं, देखे भी हैं और खाये भी हैं, और अमरुदे का नहीं, परवल का, भिंडी का, अऊर तो अऊर, अन्‍नानासो का खाये हैं, मगर ऊ बात नहीं है जौन अंवड़े के अचार में है!

ए मियां मोहम्‍मत, हियां खाये के बात नै हो रही थी, कैसे खायें के हो रही थी, उत्‍तर के कहानी को दक्खिन नै ठेलो, हं?

कटोरा भर सूजी के हलुआ लै लीजिए, अऊर एक छोट कटोरी में आंवड़ा के एगो छोट अचार.. या फिर तश्‍तरी में जरा-जरा जरल भिंडी के गरम भुजिया सजाइए, मेहरारु से तीन गो ताजा फुलका सेंकाइये, भिंडी में फेर के मुंह में कौर रखिए, अऊर पीछे-पीछे एक तनि-सी कटनी अंवड़े के अचारे का काटिये, देखिए, मुंह में कइसन आनन्‍न उतरता है!

चिरंतनकाल के नारसिसिस्‍ट हताशाबादी इशार्दुलआलम सबकुछ सुनकर भी कुछ नहीं सुन रहे, पेट में भूख की घूमड़ पलटकर लहर खाती है, जैसे कस्‍बाई सांझ में छतों पर ताज़ा जले चूल्‍हों का धुआं नदी बनकर धीरे-धीरे आसमान में उतरता है, दबी आवाज़ ललियाने, गुनगुनाते सबको झुठलाने लगते हैं: ये बातें झूठी बाते हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं, तुम इशार्दुल का नाम न लो, क्‍या इशार्दुलवा सौदाई है.

लब्‍बोलुबाब के? अताउद्दसमद पूछे हैं.

राधामनि के नवके घर के लिए बगान से कटी लकड़ी लादे बैलगाड़ी आई है. हांकेवाले बच्‍चे से बिष्‍टु महतो सवाल करते हैं किसके बागान का है रे? लकड़ी कौन? घर के अंदर से कोई औरत भागी बाहर आती है और बाहर के जमावड़े पर नज़र जाते ही उसी तेजी से फिर भीतर लौटती है. कुएं के पास पंडित राधामोहन का सबसे छोटा बेटा हाथ में तीन अंडे सहेजे, साथ लगी बिल्‍ली की संगत में असहज होता, अंतत: हवा में पैर लहराकर खुर्राता है, ज्‍जा! बिल्‍ली सामने के पैरों को जमीन पर दाबकर ब्रूस ली वाला पोज़ लेती, गुर्राये जवाब देती है, म्‍याऊं.

लब्‍बोलुबाब ये कि आंवड़े का अचार कैसे खायें की जगह कैसे न खायें? ठीक है, चलिए, इसी पे बिचार-प्रजनन कीजिए, ज्ञानदान दीजिए?

3 comments:

  1. कटोरा भर सूजी के हलुआ लै लीजिए, अऊर एक छोट कटोरी में आंवड़ा के एगो छोट अचार.. या फिर तश्‍तरी में जरा-जरा जरल भिंडी के गरम भुजिया सजाइए, मेहरारु से तीन गो ताजा फुलका सेंकाइये, भिंडी में फेर के मुंह में कौर रखिए, अऊर पीछे-पीछे एक तनि-सी कटनी अंवड़े के अचारे का काटिये, देखिए, मुंह में कइसन आनन्‍न उतरता है

    अबरी तो बिना खईले आनन्न उतरिस...! सच्चो त...!

    अपकी बोली और भाषा दुनु संक्रामक है. उड़ते उड़ते हुए गुज़रते लग जाता है.

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  2. you are master. And saheb(you know ) master sahibji. Too good (etna badai bahut ba)

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  3. @सुकिरिया, डाक साहब..

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