
सबसे आसान तरीका है आनेवाले यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कार्यकर्ता राहुलजी गांधीजी के सिपाही हो जायें, मुंह में लोहे के चनों का ऐसा स्वाद उतरेगा कि आंवड़े के अचार से यूं ही मज़े-मज़े बच जायेंगे. या और आसान है गंभीरली मेरा ब्लाग पढ़ने लगें, ऊपर से नीचे तक पोस्टों का अर्थ भेदने में जुट जायें, देखें, अर्थ तरसकर बाहर आता है कि हरमखोर आंवड़े का अचार! दूसरा तरीका है वीसा को धता बताते, फ्रांस में कुसकुस, या इज़राइली कब्जे के लेबनानी समुंदरी तीरों पर नमक का स्वाद खोजने निकल चलें, जैतुन की नस चटकाती हवाओं में आंवड़ा, अमरुद, आंवले का मुरब्बा, मुंह के अन्य सब सारे स्वाद चट बेमतलब हो जाएंगे, आत्मा में सिर्फ़ एक टीस की जगह और हारी, दीवार पर सर पटकती उम्मीद बची रहेगी, यकीन न हो तो अभी आजमाकर देखिए. तीसरा, सबसे आसान रास्ता है, हाथ के सारे काम छोड़ भागकर बंबई चले आइये, फुसफुसाकर मेरे कान में गुनगुनाइए: “तुम अपना रंजो-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो”, और आपका हुक्म मैं अपने सिर-आंखों लेता, तड़ जुगलबंदी में गाल बजाना शुरु कर दूं, “मेरे दु:ख अब तेरे, तेरे सुख अब मेरे, मेरे ये दो नैना, चांद और तारे तेरे, तेरे!”, इतने में जैसाकि सहज स्वाभाविक है आपकी चेतना लौट चुकी होगी, और घबराहट में जो आपका दम फूलेगा, उतने में तो आंवड़े के गंवार अचार की भुरकस निकल चुकी होगी, शर्तिया.
आंवड़ा का अचार न खाने के इन तीन मुख्य तरीकों से अलग तैंतीस और तिहत्तर दूसरे तरीके हैं, सबसे आसान और मुफ़्तिया फिर वही है कि लौट-लाटकर मेरा ब्लाग पढ़ते रहें, अनंतर मन में प्रेममय धीरज और आत्मा में मेरे प्रति विनम्र श्रद्धा धरें (प्रेम तो धरें ही), आपके आंवड़े के अचार (और आपका) काम बहुत आसानी से तमाम होगा, मेरा विश्वास करें. विश्वास भय और आशंका की सौत और विजयभावी की अनुचर ठहरी. मन में विश्वास हो तो मनुष्य सात समंदुर पार कर जाता है (मनुष्य होना, और बने रहना, ज़रूरी है. मनुष्यत्व आपसे छूट रहा हो तो अपने से छुपाते हुए धीमे-धीमे मन में गुनगुनाते रह सकते हैं, मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे क़ामयाब एक दिन, आंवड़े का अचार छूटेगा पीछे, एक दिन!). बंगला के नवारुण भट्टाचार्य का पतला उपन्यास है, मुनमुन सरकार का अनुवाद है, हरबर्ट, राधाकृष्ण ने निन्यानबे में छापा था, अभी इस महंगाई के दौर में भी पचास टाका में उपलब्ध है, घर में ज़रूर होगा (नहीं होगा तो मालूम नहीं फिर आप मनुष्य कैसे होंगे), निकालकर पढ़ने लगिए, सत्तर के दशक की शुरुआत के अंतरंग चित्र उतारती, किताब के ढेरों पन्ने हैं कलकतिया जीवन के भेद और पुलिसिया गोलियों से पैदा हुए छेद में आपको ऐसे नचाये रहती है कि आंवड़ा, किम्बा उसका अचार, बेमतलब पड़ा रहता है. जैसे बुल्गाक़ोव की इतनी पुरनकी किताब है, मास्टर और मारगरिटा, उस शुरुआतीये दौरे में ही, जहां वाम-प्रभुओं को मुंह चिढ़ाती सारी बामपंथी जिरह-बीरमर्श, सर के बल खड़ी हो जाती है, और किताब के खत्म होने के बहुत-बहुत बाद तक फिर आपके मन, और मन के बाहर समाज के जीवन में, सर के बल ही खड़ी रहती है! किताबें क्यों ऐसे, इतनी, गड़बड़ियां कर जाती हैं? चेतन (चहुंपा) भगत सर्वसुलभ होता है और मांदेलस्ताम की कहो तो क्रॉसवर्ड का बच्चा चौंककर पूछता है, मांदेल हू? क्या दुनिया है, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है? ऐसे ही नहीं है कि हारकर सिर नवाये मैं क्रॉसवर्ड के बच्चे पर हाथ छोड़ने से खुद को बचाता, बुदबुदाता हूं, ठीक है, बाबू, रहने दे मांदेलस्ताम, मेरी कविताओं की किताब ही बाहर कर, लड़का घबराकर दो कदम पीछे करके कहता है, अज़दक हू? जबकि मेरी कोई एक सिंगल किताब तक छपी नहीं होती है, राधाकृष्ण और राधाकुमुद वाले ही नहीं, कविता कोश के वाचस्मति तक मुझसे अपने को बचाते चलते हैं? और दोष बेचारे हमेशा आंवड़े के अचार के सर मढ़ा जाता है? यूं ही नहीं है कि आप आंवड़े के अचार से घबराये हुए हैं.
घबराने की बात नहीं है. मुंह पर रुमाल धरे रहें, आंवड़े का अचार क्या कोई माई का लाल आपके मुंह में सवार होने की कोशिश न करेगा. और आसान है कि इस बमचख से निकल कर जिशु संतानों के मोहल्लों की तरफ निकल लें, उधर इन दिनों केकों का जलवा है, आंवड़ों की कोई नहीं सोच रहा. चुप्पे किसी सुलक्षणा गोम्स के बाजू खड़े हो जाइए, कंधा सटाये हारी, नीची (नीच नहीं!) नज़रों से मनुहार करिये, सुलच्छना, का रे, लगता है तोरा बिन हम्मर जीबन और जोबन के काज नै होगा? अब और केतना साल इंतजार करें, सलम, क्रिसमस तक हम फेरा नै ले सकते हैं, का बोलती है? देखिए सुलक्षणा गोम्स का बोलती है. उसकी बजाय उसका ब्वॉयफ्रेंड बोलने चला आये तो अपने वाला आंवड़ा का अचार उसीके मुंह में ठेल दीजिए, और रहीं सुलक्षणाजी गोम्सजी तो उन्हें चार ज़रा ठोसवाला सुनाके हुआं से चुप्पे से सरक लीजिए! मेरी वाली उमर में धंसे हों, यानी शादी की उमिर निकल चुकी हो तब और आसान है, सुलक्षणा बेबी से मुस्कियाये साफ़ बता दीजिए कि का रे, अब तो बॉयफ्रेंड और हस्बैंड के टंटे नहीं है, न तुमरे पुत्ररतन को स्कूल पहुंचाये और घर लावे की हम्मर जिम्मेदारी है, फिर काहे ला फुटानी फेर रही है? डैरेक्ट खाएगी चार लात तब गाएगी हमरे साथ? ऐं, बेबी?
एतनो के बावजूद आंवड़े के अचार से पिंड नहीं छूट रहा तो सबसे छुपाके रॉकस्टार के अंधारे में घुसके लैपटाप का उजियारा फैला लीजिए, चूंकि मेरी अभी चढ़ी नहीं हैं, तब तक अदमजी गोंडवीजी की ही कुछ कबित्त का स्वाद लीजिए, टाइम्स नाऊ और एनडीटीवी वाले तो ये सुनायेंगे नहीं, लोकल केबल पर कहीं कोई बताये भी तो हमेशा खतरा रहेगा कि दू मिनिट के बाद आंवड़े के अचार का विज्ञापन चालू कर दे! या उससे आगे येहो रस्ता बचता है कि बेचारे देबानंद की दीवानी कहानी के रोमानी कंधे पर खामखा अपनी तिलकुट चिमरख लादने का ऐसा क्रूर खेल खेले लगें कि बेचारा देवेनंद घबराकर आंबड़ा के अचार खा लेवे, चट हुएं सारी कहनिये खतम होय जाये! उसके अनंतर अच्छा होगा मैं इतमीनान से जुसेप्पे को जिरह में खींचे दुखी होता रहूंगा, आप शर्मिला और राजिंदर कुमार की सुरमई देखे-देखे सिर फोड़ना.. दुनिया तब्बो रहेगी, आंबड़ा का अचार खाये वाला कोई नै रहेगा!