फ़िल्म के शुरु में ही इंजन के सुरबद्ध शोरिल संगत में दबे दर्द के अचानक ऊपर चले आने के तने क्लोज़अप्स बझाना, कुछ हमारे भीतर बजाना शुरु करते हैं. अलबत्ता यह योगेश और सलिल चौधुरी के कहीं दूर जब दिन ढल जाये के आनंदी सुरीलेपन का बजना नहीं होता, कनपटी पर अंग्रेजी का एस ए डी (SAD) जैसा कुछ अचक्के का जगने लगना होता. दांतों के बीच नंगा चाकू दबाये धूप की भीड़ में कोई नंगे पांव भागता दिखता, थोड़ी देर को वहम होता मेरा ही कोई डबल है बदहवास, बलतोड़ के दर्द में ऐंठा मदहोश भागा जाता है. मगर फिर गोद की किताब और गरदन के उमस को पोंछते हाथ से तसल्ली होती कि मैं भगा हुआ भले हूं, कहीं भाग नहीं रहा. मस्ट बी सम अदर किड्स, हैविंग अ प्लीज़ेंट करवरसेशन, देन शायद बहस हाथ से छूट गई हो, पीठ पीछे कहीं बम फूट गया हो. ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोज़ जैसा कोई सेनारियो? इट्स ऑल मिक्स्ड अप ऐक्चुअली. मीनाक्षी मुखर्जी को नहीं पढ़ा है. न पोस्ट इंडिपेंडेंस बांग्ला कविताओं का नॉट सो वेल ट्रांसलेटेड, परफेक्ट एंथालॉजी. पोस्ट इंडिपेंडेंस ऑरिजनल भोजपुरी की कविताएं भी नहीं पढ़ सका हूं. सो द मैन विद मीनाक्षीस बुक इन हिस गोद ऑल्सो मस्ट बी समवन एल्स, मेरे हाथ किताब नहीं, ओपेन का एक पुरनका अंक है और मैं अरणव सिन्हा को पढ़ रहा हूं, बिना जाने कि आई डोंट नो व्हॉट इस माई टेक ऑन दिस. जबकि मैन ऑन द रेल की कहानी काफी आगे बढ़ गई है. कनपटी और सिर का दर्द भी. आंबीयेंस में एक नंगा चाकू है, धूप में नंगे पांव भी, बट इट्स स्टिल, ऑल मिक्स्ड अप. एन ओल्ड फ्रेच चैप हैस रिटेन सम मैजेस्टिक लाइन्स इन हिस मैजेस्टिक बुक (पार्ट फोर, द वर्ल्ड एंड इट्स इनहैबिटेंट्स, अध्याय चौदह: द मैजिक कारपेट), ऑब्जर्वेसंस, और सिर्फ़ हिंदुस्तान का ही नहीं, बांग्ला और पाकिस्तानी सैरे भी समेटे हैं बंदे ने, और बड़ी मुहब्बत से समेटे हैं. अब यह दीगर बात है कि इसका हिंदी तो हिंदी कभी बांग्ला में भी अनुवाद हुआ है या नहीं. नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ, और नहीं हुओं का हमारा समाज सभ्यता के किस पायदान पर गोड़ फंसाये खड़ा है. भाषा और साहित्य और समाजशास्त्र तो हुआ, देश में विज्ञान के अवदान पर भी यह एक छोटी टिप्पणी है, उड़ते में नज़र गई. इतना सारा जख़्म है, मगर मालूम नहीं चाकू किसके दांतों के बीच है. नॉट बीटवीन माई टीथ फॉर श्युअर.
(बाबू सुमित कुमार कटारिया के लिए)



