Tuesday, November 29, 2011

दीना शंकर त्रिभुवन मुरारी एबोम इंद्रजीत

उन ज़मानों की बात है जब ज़ि‍या उल हक़ और एलीस भट्टी के पीछे मोहम्‍मद हनीफ़ की रूह अभी फ़ना हुई नहीं थी. पृथ्‍वीराज पाकिस्‍तान से निकल लिये थे, गो पाकिस्‍तान के विधिवत ऐलान होने में तब भी अभी समय था. दुनिया में मेरे आने में तो था ही. पाकीज़ा औरंगाबाद-बंबई मार्ग पर मुझे ‘ठाड़े रहियो ओ बांके यार’ के संगीन इशारों से असमंजस में नहीं डाल रही थी, जैसाकि ‘जाने भी दो यारो’ का विनोद डिमैलो को ‘थोड़ा खाओ थोड़ा फेंको!’ के पाठ पढ़ाकर ह्यूजली कन्‍फ्यूज़ कर रहा था. जवाहरलाल ने तेजी से सपने देखना शुरु कर दिया था लेकिन अभी पंचवर्षीय योजनाओं के फ़रेब में गिरे नहीं थे. अलबत्‍ता गांधी की लाख लेक्‍चर व पर्चेबाजियों के बावजूद गांव गिरे ही हुए थे, और आनेवालो वर्षों में कांग्रेस के काफी ऊपर उठ जाने के उपरांत भी, वहीं नीचे, गिरे ही रहे. हालांकि नेहरू की दुलकी दौड़ में शहरों ने बाजी मार ली, गांव खेत रहे कहना ज़्यादा वाजिब होगा. लेकिन साथ ही, इस प्रसंग में कुछ नहीं कहना भी उतना ही वाजिब होगा. आई-पॉड तो दूर अभी स्‍टीव जॉब्‍स ने रेडियो की सूरत भी नहीं देखी थी. रेडियो के लिए फ़ि‍राक़ का लिखना ‘ग़रज़ कि काट दिये ज़ि‍न्‍दगी के दिन ऐ दोस्‍त, वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में’ और उसे तब रेडियो पर अपनी बिगड़ी आवाज़ में मेरा गुनगुनाना भी बाकी था. मैंने पहले कहा ही, अभी मैं बाकी था. छोटे, तीन कमरों के क्‍वार्टर को जो मैंने बहुत बाद घर की सूरत में पहचाना, वह तब साल का जंगल और साम्‍भर और बारहसिंहों का ठिकाना था. या ऐसी ही किन्‍हीं अन्‍य जंगली जानवरों का[1].

गांव और जंगलों के अंधेरों से घबराये लोग तब तेल की रोशनी पर टिके कलकत्‍ता में ज़ि‍न्‍दगी की खोज में भागे आते और थियेटर-कंपनी की तारिकाओं के छलावेभरे चकमक के पीछे, बड़ाबाज़ार की जगमग रौशनियों के नीचे गुम होते रहते. जिनकी धोती की गांठ में अभी कुछ सिक्‍का-धन होता वो मुन्‍नीलाल, या तपोधन मईती के ठेके पर ग़म ग़लत करने पहुंचते, वर्ना ज्‍यादों की कथा यही होती कि वे अपनी शांतिपुरी धोतियों के घेरों में उलझे फड़फड़ाते रहते, रास्‍तों की भटकन कहीं उन्‍हें पहुंचाती न होती. दीना, शंकर, त्रिभुवन, मुरारी को नहीं ही पहुंचा रही थी. अलबत्‍ता मुरारी के कुरते की जेब की सुनहली पन्नियों में सिहजा, अभी एक का एक टंका सुरक्षित बचा पड़ा था. मगर सुखोमोयी राखाल स्‍ट्रीट के उस तेलियाये पथ की तेलियायी रौशनी में मित्रगणों के चेहरे से रौनक लापता थी, इसलिए कि जिले-ज्‍वार का चिरसंगी बिंदेश्‍वर संध्‍या के रसअनुसंधान की उनकी यात्रा में उनके संग नहीं आया था?

“बिंदेस्‍सरजी ने एकदम्‍मे दग़ा दे दिया!” त्रिभुवन होंठों से बाहर आ रहे जर्दा की पिचकारी सड़क के बाजू उड़ाते हुए बोले.

“वो अभी पहिले गाये से फुरसत पाय लें, ‘रात की रात कभी मेरा घर, तेरा रैनबसेरा होता’?” शंकर हाथ का लाल रुमाल लहराते आंखों ही आंखों मुस्‍कराकर चुटकी लिये.

तो मित्रगण समझ रहे थे कि बिंदेश्‍वर अब उनके साथ नहीं आ सकता था? क्‍योंकि अब वह अपने वश में नहीं था, रात और उसके अकेलेपने का साथी था? और उसके साथ-संग के लिए बाबुलबाला की ठुमरी का कोई एक ग्रामोफ़ोन रेकॅर्ड नहीं था, दरअसल सस्‍ते दारु की पव्‍वेवाली बोतल तक न थी!

फ़ि‍राक़ साहब होते तो गुनगुनाकर घाव सहलाते, ‘तरके-मोहब्‍बत करने वालो, कौन ऐसा जग जीत लिया, इश्‍क़ से पहले के दिन सोचो कौन बड़ा सुख होता था’, मगर जैसा मैंने पहले कहा ही, यह फ़ि‍राक़ साहब के गोरखपुर, लखनऊ, कानपुर की महीन सवारियां, कारगुज़ारियों से पहले का क़ि‍स्‍सा है. फिर बिंदेश्‍वर तब यूं भी उर्दू नहीं जानते थे, और बाद में भी हमेशा किबला कमज़ोर ही रहे. बंग्‍ला के छोटे-मोटे सरल पद टेढ़े स्‍वर गुनगुना लिया करते थे. छाती पर कटार चलवाने का काम भी, अल्‍ला-कसम, उसी रस्‍ते हुआ था! सुनिये, धीरज धरे सुनिये, बात खुलती चलेगी.

पड़ोस के पोखरे से नहा और धोती साफ़ कर, चाटुर्ज्‍या प्रेस की नौकरी से छुट्टी के दिन, बाबू ब्रह्मदेव मिसिर तंग बाईस सीढ़ि‍यों की ऊंचाई तय करके जो उस डेढ़ तल्‍ला के तंग कमरे में पहुंचे तो सांझ के उस झुटपुटे बिंदेश्‍वर को खटिये पर औंधे मुंह लेटा पाया. उठकर बैठे तो जवान का चेहरा लाल हो रहा था. जाने भूख से कि शर्म से. सही है मनुष्‍य निज स्‍वार्थ में अंधा होता है, और प्रेस की नौकरी में रहते हुए ब्रह्मदेव बाबू यूं भी कुछ अंधाये चल रहे थे, मगर मित्र की दशा की जैसी भी, धुंधली ही सही, झलक देखकर स्‍वाभाविक था बेचारे एकदम-से विचलित हो गए, बोले, “ये क्‍या हालत बना रखी है, बच्‍चा? क्‍यों, किसने?”

धीरे-धीरे उसका भी ज्ञान प्राप्‍त हुआ. बिंदेश्‍वर झा के कुम्‍हलाये मुख और कृशकाय स्‍वर से ही हुआ.

खबर हुई झमेले की जड़ में षोडशवर्षीय बंगबाला सांओलीदेबी सरकार थी, जो घटक के सीन में एंट्री से पहले ही उनके प्रथम छोबिचित्र ‘नागरिक’ के नायक-परिवार की नायिका वाला पार्ट खेल गई थी, मतलब तथाकथित भद्र परिवार की तथाकथित होनहार कन्‍या को जीवन की कर्मनाशा नदी ने भद्र समाज से स्‍थान्‍तरित, पददलित, अंतत: बहिष्‍कृत करके झुग्‍गी-झोपड़ि‍यों के अनिश्चित निराश्रय में पटक दिया था. और भद्रकन्‍या (नायिका) गश खाकर सन्‍नभाव नितांत कलाविहीन क्षण निकाल रही थी. फ़ि‍लहाल चाटुर्ज्‍या प्रेस तो नहीं मगर वैसे ही एक अन्‍य बंगभाषी छापेखाने के बाहर लोगों को पानी पिलाकर दो पैसे कमाते हुए जीवन-यापन कर रही थी. अजी क्‍या जीवन-यापन कर रही थी, ऐसे में कितने ही उम्‍दा, पहुंचे हुए किरदार क्‍यों न हों (सांओलीदेबी थी. ठुमरी, दादरा और ख़याल गाती थी, बाकी की संभावनाओं का संसार अभी खुलना बाकी था!) एक बार झुग्‍गी-झोपड़ि‍यों की दुनिया में पैर धरते ही यक्ष्‍मा और टीबी की दुनिया में का अपना अलग ही यक्षगान शुरु हो जाता है. सारी होशियारी सिर के बल खड़ी हो जाती है. बिंदेश्‍वरनाथ की हुई ही, जबकि वह तो उस यक्ष्‍माग्रस्‍त यथार्थ का वास्‍तविक पार्ट भी न हुए थे, पार्ट मात्र सांओलीदेबी का हुए थे, वह भी वेरी-वेरी पार्शियल, क्‍लोस टू प्‍लैटोनिक. ख़ैर, पार्ट हुए सत्‍य यही है. और सत्‍य और स्‍वार्थ की ही तरह आप ज्ञानीजन यह भी जानते हैं कि संवेदना मनुष्‍य को कहीं का नहीं छोड़ती. ग़ालिब छूट सके थे? दिल ही तो है न संगो-ओ-‍ख़ि‍स्‍त दर्द से भर न आए क्‍यों, रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्‍यों, बताइए?

“इस सताए में तुमरी यह दुरदसा हुई है?” बाबू ब्रह्मदेव घबराये पूछे.

चेहरे को उल्‍टी हथेली से रगड़ते हुए बिंदेश्‍वरनाथ झा ने जो सीन इनैक्‍ट किया उसमें नायिका-नायक संवाद की दृश्‍यावली सतावन-प्रसंग का स्‍वयंमेव प्रमाण थी.

नायक (भरे कंठ से): अमीर होता तुम्‍हारी मदद कर सकता, सुश्री सांओलीदेबी, लेकिन ईश्‍वर को, समय, हमारे समाज को स्‍वीकार्य न हुआ मैं किसी रूप तुम्‍हारे कार्य आ सकूं!

नायिका (उससे कहीं ज़्यादह भरे कंठ से): जानती हूं, हृदयसम्राट, मुझे और कष्‍ट से न भरो. मुझे याद है अर्थधनी वह अनोखी घड़ी, जिस दिन तुमने कहा था मुझे देने के लिए तुम्‍हारे पास सिर्फ़ प्रेम है, जो किन्‍हीं कतिपय अल्‍पक्षणों तुमने दिया भी, अपने प्रेम का वह कोमल पुष्‍प-दान! मैं ही मूर्खबाला ठहरी जो उन अमूल्‍य क्षणों का संरक्षण न कर सकी. मेरे जीवन के वे बहुमूल्‍य रत्‍न मेरे आंचल से छूटकर निकल गए, पूजा का वह स्‍वर्णथाल छूटकर जाने किस अतल गुम गया! हा: जीबोन, उस प्रेममणि के विलुप्‍त हुए जाने के बाद भी अन्‍यायी, निष्‍ठुर जीवन तो किन्‍तु तब भी शेष है! (फूट-फूटकर अब क्रंदन-गर्जना करती) और रोज़-रोज़ उस निशेष को मुझे जीते जाना है, तुम्‍हारे प्रेमाभाव में, हे, ओ मेरे हृदयप्राण!

कंपनी थियेटर के किसी भी उज्‍जवलाकांक्षी मंचन से वंचित, ज्येष्‍ठ मास की उस क्‍लांत संध्‍या सड़क पर आवारा टहलते दीना, शंकर, त्रिभुवन, मुरारी कभी नहीं जान सके कि चिरसंगी बिंदेश्‍वर से दूर रहकर उस सांझ वे किस अनूठे नाट्य-प्रस्‍तुति से हाथ धो रहे थे.


[1] . बाद में जंगली आदमियों का हो गया. जंगली जानवर दुम दबाकर जाने किन जंगलों में भाग गए. भगोड़न की उस गौरवशाली परम्‍परा को पुष्‍ट करता हुआ मैं महाराष्‍ट्र के जंगल अर्थात बंबई की तरफ़ निकल आया, जहां मनुष्‍य की शक्‍ल में साम्‍भरों की कमी नहीं थी. आज भी नहीं है.

एक आवारा तिलवा-बंदी

दिनभर जतन किये जिन्‍हें बुहारते रहते हो

रात की गोद में फिर वही संवारते रहते हो


देखा न साथ संगत किये कभू, अमां फिर कौन हैं

जौन दीना शंकर त्रिभुवन मुरारी पुकारते रहते हो


यहां रात-दिन बरसती हैं चोटें, औ' तब्‍बो गुज़र होता है

बस इक तुम्‍हीं हो कि छाती की सीलन उघारते रहते हो


मन भर जाये कह लेना, सुन लेंगे वो दिन हम

अभी कुच्‍छ नहीं जो जागी रातें गुज़ारते रहते हो.


(यह ख़ास मिस बोकारो सुरंदरी के लिए)

Friday, November 25, 2011

बाजना बाजाओ ना ओ गान्‍ना गावैया..

ओ बुल्‍गरिया के गवैया मत आओ येह गली मत गाओ गाना, बाजना तो मत्‍ते बजाना, बिस्‍कुट और चाह पर खिंचता है दिन, भूले कब्‍बो सीढ़ी चढ़ मुस्‍की एक ऩज़र देख जाती है (उस एक्‍के नज़र में हरमख़ोर सत्रह मर्तबे लजाती है), का चाहते हो तुमरे चक्‍कर में ऊहो बंद करे ई घर का पानी-दाना? ना बाबू मत भरो बैगपैपी में हावा (फट्टल चदरा से बाजा ढांके रक्‍खो, गांजा पिये सुत्‍तल) गरीब पे रहम करो, मत छेड़ो हियां दरद के तराना.

पिट्टल सब राष्‍ट्रीयता के दरदभरा तान, पिटइलों के सोगगीत गान का बाबू अब कवन मतलब है, अट्ठारह के काननबाला अऊर अड़तालीस के बुझव्‍वलबीन सब सड़क अऊ संडास में रनबीर का कपूर साट रहे चाट रहे हैं, तुम झुट्ठे आत्‍मा का चित्‍कार हाहाकार का हिनहिनायन फैला रहे हो, काहे बाबू गाल बजा रहे हो? हमरे माफिक तीन तिलकुट होंगे गंदा बिछौना से भहराकर ज़मीनी कीच पे गिर रहे हैं, मन के बकरी घबराकर दिल के कोना तोड़ सब सुरच्‍छाकवच फोड़ जाने कवन अंधारबन भाग जाती, मिमियाती हेराये रहती दोबार हाथ नै आती है, बकिया कोई अऊर सुनता है जी? सन् उन्‍चालिसे में बूझ लिये थे ई गहिरा रहस्‍स महापरान श्री सूरजकांत, आपको अब्‍बो ले नै बूझ रहा है जी?

Monday, November 14, 2011

धीमे-धीमे, कभी

धीमे-धीमे पानी के अतल में उतरते ही सुन पड़ने लगी पंखे की घरघराहट वह मशहूर, बंद अलमारियों के खुले खुलने लगे दृश्‍यबंध, होंठ भींचे अपनी हिचकियों के बीच मैंने खोल लीं झक्‍क आंखें, चिपचिपाहटों से गुज़रते दीखने लगे जीव-जंतु जिन्‍हें खुले दिन खुली नज़रों देखने की हिम्‍मत न होती कभी बेहोशी में भी भूलकर. दीखी वह औरत जो मेरी ज़ि‍न्‍दगी नहीं मेरे ख़्याल के तवह्हुमात में भरी मुझे घुमाने, डॉक्‍टर दिखाने लिए गई थी, मैं दीखा पागलों की सभा में मरने की सूरतों की एक कार्रवाई क़लमबंद करता, सिर व कंधे खुजाता, एक बहक में सुलगकर दूसरे की फुनगियों पर फुदका गया आंखें मूंदता चौंककर जागता. सरसराते पन्‍नों की गलियों के अंधेरों के पार किताबें दीखीं जिनके बालों में एक उम्र से तेल न पड़ा था, सफ़री झोले में संतरों के ताज़ा छिलके और गंदे नाख़ूनों की पपड़ि‍यां और एक जोड़ी नये मोज़े, सपनों की चंद जवान कमीज़ें दिखीं, अलसाई, जो किन्‍हीं और शहरों में खरीदी किन्‍हीं और शहरों भूल आया था. पान की गुमटी में एक कुम्‍हलाई औरत ज़ि‍द करके हंसती, गंदे दांत दिखाती बताती दिखी कि भैया, तुम्‍हारी बहन नहीं हूं, तुम्‍हारी कोई भी नहीं हूं, तुम ग़़लती से ‘पहचान’ के सेट पर भटके आये दीवाना हो रहे हो, यहां तुम्‍हारा कोई नहीं है, कोई किसी का नहीं है. बकरियों के एक झुंड को ठुमरी सुनाता, रुलाता एक बूढ़ा कसाई दिखा, जासूसी उपन्‍यास से निकली कुछ उदास मछलियां जो ख़ून के सूराग में निकली हाईवे के ट्रैफिक में रास्‍ता भूल गई थीं.

Sunday, November 13, 2011

सैदुल्‍ला, सुधीर और उदास नस्‍लों के अन्‍य क़ि‍रदार..

क्‍लास में फ़र्स्‍ट आने से अलग सैदुल्‍ला की कोई पहचान नहीं थी. उसे फिरोज़ ख़ान, जितेंद्र की फ़ि‍ल्‍मों के नाम नहीं पता थे, ना ही ऑस्‍ट्रेलिया के सबसे डेंजरस बॉलर के बारे में कोई जानकारी थी. जबकि बेनी का बड़ा भाई बैंजो बजाना जानता था, सुदीप्‍तो रथयात्रा के रथ पर घंटे भर के लिए चढ़ा था, संजय गुरुवारा (उसके पापा अस्‍पताल के स्‍टोररुम में काम करते थे) असल ऑपरेशन थियेटर के अंदर जाकर घूम आया था, प्रोबीर मंडल सोनापानी वाले टूर्नामेंट के एक ओवर में दो चौके और दो छक्‍के पीट चुका था. बलविंदर कोहली के घर में रेकार्ड प्‍लेयर था और उसकी मां रसोई में लौकी का कोफ्ता बनाते हुए गुनगुनाया करती, कृष्‍णन साइकिल के राड और कैरियर पर दो लड़कों को बिठाकर पंद्रह मिनट में दीपा टाकीज़ की दूरी नाप लेता, जबकि सैदुल्‍ला के हाथ अभी भी साइकिल चलाते में कांपते थे, देह तनी रहती और तनाव में गोरा चेहरा सुर्ख़ लाल हो जाता और कोई उसके कैरियर की तरफ चढ़ने को लपके, उसके पहले ही वह साइकिल से उतर जाता! सच्‍चाई थी सैदुल्‍ला साइकिल चलाना जानता नहीं था. चमड़े के जूते और दो जोड़ी लाल मोज़ों और क्‍लास में फ़र्स्‍ट आते रहने की कमाई के सिवा सैदुल्‍ला के पास कुछ नहीं था. सैदुल्‍ला कुछ नहीं था. सच्‍चाई थी सैदुल्‍ला से सुधीर को नफ़रत थी.

क्‍लास में मनप्रीत, शंकर और सेक्‍शन बी से सुकांत तीन लड़के थे जो नदी पार पहाड़ि‍यों की दूसरी तरफ़ आदिवासियों का गांव घूम आये थे, निकलने के ठीक पहले सुधीर की हवा निकल गई थी कि भैया को पता चल जाएगा और उसकी पिटाई होगी और वह नदी-पहाड़ और आदिवासियों का गांव घूमने से रह गया था और उसमें सैदुल्‍ला की कोई भूमिका नहीं थी. मगर फिर भी सुधीर किसी को पीट देना चाहता था. अच्‍छा होतो वह सैदुल्‍ला को पीट सकता. हालांकि सुधीर की देह में जान नहीं थी और डील-डौल में सैदुल्‍ला उस पर भारी पड़ता. लेकिन नफ़रत की अपनी ताक़त होती है. और वह शरीरी ताक़त पर हमेशा भारी पड़ती है. नफ़रत की ताक़त में आक्रांत सुधीर दास आंटी के जामुन के पेड़ चढ़कर उसकी फुनगियों तक पहुंच जाता, जबकि सब जानते कि उस ऊंचाई तक पहुंचने के बाद जामुन के पेड़ से नीचे ज़मीन पर लौट आना असंभव है. फिर दास आंटी को ख़बर हुई कि कोई पेड़ पर चढ़ा है तो वह नीचे से बंगला में गालियां देतीं ढेले मारतीं. प‍सलियों में एक ख़ास झुरझुरी महसूस करता सुधीर लेकिन तब दास आंटी की गालियां, ढेले, मौत किसी चीज़ की परवाह नहीं करता क्‍योंकि वह अपने भीतर की नफ़रत और गहरी उदासी से किसी भी सूरत मुक्‍त हो जाना चाहता था! इसीलिए तब बलविंदर की मां के हाथ के बने उसे प्‍याज़ के भजिये भी पसन्‍द नहीं आते, न बलविंदर का चित्रा सिंह की तुम्‍हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहां जाते’ सुनते हुए ऐसे मुंह बनाना मानो कोई उसे कान के रास्‍ते करैले की बरफ़ी खिला रहा है, या उसके कंधों में स्‍क्रू-ड्राइवर घुमा रहा है, और उसके बाद सोफ़े के पीछे जाकर खड़े हुए सवाल करना कि “यार, कहां से निकालती है ये ऐसी आवाज़? तू समझ रहा है मैं क्‍या कह रहा हूं? माने परेशां रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ ये ऐसे नहीं गाती..”

बलविंदर उसका इतना गहरा दोस्‍त था क्‍यों नहीं समझता कि जैसे, जहां से भी गाती चित्रा सिंह सुधीर को परवाह नहीं थी.

सुधीर को दरअसल प्रीति जैन की भी परवाह नहीं थी जो सैदुल्‍ला के पीछे-पीछे क्‍लास में नियम से सेकेंड आती और उनका फ़र्स्‍ट और सेकेंड आना कुछ उसी तरह की बकवास कहानी होकर रह गई थी जैसे मनोज कुमार की फ़ि‍ल्‍मों में महेंद्र कपूर के गाने को होना ही होता और किसी भी मैच में ओपन करने के लिए फील्‍ड पर उतरते ही तीसरे ओवर के पहले सुधीर का स्लिप या मिड ऑन के कैच में आउट हो जाना! सुधीर को क्रिकेट और प्रीति दोनों से नफ़रत थी जो साइंस के पीरियड में सैदुल्‍ला को ऐसे देखती जैसे ‘गोपी’ में सायरा बानो दिलीप कुमार को देखती है.

सुधीर जानता था उसकी नफ़रत गहरी गड़बड़ि‍यों का कारण हो सकती हैं तब भी वो सरस्‍वती पूजा के आसपास भैया की नोटबुक प्रीति को दिखाने ले गया था. भैया ग़ज़लों के दीवाने थे और उसके पीछे वैसे ही पागल रहते जैसे राजू और उसके गुट के लड़के किसी के साथ बिना वज़ह मारपीट करने को लेकर रहते. ग़ज़लों के कंसर्ट के लिए भैया दूर और अनजानी जगहों उसी हिम्‍मत से चले जाते जैसे पहले के समयों में लोग लड़ाई के मैदानों में पहुंचते होंगे, कृष्‍णन और प्रोबीर मंडल ‘यादों की बारात’ के पहले दिन का पहला शो देखने पहुंचते थे. भैया की नोटबुक अमानत अली, नय्यरा नूर, क़तील शिफ़ाई, मेंहदी हसन, जगजीत सिंह और जाने किन-किन उस्‍तादों की लिखाइयों से अंटी पड़ी रहती. भैया की अनुपस्थिति में सुधीर नोटबुक उलटता-पुलटता कि कोई गंदी चीज़ पढ़ने को मिले और मज़ा आये. प्रीति को वह ख़ास तौर से ‘सबको हम भूल गए जोशे-जुनूं में लेकिन, एक तेरी याद थी जो भुलाई ना गई’ पढ़ाना चाहता था.

उसके बाद सुधीर की निगाह में नोटबुक आई तो वह प्रीति के पास नहीं, सिहंदेव सर के हाथ में थी और कॉमन रुम में सिंहदेव सर अकेले नहीं, पाणिग्राही, उपाध्‍याय सर और दास, टिग्‍गा आंटी के साथ बैठे थे. सिंहदेव सर जानना चाहते थे आखिर क्‍या सोचकर उसने प्रीति जैन को ऐसी चीज़ दी थी. ऐसे सीधे सवाल का जवाब देना सुधीर को बहुत टेढ़ा लगा था लेकिन कुछ देर चुप रहने, वह किस-किस तरह से पिट सकता है की विहंगम कल्‍पनाओं के बाद उसने निर्दोष तरीके से जवाब दिया था कि वह प्रीति को भैया की अच्‍छी हैंडराइटिंग दिखाना चाहता था!

सिहंदेव सर के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, अलबत्‍ता रजिस्‍टर चेक करती टिग्‍गा आंटी मुस्‍कराने लगीं. सिंहदेव सर यूं भी चेहरे पर बिना भाव लाये पीटने के लिए, और बहुत-बहुत देर तक पीटते रहने के लिए मशहूर थे, बोले, “तुमको क्‍या लगा तुम जगजीत सिंह का सवाल करेगा प्रीति तुमको चित्रा का जबाब देगा? अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की, तुम क्‍या समझो तुम क्‍या जानो बात मेरी तन्‍हाई की, क्‍यों?” उपाध्‍याय सर अपनी कुर्सी से उठने लगे, सिंहदेव सर के हाथ का स्‍केल उनके हाथ में मचलता रहा, चीख़कर बोले, “अभी बोलता काहे नहीं? दिल को ग़मे हयात गवारा है इन दिनों, पहले जो दर्द था वही है प्‍यारा है इन दिनों, हां, नहीं?”

सुधीर ने मन में हिसाब लगाया सिंहदेव सर से आज जितने स्‍केल खाये से ज़्यादा ज़रूरी है उनके हाथ से भैया का नोटबुक वापस हासिल कर ले, वर्ना भैया स्‍केल नहीं लात और कुहनियों से हिसाब बराबर करेगा, उसे प्रीति से इंतहा नफ़रत होती रही, वह किसी भी सूरत में ऐसी लड़की से कभी, अगले जनम में भी, शादी नहीं कर सकता, उस पर और सैदुल्‍ला पर तरस खाते हुए भी नहीं, बिना थूक गटके सिंहदेव सर से आंख मिलाकर सुधीर ने हिम्‍मत से जवाब दिया, “चित्रा सिंह क्‍या गाई है, कहां से गाई है, मुझे नहीं मालूम, सर, भैया सुनता है, मैं ग़ज़ल नहीं क्रिकेट कमेंटरी सुनता हूं?”

(जारी)

Wednesday, November 9, 2011

जगहदीन के रंग औ' रौशन..

कितनी रौशनी है जगह कितनी है, धीमान? पैरों से एक चक्‍कर लगाना हुआ तो, ठीक से किसी को समझाना हुआ तो, कितनी है कितनी है, जगह कितनी है, धीमान?

नाक की सीध में साढ़े पांच कदम चलता हूं उसके बाद सामने खिड़की खड़ी है, नहीं, उजाला खिड़की में नहीं बिजली की बत्‍ती में पड़ी है, खिड़की तो सामने लगी दूसरी इमारतों की पीठ में जड़ी है (आलमोस्‍ट, खिड़की प्रतीकात्‍मक है, मित्र, जैसेकि इस अभागे मुल्‍क की राष्‍ट्रभाषा है, है है और नहींये है, इज़ंट ईट? इट्स सो फ़न्‍नी ना? इट्स सो फकिंग फ़न्‍नी दैट इट प्रोवोक्‍स माई डोरमेंट प्रोस्‍टेट, एंड हू नोज़ इफ टुमोरो वन विल बी पिसिंग ब्‍लड?), और अब तुम सामने की इमारतों की तो नहीं ही पूछना, उनका होना तो बस मेरे एड्रेस की नाक चढ़ाना और उनकी अपनी कटाना है, उससे ज़्यादा हमारे आपस का क्‍या सम्‍बन्‍ध, इतना यही ना कि हम शहर के आंकड़ों में हैं और वो रोकड़ों में, रोकड़े होंगे तो इमारत मज़बूत होगी ही, बड़ी और महंगी भी, क़ायदे से तो मुझे खुश ही होना चाहिए कि मेरी खिड़की को छेके खड़ी हैं, चिन्‍ता मत करो क्‍या मालूम एक दिन खुश भी होने लगूं, मगर इससे ज़्यादा उनके बाबत कभी जानूं कुछ बता सकूं की हालत में माफ़ करो कभी नहीं रहूंगा, इंसिस्‍ट करोगे तो आऊटलुक, इंडिया टुडे, एचटी के सप्‍लीमेंटों से खोजकर उसके आंतरिक डिज़ाइन की तुम्‍हें फ़ोटो दिखला दूंगा.

ओह, हाऊ डिस्‍ट्रैक्‍टेड यू आर, धीमान? मैं तुमसे तुम्‍हारी रौशनी और जगह पूछ रहा हूं तुम पड़ोस की इमारतों में उलझ रहे हो, आयम नो बायर तुम्‍हारा दोस्‍त हूं, यू रिमेम्‍बर? जस्‍ट अ लिटिल बिट प्रेस्‍ड विद् टाईम!

वी आल आर, कैन आई हैव अ स्‍माईल? मेरे यहां तो आई स्‍वेयर सभी कुछ प्रेशर में है, रौशनी का तो पूछो मत, हमेशा बेचारी शरमाई घबराई रहती है (महीने के आखिर रेलायंस एनर्जी है जो बिल बनाते में शरमाता नहीं), मगर इस देश में, जहां अभी भी बिजली बोलने से पहले लोग इंवर्टर बोलते हैं, मैं क्‍यों क्‍या रौशनी की इतनी कहानी बनाऊं, रहती है रौशनी, हाथ की रेखाएं और इतने और उतने भर दिखते दीवारों की गंदगी पढ़ सकता हूं, पलथी मारे पंखे की हवा के नीचे बहल सकता हूं (पलथी मारने जितनी जगह है, और हां, तुम दूसरी हवाओं का मत पूछना, शहर-समुंदर एंड ऑल दैट, मैं सिर्फ़ पंखे की हवा का जानता हूं, बस की खिड़की पर बैठे किसी हवा के झोंके ने उनिंदियाया होगा तो वह बारह वर्षों पहले का क़ि‍स्‍सा है, और ऐसे कुलजमा साढ़े तीन क़ि‍स्‍से होते हैं जीवन में, जैसे समुंदर में नौका-विहार के, उसका सामान्‍यीकरण करके पंखे की हवा से मेरे अंतरंग संबंध को कमतर मत करो, जितना जीवन में मां को और पिता को नहीं जाना, उससे कहीं ज़्यादा इस पंखे की हवा को जानता हूं दैट्स अ फैक्‍ट), इस इतनी ज़रा सी जगह में यह भी सच है कि दीवारों से टकराता रहूं, मगर शहर के शोर, आदमख़ोर में मुंह धंसाने से कम घिनौना दीवारों से सिर भिड़ा लेना लगता है, दोस्‍त, तुम कहोगे, और सही ही कहोगे, उल्टा-सीधा सिकुड़ा संकीर्णयाया जीवन यह जो जी रहा, वाजिब शहरी व सामाजिक आचरण नहीं, मगर तुम्‍हीं बताना, सच्‍ची, शहर और समाज अब हमसे मामूलियों की कहां पकड़ आता है, शहर के बाइस्‍कोप से शहर पहचानने की जगह मेरी धंसन में शहर की तस्‍वीर बुनो, कैन यू? वर्ना तो सब तरफ़ शहर की स्‍थूल सेंसेशनल फ़ि‍ल्‍मी इमेज़री है ही, खरीद के काउंटर हैं धंधों की बाजीगरी है, त्‍यौहारी शोर है, समाज में किसकी दिलचस्‍पी और सामाजिकता का कहां ज़ोर है? आई मीन, कमॉन मित्र, आप हैं कहां खड़े?

धीमान, धीमान? विल यू शट अप एंड गिव मी अ क्‍लि‍यर पिक्‍चर, प्‍लीज़? हैलो हैलो, हू इज़ देयर ऑन द अदर साइड, कैन यू हियर मी?

………………………………….

(कल अख़बार में दिखी एक ख़बर के अंधियाये अंजोर में)

बेताल सत्‍तीसी, कि बेताल चालीसा?..

बिजली आई. बिजली गई. फिर आई. फिर गई. जसोदा और गोदावरी दोनों बहनें फ्रॉक की बांह की सिलाई के वाजिब तरीके को लेकर सिर-फुटव्‍वल कर रही थीं, अजीजन बी की फुलझड़ी “आग लगे इन हरामिन को!” को सुनकर पटा गईं. अंधेरे में गोदावरी माथे के जुएं टटोलने लगी. सिर पर जसोदा के हाथ का पटका पड़ा, “दुई मिनट चैन से बिठात ना है?”

गोदावरी बहन पर एकदम से पलटवार करना चाहती थी मगर ज़हर का घूंट पीकर रह गई.

जसोदा पंद्रहवें वर्ष में पैर रख रही थी, गोदावरी उससे दो साल छोटी ठहरी. जदुनंदन पंडित की दूसरी पतोहु और अपनी सौतेली मां की दुत्‍कारी दोनों बहनें बिना झगड़े आधे घंटे साथ बैठ नहीं सकती थीं. दोनों बहनें आधे घंटे एक दूसरे से दूर नहीं रह सकती थीं.

बुन्‍नन अंधेरे में मुस्‍करा रहे थे. सधी उंगलियां बटन टांकने में बझी थीं, अनसधी आंखें अजीजन बी की दिशा में घुमी उन्‍हें टटोल रही थीं, मन की खिलन खुदी में सहेजे रखना और संभव न हुआ तो हारकर बोले, “फूफी, तू हम्‍मर बियाह कराय दो!”

इतने में बिजली आ गई. गोदावरी और जसोदा ने एक सुर ताली बजाई. नाक के बीच मोटी ऐनक दुरुस्‍त करती अजीजन बी ने खरखराती लम्‍बी सांस छोड़ी. मशीन के नीचे सीधा करने को पैर किया और तड़पकर फिर उसी सूरत बैठी रहीं!

जाने अब किस निगोड़ी नस ने अपना मुंहजार करम किया! देह का भारीपन ही एक दिन उनकी जान लेगा! नहीं तो चौंसठ की उमिर में कोई दीवार थामकर चलता है? कहीं चार सीढ़ि‍यां चढ़नी पड़ती हैं तो कनपटी लाल हो जाती है, पसीने छूटने लगते हैं. क्‍या करें मुये देह का, सुब्‍हो से लेकर रात तक खटती तो रहती ही हैं, ज़रा खुटुर-खुटुर की धीमी गति में खटती हैं, मगर एक्‍को दिन कहां निकलता है कि खाली बैठी हों? खाली बैठना होता तो इस उमर में इत्‍ती चिथड़े-सी जगह में यह चिथड़ा दरजी दुकान ढोती माथे पर? फिर खुद का उनका खरचा ही क्‍या है, कबूतर की सी तो खुराक है. एक बकरी है घर में, उनसे ज्‍यादा तो वह खा जाती है. हां, रात को कभी बुन्‍नन को रोक लिया तो यह बेशरम ज़रूर उस दिन की रोटियां सधा जाता है. एक बेआसरे बच्‍चे को भरपेट खिलाने की अजीजन बी को दिली खुशी भी होती है, मगर देखो, हरामी की हड्डियों पर पैसे भर का जो मांस चढ़ता हो, और वो हैं कि दो निवालों पर फैली जाती हैं!अजीजन बी ने हिम्‍मत करके अब पैर हिलाने की कोशिश की.

“बियाह होई जाई तS लइका-फइका होइहें, घरे केतना हरियाली आय जाई, ना फूफी? सब तोहार सेवा करिहें!” खुशी में नहाये बुन्‍नन का रेकार्ड जारी था.

“खूब करिहें,” अजीजन बी धीमे-धीमे घुटने और पिंडलियों पर हाथ फेरती रहीं. उनके अपने दो हैं, अल्‍ला के फजल से तंदरुस्‍त हैं, रोजगार से हैं, हाथ की तंगी की तक़लीफ़ नहीं, मोहसिन तो कम अज़ कम, दिखावे को ही सही, बीच-बीच में अपने पास गाज़ि‍याबाद चले आने की बात करता है, मज़हर के मुंह से तो कोई बात ही नहीं निकलती. कितना बखत हुआ जब पिछली मर्तबा हियां आया था, वो बुखार में थीं, नट्टन की पतोह उनकी देखभाल किये रही, कितना टैम हुआ ऊ बात को? अब सब अपनी जिन्‍नगी जीते हैं, बौआ, केकरे पास अब केहू के सेवा करे की फुरसत है, महतरियो खातिर नहीं है!

“लइकन हम्‍में बहुते पसंद हैं, फूफी, बस तू एक बार हम्‍मर बियाह कराय दो, देखS कउने इस्‍पीड से लइकन तोहर आगे सजावत हैं!” अधमुंदी आंखों आसन्‍न खुशी की सोच-सोचकर बुन्‍नन निहाल हुए जा रहे थे.

“और लइकन के खियइबे कहां से रे?” फूफी ने लाल लुकाठी फेंकी.

बेहया बुन्‍नन की खुशी को ज़रा हरज न पड़ा, वैसे ही मुस्कियाये बोले, “का फूफी, हमके रोज रोटी खिवायत हऊ, हम्‍मर लइकन के न खियउबू? ऊ तोहरो तs होइहें!”

अजीजन बी बरसीं, “तू पैदा करे और खियाये के ठेका हम उठाईं? चइली-चइली पीटके तोहर चाम ना उधेड़ दीं?”

गोदावरी व जसोदा द्वय मुंह पर हाथ धरे खी-खी में उमगती रहीं. चइली की चोट की आशंका में बुन्‍नन खिसियाये नहीं, अधमुंदी आंखों मुस्कियाते ही रहे.

गो बुन्‍नन की उम्र अट्ठारह की हो रही थी, बाहर से देखने पर जसोदा से डेढ़ बरस छोटे ही दिखते. सोच-विचारने की उम्र गोदावरी से भी कम थी, और आगे भी मालूम नहीं कब तक ऐसी ही रहे. कौन जानता है शायद हमेशा ही रहे, अजीजन बी सोचीं और हलक में एक उदास घूंट पीकर रह गईं, चइली फेंकने के अपने गुस्‍से पर शर्मिंदा हुईं ऊपरी मन से बात बनाती बोलीं, “और तोसे होनहार के के आपन लइकी दी, बताओ जरा?”

बुन्‍नन उंगलियों से अगले बटन की जगह टटोलते मुस्कियाते रहे, मुस्कियाये-मुस्कियाये सोचते रहे. फूफी गोदावरी की तरफ पलटीं, “तैं करबे रे बियाह बुन्‍नन से?!”

“मियां से हम कब्‍बो बियाह ना कर सकीत हैं,” गोदावरी ने चट सिर झुकाकर गंभीरता से कहा.

जसोदा मुंह पर हाथ धरे हंसती रही, “एक तs मियां, ऊपर से लंगड़, अऊर हमसे तs उमिरो में छोट है, हम्‍मर तs बाते भूल जाओ, फूफी!”

अबकी अजीजन बी से भी मुस्‍कराये बिना रहा न गया, “सुन लेव, मियां जी!”

जसोदा का कसूर था भी नहीं, बुन्‍नन सचमुच उससे उम्र में छोटे लगते थे. फिर बायें पैर में सच्‍चो एकदम ताक़त न थी. ऊपर से कंधे से लेकर पसलियों के बीच तक जली हुई पीठ के साथ बड़े हुए थे. आंखों में उतनी ही रौशनी थी कि ज़ि‍द ठानकर किसी चीज़ को देख लें, मगर फिर घंटों गनगनाता सिर हाथों में लिये बैठे रहने की नौबत भी हो आती थी. ग्‍यारह की उमिर के रहे होंगे जब फसाद में पूरा परिवार उठ गया गया था. यही बहुत था कि पिछाड़े की गली में कमरबंद संभाले तन्‍ने की साइकिल के पीछे भागते उनकी नन्‍हीं जान बच गई थी. अब चूंकि जलती आंधी के चपेटे में पूरा महल्‍ला आया था, थोड़ी कीमत बुन्‍नन को भी चुकानी पड़ी. हाय-तौबा की भगदड़ में किसी जलते ड्राम से टकरा गये, पैर फिसला और गिर पड़े. होश लौटने पर जिस सूरत में खुद को पाया आज तक उसी जली, तबाह को साथ लिये घूम रहे हैं. मगर चेहरे की मुस्‍कान तो आज भी कोई उनसे छीन न सका है. दो मीठी-मीठी बातें करके बुन्‍नन से उनका सिर उतरवा लो, देखो, कैसे खुशी-खुशी अपने हाथ अपना सिर उतारकर आपकी हाथ में धरते हैं!

“ई बकलोल संगे के बियाह करी, केऊ ना करी!” जसोदा दीदी ने अपनी ओर से आखिरी फ़ैसला दिया. गोदावरी बबुनी खी-खी में निहाल होने लगीं, इतने में निगोड़ी बिजली फिर गई.

दुबारा आई तो अपने साथ पांच साल की रौशनजहां मुनमुन सिंह को लिये आई. हमेशा की तरह, चिरकुट कपड़ों और कांथे में लिपटी, मुनमुन की दुलारी गुड्डन रौशनजहां के चंदोवे छाती पर सो रही थी.

मशीन के सामने बच्‍ची पर नज़र जाते ही अजीजन बी का थका चेहरा खुशी में खिल गया, शरारत से हाथ नचाती बोलीं, “का हो, मुनमुन, तू हम्‍मर बुन्‍नन से बियाह करबूs?”

फूफी के सवाल से नन्‍हीं मुनमुन फेर में पड़ गई. आधा दर्जन बेटियों वाले राम इकबाल सिंह के परिवार में हमेशा चिखचिख मची रहती और मुनमुन के लिए अपनी गुड्डन को दो कौर खिलाना, या चैन से एक घड़ी किसी कोने सुला लेना, मुहाल था. उससे बड़ी बहनें हमेशा उसके सिर चढ़ी रहतीं, या वह गुड्डन को सुलाने का जतन करती होती कि मां छुटकी उसके हवाले करके आटा सानने चली जाती, गुस्‍से में मुनमुन का दिमाग ‘फेल’ हो जाता, अभी भी दिमाग फेल ही हुआ है जो वह सबसे जी छुड़ाके भागी आई है, मगर इस भागे में व्‍याह कर ले? अभी, इतनी जल्‍दी? मुनमुन सोचती रही.

सोचकर समझदार पुरइनों सा बोली, “अब्‍भी तs हम्‍म इस्‍कूलो ना गये, कइसे बियाह कइ लें. हां, बुन्‍नन हम्‍मर गुड्डन से बियाह कइ सकत हैं! वइसहो हम्‍में गुड्डन खातिर एगो दुल्‍हा के दरकार रहा.”

जवाब सुनकर बुन्‍नन लाजवाब हो गए. मुनमुन के मुंह का कुछ भी सुन लें, उनकी गोद में चढ़कर बच्‍ची कुछ भी कह दे, उनकी नाक खींच ले, भौं बकोट ले, बुन्‍नन का मन मनभर खुशी में डूब जाता है, और फिर देर तक डूबा रहता है. फूफी इतना भर कह दें, "रौशनजहां, हियां आवs बौआ!" बुन्‍नन के कानों में बरफी और कलाकंद पिघलकर बरसने लगता है. दिक्‍कत यह है कि ऐसे मौक़े बहुत बनते नहीं. मुनमुन फूफी की दुकान के दौरों पर आती भी है तो पीछे-पीछे उसकी खोज में उसकी बड़ी बहनें भी चली आती हैं. फिर कुछ के कुछ की कहा-सुनी में कुछ कटी बातें फूफी को भी सुनना पड़ती ही हैं. ऐसे मौक़ों पर तब बुन्‍नन को अपनी चाहना से फिर शरम लगने लगती है. इसीलिए तो बियाह करके अपने बच्‍चे पैदा करना चाहते हैं. एक नहीं चार-चार मुनमुन होंगे, नाक-आंख काटकर बुन्‍नन को जीना मुहाल कर देंगे! कितना अच्‍छा लगेगा! ओह, सोचकर मन तर जाता है. मगर मुनमुन के भी क्‍या दिमाग है, अपनी गुड़़ि‍या से व्‍याहना चाहती है! कहीं गुड्डन से बुन्‍नन का व्‍याह थोड़ी हो सकता है!

फूफी भी मुनमुन को यही समझाती रहीं. मक़्क़ार मनभर खायेगी परातभर सोएगी, काम एक घेले का ना करेगी, और बच्‍चे तो कवनो सूरत न जनेगी, फिर किस उम्‍मीद आदमी ऐसी दुलहिन घर लाये?

मुनमुन का चेहरा उतर गया. बुन्‍नन उदास हो गये.

गोदावरी के “चकलेट खइबू, मुनमुन?” को अनसुना करके मुनमुन तेजी से बुन्‍नन के गोदी चढ़ गईं, नाराज़गी से बोली, “तs हम्‍म इस्‍कूल न जाईं? अउर कालिच? हमें डाकटर बने का है, गुड्डन के रोज-रोज सरदी पड़त है, ओकर इलाच के करी? हमसे बियाह करे के है ते तs तोके अभी इंतचार करे के पड़ी, करबs?”

बुन्‍नन से चेहरा भिड़ाये मुनमुन बुन्‍नन के कान नहीं खींच रही थी, लेकिन उसके सवाल की गरमी में कान खींचने का सा ही शोर था. उस गरमी में नहाये बुन्‍नन वापस मुस्कियाने लगे. जली पीठ पर मानो किसी ने फूलों की लतरों की छत छवा दी हो, उस नेह-नमी में लगभग लजाते-लजाते बोले, “करब, मुनमुन, करब!”

गोदावरी और जसोदा मुस्‍करा दीं. अजीजन बी चश्‍मा साफ़ करने के बहाने नम आंखें पोंछने लगीं, मुनमुन ताली बजाकर हंसने लगी. कौन पाजी न हंसता?

अबकी बिजली गई तो उस ज़रा सी उजाड़ जगह में अभी भी बहुत रौशनी बची थी..