Monday, November 19, 2012

भाबना गुलो.. एक तस्‍वीर..

“एतो.. कतो रकोमेर भाबना गुलो.. ओ मा, कहां-कहां भहराये रहता हूं? कौन बजह है इन भहराहटों की, बस, उसकी पहचान नहीं होती?” गुनगुनाये-सा में सुकेश दा ने कहा और चार कदम डोलते-सा चले और फिर हारकर खड़े हो गए. हाथ एक मर्तबा हवा में घुमाया, शायद सहारे के लिए आसपास थामने को कोई चीज़ टटोल रहे हों, फिर बेबसी से उसे बगल में गिराये चुपचाप गुमसुम खड़े रहे.

‘पीला पाता’ वाले मैदान के छोर पर गजेंद्र साइकिल के राड पर चूतड़ टिकाये, दाहिने पैर को जमीन पर ब्रेक की तरह फंसाये, सुकेश दा की छटपट, बेचैनी का नज़ारा ले रहा था.

गजेंद्र की उम्र सत्रह की है, अपने को वह अपनी उम्र से सात साल बड़ा समझता है, और इलाके में दूसरों को भले न हो, सुकेश दा के प्रति उसके अंदर कोई दबी करुणा है जो उससे जब-तब साइकिल रुकवाती रहती है, सीधा काम उल्‍टा कराती रहती है. ऐसी मानने की वजह नहीं फिर भी गजेंद्र मन ही मन मानता रहता है कि सुकेश दा की आकुल पुकार उसे ही संबोधित है.

गजेंद्र नहीं जानता कि सुकेश दा के आवारा, ‘बे-ठेकाना’ सवाल किसी संधानी खोज में नहीं निकलते, आवारा अंधेरे से छूटकर वापस उन्‍हीं अकुलाये अंधेरों में उतरते, डूबते रहते हैं. निरवंशी हवेली से उठती हकबकायी हूकों की अनुगूंजें!

आंतरिक गुफ्तगू के संगीत में उलझा आदमी एक समूचा आबाद अंधा कुंआ है, उसमें झांकने से कभी अंधेरी रातों में, किस्‍मत से कभी, सांपों की परछाइयां दीख पड़ें, सांप कभी पकड़ नहीं आते, मगर यह गजेंद्र की उम्र अभी नहीं जानती. शायद बीसेक वर्षों बाद भी न जान पाये..

Monday, October 29, 2012

घर वापसी, बिना शीर्षक

इतने शहरों से निकलकर कितने गांवों को बनाती, उनसे पल्ला छुड़ाती कहां-किधर घुमाती धकियाती, हादसों और हौसलों के दीये-बाती जलाती, बुझाती छकाती छुकछुकाती है रेल. कितनी नींदों में उनींदियाया कैसी में जागता, हकबकाया किस अंधेरे में उतरता आंखें मल-मलकर संभलता आदमी, कलछुल, तसला, कडा़ही आंवड़े का झोला, बाजरे का बोरा, चप्प़ल पर जैराम के फूफा के फैक्टरी की कीच, जेब में मौसी की चुन्नी की बिसरायी फोटो, कितने झंझों से छूटकर, सत्रहवीं मर्तबा टूटकर, पहुंचता ठीया, चैन और क़ि‍स्मत का फ़रेबी जुआ, हाय, हासिल पर प्रेम से हाथ फिराता, आदमी मुस्कराता कि देखिए, लौटकर आदमी घर आता ही है.

Sunday, October 28, 2012

कैचिंग द हर्ट..

बहुत दिनों बाद ऐसे ही, किसी बचकाने संदर्भ के बहाने, इधर ब्‍लॉग पर टहलने आया और एकदम एक अटपटे संकोच और शर्मिंदगी में घिर गया हूं. मानो रात के साढ़े ग्‍यारह के बाद, अपने नहीं, किसी अजनबी घर के दरवाज़े घुसा आया हूं और 'द एक्‍सीडेंटल टुरिस्‍ट' के विलियम हर्ट के किरदार को मन में दुबारा जीवंत करने के इशारे बुन रहा हूं. विलियम हर्ट की याद है? कि कुछ नहीं करते दीखते के सामान्‍य, सहजभाव में, महज़ अपनी उपस्थिति से ही कितना कुछ किरदार में जोड़ते चलने की एक ख़ास अभिनय शैली जो भले आदमी ने अपने करियर के शुरुआत से ही विकसित की थी? 'चिल्‍ड्रन ऑफ़ अ लेसर गॉड' का उत्‍फुल्लित वधिरों का मास्‍टर आमतौर पर परिचित हर्ट चरित्र नहीं, उसकी सहज पहचान उसके एक्‍सीडेंटल टुरिस्‍ट होने में ही है. ब्‍लॉग के मुहाने एक गोड़ टिकाये मुझे खुद अपना अभी यहां होना भी कुछ वैसा उतना ही एक्‍सीडेंटल लग रहा है, नन-कमिटल, हूं लेकिन समूचा कहां हूं, ऑस्‍टर के स्‍मोक की तरह वास्‍तविकता के बीचों-बीच सर्रियल..

विकी के सलिंजर वाले पेज़ पर ऐसे ही एक नज़र गई, देखकर सकते में रहा कि 1951 में पहली मर्तबा छपी 'द कैचर इन द राय' की अभी भी सालाना दो लाख पचास हज़ार कापियां बिकती हैं, सोचने वाली बात न भी हो मैं सोचता रहा हिंदी में कितने लेखकर होंगे जिनके साहित्‍य-निधि की समूचे जीवन में इतनी बिक्री हुई हो.. ! न सोचनेवाली बात की तरह अभी बहुत समय तक माथे में, एक्‍सीडेंटली, यह बात घूमती फिरेगी कि कुछ प्रकाशकों का घर चलाने और कुछ लिखवैयों को पुरस्‍कार सधवाने से अलग, हिंदी का साहित्‍य-समाज कैसा हवाई कल्‍पनालोक है, जिसके वास्‍तविक प्रत्‍यक्ष समाज से कैसे, किसी भी तरह का कनेक्‍ट नहीं.. (दीवाली के विविध साहित्यिक विशेषांक आ रहे होंगे, कृपया फेसबुक पर लपक-लपककर बताना शुरु करें कि कहां, किधर-किधर आपकी कविताएं छपकर आ रही हैं! हद है..)  

Saturday, August 25, 2012

मेलनि लॉरें और जीवन का नमक..

क्‍या किया दो दिन, कि कितने बहुत सारे दिन? (मगर मेरी पीठ पीछे ब्‍लॉग क्‍या करती फिरी? फेसबुक की दीवार पे टंगी चिप्पियां झांक आई, शर्म से चेहरा गिरा लिया, और उसके बाद? बाद के सूनसानी अकेले में?)..
क्‍या करता रहता है आदमी सपनों की जागी नींद में? अख़बारों के बेमतलब चिद्दू वक्‍तव्‍यों व सिब्‍बली स्‍टेटमेंटों की व्‍यर्थता के बाजू खड़ा ऊबते रहने, व ऊबअनंतर जम्‍हाइयां लेने के बाद? मोज़ों की गिनती करने बैठ जाता है, या इतिहास के गंदे जांघियों की सिलवन समझने? कोई लिलियाना कवानी क्‍यों बनाती है ‘नाईट पॉर्टर’ जैसी कोई तक़लीफ़देह और जंजाली फ़ि‍ल्‍म, इन्‍नात्जि़यो सिलोने का ‘ब्रेड और वाइन’ क्‍या बताता है, याकि पाठक को जातीय मानस के गड्ढों में और ज़्यादा उलझाता है? न जानते हुए आदमी अंधे कुएं में रहता है और जानने के बाद खुद को फटी आंखों चमकदार कुएं में पाता है?
बिगिनर्स’ के आखिर में कहानी शुरु होती है, कि उसके आगे फिर एक अंधेरा आंख खोले इंतज़ार करता खड़ा होता है; मेलनि लॉरें की उम्‍मीद (द अडोप्‍टेड) मारजन सत्रपी की उम्‍मीद कहां बनती है, आदमी खुद को खत्‍म करके ही संतापमुक्‍त होने की निश्चिंतता पाता है; मगर फिर ‘ज़ोहरा की जन्‍नत’ का एक दूसरा पाठ भी है, जैसे लवलेस की ‘नमक’ का है, या राहुल भट्टाचार्य के गयानाइ पागलपने का.. परिवेश आदमी को बनाती है (जैसे हिंदी सिनेमा को कसाईखाना और प्रेम की जलेबी बनाये रहती है), आदमी परिवेश में मगर (मोज़े और जांघियों की गिनती से अलग) क्‍या बुनता है?
आदमी जागे की नींद में जो करता हो, मैं सोये की जाग में मेलनि लॉरें के ख़्यालों की उंगली थामे मगर कहीं कहां पहुंचता हूं? गोल्‍डी हॉन कहती है तुम चाहो तो मेरी तरह एक, दो, तीन सहज स्‍वस्‍थभाव सैक्‍सलेस, अस्‍वस्‍थ मुदित-प्रसन्‍न रह सकते हो, या डडली मूर की तरह संगीत व सवालों में डूबे.. थामी हुई उंगलियां मेलनि लॉरें की हों भी तो, अंत उसका मोज़ों व जांघियों की गिनती में ही होगा.. दो दिनों से (या कितने बहुत सारे दिनों से) मैं क्‍या कर रहा हूं, शायद मन ही मन वापस गिनती ही सीख रहा हूं..?

Wednesday, July 25, 2012

हे जॉर्ज, अमरीकी, स्‍टैंड-अप..

देश के भूगोल में अवस्थित एक जीवन की कितनी कहानी होती है, सिर्फ़ उतना भर ही नहीं होती जो विकी बताती है, या स्‍वयं व्‍यक्ति बताता दीखता है. क्‍योंकि बहुत बार तो परिस्थितिगत ठंसाव में व्‍यक्ति विशुद्ध कविता हुआ जाता है. हमारे तथाकथित अधिकारों के शमशान को, भगवान को सिर के बल खड़ा करता, या टंगी जाती भाषा के बाहर खड़ा उसकी टांग खींचता.. ओह, स्‍टुपिड पिपल, एरोगैंट सफ़ेद पिपल, ओ पैनिकी, पथेटिक पैरेंट पिपल..

Sunday, July 22, 2012

छूटती, किताब..

रहती तो ढेरों, उनकी गिनती का अंत नहीं, मगर असल वाली, मन के भीतर घुमड़ती बिछलती, भागती रेल की खिड़कियों से क्षण भर को अपना रुप दिखाके, भड़भड़ाते पीछे छूटते पुल के शोर के पार पेड़ों, जंगल के उतरते तिलिस्‍म में फिर अपने को छिपाये जाती, असल बहुरुप शैतान, हाथ कहां आती. जैसे मन हमेशा साथ रहता. छोटी लाईन के पटरियों से लगी गिट्टि‍यों पर सावधानी से पैर धरने के इशारे बताता, भीड़भरे उजड़े प्‍लेटफार्म की स्‍थूल निर्मम, महीन (प्रकट एक-एक और छिपी हज़ार) उदासियां गिनाता, उन्‍हीं अंतरंग उदासियों में कुछ बहुत खुद भी नहाये हुए, मुंह पर रुमालधरे मुस्‍कि‍याता, लजाता, मगर मन की ठीक-ठीक दशाकथा क्‍या है किस पेड़ पर रहती और किसके थाल में कब खाती, कभी कहां बताता. पिटे मौसम औ’ अव्‍यस्थित जीवन की धार छाती के भीतर हड्डियों में किसी घबराये कफ़ सी बजती, मानो कोई पुकारता हो दूर से. चीख़ खखारकर संवारती हो, दबी हुई नजीके से. वास्‍तविक बरसात के वास्‍तविक अंधेरों में तिलिस्‍मी धूप खिली होती, और कोई बच्‍ची अंग्रेजी में गिनती गिनती होती, जैसे कोई संगीत धीमे-धीमे अपनी टेक गुनता हो, फूले पन्‍ने रह-रहकर नमी में सिहरते कांपे जाते, मलिन मन सिनिकयाये बाजा सुनता कि, अच्‍छा, हां, यही है? दुष्‍टा किताब वहीं कहीं होती मगर हाथ नहीं ही आती.

Sunday, July 1, 2012

जोगी ओ हो जोगी..

(एक नये लिखैये का उदय तो क्‍या हुआ, उनसे नई-नई पहचान हुई, पता चला हमारी तरह यह भी खुद की और भाषा की टहल में भटकते निकले.. उसी भटकन का इक ज़रा नमूना है, कहते हैं कविता है, मैंने कहा, अच्‍छा? मगर, प्रियबर, हम तो नहीं जानते कबीता. ख़ैर, जोगिया पीएस.)


कितना पुराना काठ का पुल ये, इसके बीच कैसे सुनसान कौन कितने दरार. मैं उतना ही पुराना जितनी पुरानी यह धूलधंसी सड़क. नीले आसमान पर उड़ता एक अकेला चील, हूंकता अबोला बार-बार, बंधु, किस देस, हो कौन दुनिया. धुंध की पीठ पर सवार हवा, छूती कहती ये सलेटी सांझ, कितना दूर पसरी कभी इस मन से विदा पाएगी. नहीं गाये का संगीत अभी इस रास्‍ते और कितनी दूर बजायेगी. काठ के तीन अथिर फूल और दो बिचारे कुंहलाये पाथर, टिहुकते टोहते, निकलती, चढ़ती जाती रात, कब आएगा हमारा मुसाफ़ि‍र.

मैं लिखता रहूंगा फूंक धूंकता, सारी रात गुज़री सुबहू तलक, जाने किसकी भाषा में. 


Thursday, June 7, 2012

धूल और किताबें..

वास्‍तविकता की बेहयाई पर रंगों की चिनाई की कुछ तस्‍वीरें..













Thursday, May 24, 2012

अनगढ़ कविता के, तलघर में..

मैं एक कविता बनाने बैठता, और जल्दी ही ज़ाहिर होने लगता कि छिटकती बनती हुई जो भी वह है, वह तो कतई नहीं जिसे पा लेने की पुलक में मैं उमगता कल्पना की रेल चढ़ा था, सूखे व छूटे शब्दों की, बिम्ब-संयोजन की कोई यांत्रिकी-डायरी है, या अंधेरे में जीवन चलाते कंपाउंडर के हाथ घसीटी उपचारी, पिटी हारी साहित्तिक पुरची; कविता, किसी पुरइन पंडिताइन के अचेतन रुटिनी दोहराव में बजती घंटियों-सी, हमेशा मोस्‍ट ऑफ़ द टाईम यही होता बीच रास्ते कहीं अगवा कर ली जाती, तीन भाई कभी बच्चे थे साथ हंसते थे कैसा सहजभाव सच्चा, अच्छा लगता था, आज साथ बैठे के कुनमुनाते में सहजता में रो तक नहीं पाते की तर्ज़ पर कविता अपना भुनभुनाना गुनगुनाती, या फ़ि‍ल्मी तुक में नाटकीय होती एकदम अश्लील हुई जाती, मैं घबराया भागकर रंगों के कारखाने ख़याली अमूर्तन के तलघर छुप जाता, भाषा की अनगढ़ बास्टर्ड भोली को उंगलियों पर गिनता बुदबुदाता, घिसे मलिन काईखींच दीवारों पर कई सारे जानवर आ-आकर देह रगड़ते, गुर्राते. भोंपे पर अचानक कोई नाम पुकारा जाता, मुकाम चामपुर का अहमक कोई भागकर मंच चढ़ता, एक टुटही तांबे की कलम और पान-पत्र पाकर सम्मानित बताया जाता, बारह लोगों की किसी गुप्तसभा में मुरदा प्रकाशन की आरती उतारी जाती, नये अलंकारिक उपकरणों के फटे कैलेंडर पर गोबर व कोयले के टोटके उकेरे जाते, मैं अपने से पूछता हकलाकर जॉयस जानते हो, काफ़्का को, बेकेट लिखते हैं कैसे कुबेरनाथ राय लिखकर दीखाओ?

(यह ख़ास चंदू के लिए)

Sunday, May 20, 2012

दूर से अपना घर देखना चाहिए..

पिता के हाथ में फिर कोई कविता है (मुझसे पूछते हैं सुनोगे? बाद में कहकर मैं भागा जाता हूं), मां की कनपटी पर कोई नस है बजता रहता है, और दिल में उदासी का वही पुराना गाना, पेद्रिनो, बुच्‍चन, तुम कहां हो, ठीक तो हो न बच्‍चे? मां को क्‍या मालूम कि पेद्रिनो मज़े में है, पलंग के नीचे के अंधेरे में पुराने, चिथड़े तौलिये की गेंद पर सर दिये लेटे, एक घुटना उठाये, उसपे दूसरे पैर को दुरुस्‍त सजाये, मुझसे दूर देश के सताये बच्‍चे की यादों को सुनकर चंचल-चकित-उत्फुल्लित हो रहा है. मैं दबी आवाज़ में पिता की कागजों से चुराया तुलसी राम के मुर्दहिया के हिस्‍से पढ़ता हूं-

"उन दिनों यानी आज से ठीक पचास साल पूर्व हमारे गांव के पूर्व तथा उत्‍तर दिशा में पलाश के बहुत घने जंगल थे जिसमें, पीपल, बरगद, सिंघोर, चिलबिल, सीरिस, शीशम, अकोल्‍ह आदि अनेक किस्‍म के अन्‍य वृक्ष भी थे. गांव के पश्चिम तरफ एक किलोमीटर लम्‍बा चौड़ा ताल था, जिसमें बारहों महीने पानी रहता था. इस ताल में बेर्रा, सेरुकी, पुरइन, तिन्‍ना तथा जलकुम्‍भी आदि जैसी अनेक जलजीवी वनस्‍पतियां पानी को ढंके रहती थीं. रोहु, मंगुर, गोंइजा, बाम, पढ़ि‍ना, टेंगरी, गिरई, चनगा, टेंगना, भुट्टी, चल्‍हवा, सिधरी, कवई आदि जैसी अनेक मछलियों की भी भरमार थी.."

कितनी कितनी कितनी सारी, ना? पेद्रिनो चौंककर मेरा हाथ पकड़ लेता है, मुझसे पूछता है मैंने कितनी मछलियां देखी हैं, कितनों के नाम मुझे जबानी याद हैं? पेड़ों के, चिड़ि‍यों के?

मैं कहता हूं कविताओं के?

मैं बुरा मानकर पीठ फेर लेता हूं, पेद्रिनो से कहता हूं तुम्‍हारे ऐसे सवाल का क्‍या जवाब है, घर और स्‍कूल और गांव के चौक के हल्‍ले के बीच भागते रहने में चिड़ि‍यों को पहचानने की कब फुरसत बनती है, बोलो. यहां बनती है न उस अफ्रीका के देश में जहां का कापुचिन्‍स्‍की किस्‍सा सुनाते हैं. पेद्रिनो मेरी पीठ मोड़कर आंखों से मुझसे माफ़ी मांगता है, होंठों से फुसफुसाकर कहता है क्‍या किस्‍सा?

मैं आंखें मूंदकर मन ही मन पढ़ना शुरु करता हूं.. कौन देश है सोमाली, कैसा है, क्‍यों लोग हमेशा इतनी हड़बड़ी में रहते हैं, इतनी तंगी क्‍यों रहती है?..

“There is haste in this bustle, a race against time: one must accomplish as much as possible, that is, break camp and get on the road, before the sun rises and the heat starts. These people feel no connection to the place in which they happen to be. They will soon depart, leaving no trace. In their ballads, which they sing in the evenings, is a constantly repeated refrain: ‘My country? My country is where the rain falls.’

The Somalis are a single nation, several millions strong. They share a common language, history, culture, territory and religion: Islam. About one quarter of the population lives in the south and is engaged in farming, growing sorghum, corn, beans, and bananas. But the majority are owners of herds, nomads.. The Somalis are divided into several large clans (such as Issaq, Darrood, Dir, Hawiye), which are each in turn subdivided into smaller clans, of which there are dozens, and further still into kinship groups, of which there are hundreds, even thousands. The arrangements, alliances, and conflicts within this familial associations and constellations make up the history of Somali society.”

मुंदी आंखों को अचक्‍के में खोल पिता बुदबुदाते हैं- मुझसे न पेद्रिनो से, अपने आप को सुनाते हैं: सोमाली देश के एक अंग्रेजी लिखनेवाले हुए, नुरुद्दीन फराह, वह भी चिड़ि‍यों और पेड़ों को पहचानने की नहीं, अपने संसार में अपनी भाषा की मुश्किलों को गिनाते हैं. ‘मेरी स्कित्‍ज़ोफ्रेनिया का बचपन’ में लिखते हैं-

“We spoke Somali at home, but we read or wrote in other languages: Arabic (the sacred tongue of the Koran); Amharic, that of the colonial master, the better to know what he thinks; English, a tongue that might one day afford us entry into a wider world. We moved from one language universe to another with the disquiet of a tenant on a temporary lease. We were conscious of the complicated state of affairs, conscious of the fact that we were being brought up not as replicas of our parents but as a strange new species.. I have remarked on my people’s absence from the roll-call of world history as we were taught it.. It was with this in my mind that I began writing, in the hope of enabling the Somali child at least to characterize his otherness and to point at himself as the unnamed, the divided other, a schizophrenic child living in the age of colonial contradiction.”

पिता की आंखों में आंसू हैं. लेकिन पलंग के नीचे के अंधेरे में मैं अब अकेला हूं, पेद्रिनो का कहीं पता नहीं. जबकि मां ने आखिरकार गुनगुनाना शुरु किया है. कोई कविता है, किसकी है? मां नहीं बतातीं कि दूर देश के शहर रायपुर का कोई गुमनाम कवि है, वह चुपचाप धीमे-धीमे गुनगुनाती है:

दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समुंदर पार चले जाना चाहिए
जाते-जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से अपनी पृथ्‍वी
तब घर में बच्‍चे क्‍या करते होंगे की याद
पृथ्‍वी में बच्‍चे क्‍या करते होंगे की होगी
घर में अन्‍न-जल होगा कि नहीं की चिंता
पृथ्‍वी में अन्‍न-जल की चिंता होगी
पृथ्‍वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा
और पृथ्‍वी की तरफ लौटना
घर की तरफ लौटने जैसा.
घर का हिसाब-किताब इतना गड़बड़ है
कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता हूं
जैसे पृथ्‍वी की तरफ.

(बाकी..)

कामरेड फिदेल और मेरा परिवार किस्‍से की पहली, दूसरी कड़ी. 

Wednesday, May 16, 2012

पेड़ पर आदमी, साहित्‍य ज़मीन पर..

एनरिक गोमेज़ कारिल्‍लो (ग्‍वातेमाला, 1873-1927)
जैसे मेरी मूल प्रवृत्ति पलंग के नीचे, अंधेरे एकांत में सबसे छिपकर, पेद्रिनो से घंटों फुसफुसाकर बातें करते रहना है, और स्‍कूल जाना सामाजिक व जीवन की मजबूरी, उसी तरह पिता की मजबूरी थी बढ़ई का रंदा चलाकर हाथ, भौं और बालों में लकड़ी के बुरादे इकट्ठा करना, मूल प्रवृत्ति उनकी भी लिखने-पढ़ने की थी. उनका हमेशा का सपना था एल पासो, एल कुओरे, मातीता किसी ख्‍यातिलब्‍ध अख़बार के साहित्यिक संपादक का जिम्‍मा संभालें और रोज़ पन्‍नों पर दुनिया-जहान के विचार-मणियों की माला गूंथते रहें. किसी दिन भूले से उनके माथे को पेद्रिनो की मौत, गांव के सामाजिक बहिष्‍कार, घर और पैसों की चिंता से अवकाश रहता तो पेद्रिनो की ही सी चमक चेहरे पर लिये वह चहकते अपने सपनों में गोते खाने लगते. अनुपस्थित चुरुट की धूंक व अनुपस्थित कॉफ़ी की चुस्‍की में सराबोर, बैठकी और रसोई में खोये कदमों फुसफुसाते टहलते बार्सेलोना चला जाऊं? नहीं, लिस्‍बोआ निकल जाता हूं, कि ब्‍युनेस आयरेस? मुझे क्‍या, मेरे लिए सब जगह एक बराबर, परिजी, वियेना, लोंद्रा, जहां साहित्‍य को मेरी ज़रुरत होगी वही शहर मेरे अथक परिश्रम, मेरे कर्मों का तीर्थ बन जाएगा!

काठ के कठवत में बर्तन खंगालती, या उधारी के राजमा के कीड़े छांटती मां अचानक बिजली की फुर्ती से आकर एक सन्‍नाका तमाचा पिता के गाल पर जड़ती तब कहीं जाकर वह वर्तमान के खुरदुरे व वास्‍तविकता में लौटते. सिर झुकाये मां से माफ़ी मांग, घिसे पैंट के चीकट खाली जेब में दोनों हाथ फंसाये चुपचाप घर से बाहर चले जाते. मां कहती मेरा पेद्रिनो चला गया लेकिन यह आदमी सुधरेगा नहीं. जिस दिन मैं खत्‍म हो जाऊंगी ये घर खत्‍म हो जाएगा उस दिन आएगी अकल, ओ दीओस!

मां के अपने मन के मलिन को बाहर करने का यह तरीका था, ईश्‍वर को वह नहीं मानती थी. जैसे पिता भी नहीं मानते थे. लेकिन गांव के लपाड़ी चार लोग कहते कि परामो पक्‍का हरामी है, ये तो कम्‍युनिस्‍टों को भी नहीं मानता! पिता एतराज करते, वर्तमान शासन चलानेवालों की नीतियों से विरोध का यह मतलब नहीं कि..

ऐसे मौकों पर जाने कहां से मां लपकती, लगभग उड़ती सी आती और लहराते पंजे के जोर से पिता को ठेलती, गिराती, उनकी छाती पर सवार होकर गर्जना करती परामो या तो तुम अपना मुंह सिलकर रखोगे या मैं आज सबके सामने तुम्‍हारी जान ले लूंगी!

पिता कुछ नहीं कहते. मां को एक ओर सरकाकर चुपचाप कपड़ों का धूल झाड़ते उठते, तमाशबीनों की हंसी उड़ाती नज़रों से आंख बचाये भीड़ से बाहर होते और उसके बाद घंटों कहां किधर बैठे हैं इसकी किसी को ख़बर नहीं रहती. कभी ऐसा होता कि मेरे स्‍कूल से लौटने और गांव के सियेस्‍ता के बाद भी घंटों गुजर जाते और पिता की वापसी नहीं ही होती तो चिंता में मां रसोई के गिने बर्तन गिराने लगती, ओ दीयोस ओ माम्‍मा की गुहार लगाकर मुझे पेट से भींचकर रोने लगती. तामकिता की लड़की या हेरनान का चरवाहा आकर तब सूचित करता कि बकरियों ने देखा, पिता गांव के अकेले आम के पेड़ पर लेटे पड़े हैं. मां भागी-भागी गांव के बाहर पेड़ के नीचे पहुंचती, हल्‍ला मचाती कि नीचे आओ, दिमाग चल गया है बुढ़ाये पेड़ पर लेटे हो, भूले आंख लग गई, गिर पड़े क्‍या होगा मालूम भी है? पिता थोड़ी देर चुप रहने के बाद जवाब देते, कि इसीलिए तो तब से यहां लेटा हूं, कि आंख लग जाये, गिर जाऊं!

मां जोर-जोर से रोने लगती. आम के उस बड़े, बाबा आदम के ज़माने के बुढ़ाये पेड़ के गिर्द चार औरतें इकट्ठा हो जातीं. गदहे और बकरियों का मजमा लग जाता. सब चिरौरी करते नीचे आ जाओ परामो ये क्‍या तमाशा है. मां कहती मेरा एक बेटा चला गया, भगवान मुझसे अब और क्‍या चाहते हैं. सब चिरौरी करते-करते थक जाते तब पिता मां की ओर तर्जनी दिखाकर कहते इस औरत से कहो आईंदा मेरे कागज़-पत्‍तर चूल्‍हे में नहीं डालेगी का वादा करे तभी नीचे आऊंगा. मां कहती कान पकड़कर सबके आगे स्‍वीकारती हूं नहीं डालूंगी, अब उतर जाओ. पिता कहते तमारा गाकर विनती करे. मां रोकर गाती. पिता पेड़ पर हंसने लगते और तब कहीं जाकर नीचे उतरने की कसरत करते. हालांकि उनके नीचे ज़मीन पर चले आने तक खटका बना ही रहता कि इस उमर में पता नहीं ये जवान पेड़ पर चढ़ कैसे गया लेकिन साबूत सशरीर नीचे आज नहीं ही आ पाएगा. हेरनान तक मेरे पिता के गिर जाने के अंदेशे में जोरों से मेरा कंधा भींचे रहता और आंखें मींचे जल्‍दी-जल्‍दी बुदबुदाता ओ दीयोस ओ दीयोस, आज पेद्रिनो के पापा को बचा लो तो आईंदा से मैं अपना गृहकार्य अपनी बड़ी बहन से नहीं कराऊंगा..!

सब सांस रोके पिता के नीचे आने तक इंतज़ार करते. मां रोती रहती गाती रहती.

मां की भी मूल प्रृवत्ति गाने की ही थी, जानवरों के अस्‍पताल में सफाई का काम तो उसने पेद्रिनो के जाने के बाद घर पर फांकों को संभालने के लिए किया था. घर पर फांकों को संभालती अब भी कभी-कभी जोर से गुनगुनाने लगती, पूंजी पूरे गांव के चक्‍कर लगाना, इस घर नहीं आना, हां.. पिता बाहर से भागे आते बंद करो, तमारा, अभी इसी वक्‍त, तुम्‍हें गाने के लिए यही मिला. मां कहती क्‍या बुरा है, घर से बाहर चार लोग सुनेंगे बात फैलेगी कि इस घर में भी कोई पूंजीवाद के खिलाफ़ है, वर्ना तुमने तो पूरे गांव में नाक ऊंची कर ही रक्‍खी है.

पिता को बिराने के लिए मां और जोर से गाती, स्‍थानीय पार्टी के लोकप्रिय मंचीय गाने गाती, फिदेल दुनिया कहां जाना था, तेरे रस्‍ते चले तब कहीं अपने को पहचाना था इसी तरह के गाने और जाने क्‍या-क्‍या उटपटांग.

पिता फिर बात करना बंद कर देते. उस दिन खाना नहीं खाते. मैं भी डरकर तब पलंग के नीचे जाकर नहीं छिपता, हालांकि पेद्रिनो को बताने की ज़रुरत रहती ही कि पड़ोस में बुलितो की बकरी के जुड़वां हुआ है और छोटी वाली का चेहरा तो इतना सुंदर है कि पेद्रिनो उसे अपनी गोदी में लेने के लिए भगवान के यहां तक से वापस चला आता!

पिता देर रात तक ग्‍वातेमाला के लेखक एनरिक गोमेज़ कारिल्‍लो (1873-1927) का लिखा पढ़ते होते. अपने से बात करते कि तमारा का कसूर नहीं कि वह क्‍यों छोटा सोचती है. छोटे, पिछड़े समाजों में संदर्भ और चिंताएं तक लघुकाय बनी रहती हैं, साहित्‍य की अंतर्रात्‍मा तक उच्‍चाकांक्षी लक्ष्‍यों की नहीं सोचती, एक के बाद एक थोक में किताब पैदा करती रहती है जिसका छोटे-पिछड़े समाजों के टिनहा संदर्भों से बाहर, बड़े साहित्‍याकाश में कौड़ी भर मोल नहीं होता..

पिता नहीं, यह एनरिक गोमेज़ कारिल्‍लो का सोचना होता:

“the maximum celebrity to which a South American author can aspire.. for a writer who is the least bit universal-minded.. (zero, yes!).. the Spanish language is a prison. We can pile up volumes, even find readers, it’s exactly as though (almost like Hindi films in far-off India, yes) we had written nothing: our voice doesn’t carry beyond the bars of our cage! One can’t even say that the terrible wind of the pampas carried it away, it’s worse than that: it vanishes!”

(बाकी..)

Tuesday, May 15, 2012

कामरेड फिदेल और मेरा परिवार..

मिरोस्‍लाव क्रलेज़ा (1893-1981) 
कक्षा की घंटी लगते ही पहला काम हुआ कि गिलेर्मो, हेरनान, अमादो, चिकिता, मारिसा सबने हंसते-हंसते डेस्‍क पर अपना गृहकार्य निकालकर बाहर किया, सौहार्दपूर्ण चुहल में अटकते-दौड़ते, मास्‍टर की मेज़ तक अपना खाता पहुंचाकर आपस की आनंदी फुसफुसाहटों में मझे-बझे रहे. जबकि मेरी घिग्घी बंधी थी. मरी मुर्गी की तरह मुर्दा पड़ी अपने खाली खाते पर हाथ बांधे मैं अपनी मौत की घड़ि‍यां गिन रहा था. वैसे मेरा खाता पूरी तरह खाली नहीं था. गृहकार्य के निबंध का शीर्षक ‘मेरा देश’ की सुघड़ लिखाई (रंगीन खड़ि‍या और पेंसिल से जिसे मैंने लिखा था) के नीचे चूल्‍हे की जली लकड़ी के काले से बड़ा अंडा खिंचा हुआ था (यह गंदी पुताई मेरे पिता की 'करतूत' थी). गलती मेरी ही है. मुझे मदद मांगने पिता के पास जाना ही नहीं चाहिए था. मां भी जब मांगना होता है, गांव के दूसरे दरवाज़े खटखटाती है, पिता से कभी कहां मांगती है. पिता खुद भी अपने से कुछ नहीं मांगते. लेकिन खाली पृष्‍ठ के ऊपरी हिस्‍से में काफी मेहनत और तल्‍लीनता से शीर्षक लिखने का काम खत्‍म करने के बाद ‘मेरा देश’ जैसे विषय की अमूर्त भव्‍यता की सोचते हुए मेरे कमज़ोर माथे के हाथ-पैर फूलने लगे थे, शायद इसीलिए मैं घबराया हुआ पिता के पास गया था. वैसे भी खिड़की पर खाली बैठे हुए वह बाहर के उचाट खालीपन को घूर रहे थे, निबंध का शीर्षक देखकर एकदम से उनका पारा चढ़ गया, भागकर चूल्‍हे की ज़रा सुलगती लकड़ी जो वह अपनी सिगरेट जलाने के लिए लेकर आये थे, पैंट की फटी जेब और रसोई की मेज़ पर पिछले हफ्ते के तहाये अख़बार कहीं भी जिसके न मिलने पर पिता का बावलापन उनकी नाक तक चढ़ आया, गुस्‍से में लकड़ी वापस चूल्‍हे में फेंकने की बजाय मेरा खाता खींचकर, निबंध के शीर्षक के नीचे अंडे की गंदी तस्‍वीर खींच, खाते को उन्‍होंने हवा में उछाल दिया. मैं रोने लगा. पिता उचककर वापस खिड़की पर चढ़े बड़बड़ाने लगे, मेरा देश मेरा देश, घंटा कहीं नहीं है मेरा देश, मुट्ठी भर कामरेड हैं और दलाल पूंजी का एक गिरोह है, उनके बीच का समझौता, उनका देश है ये, हमारा तुम्‍हारा इसमें कहीं कुछ नहीं है, ते एंतियेंदो, चिको?

मगर मैं नहीं समझा, रोता रहा. घर पर मां होती तो शायद समझती. घर पर मां होती तो शायद यह हादसा भी न घटता. मगर कामरेडों की धमकी के बाद गांव के लोगों ने जब से पिता से काम कराना बंद कर दिया है मां घर पर रहती कहां है. और जब रहती है तो आपे में नहीं रहती. पिता का कागज़-पत्‍तर उठाकर भागती चूल्‍हे में जलाने जाती है, कि सुधर जाओ, या एक दिन मैं ही इस चूल्‍हे में कूदके जल मरुंगी तब चलाना जीवन अपनी मर्जी से, घर में दो छोटे-छोटे बच्‍चे हैं, आगे की उनकी पूरी जिंदगी है, मगर तुम कहां क्‍यों चेतोगे? मैं चुपके से बुदबुदाकर मां को याद दिलाता कि दो कहां, अब एक ही है मां, पेद्रिनो तो बीमारी और इस घर की भुखमरी में कब का काल-कवलित हुआ, मगर मां पर टूटकर गिरते, उसके हाथों से अपना कागज़ छीनने को झगड़ते पिता के गुस्‍से में मेरी सुनवाई कहां किसके बीच होती! माल एदुकादो, म्यिेर्दा, मे कागो इन दीयोस के हल्‍ले में कभी पिता का हाथ जल जाता, कभी कुछ कागज़ बच भी जाते. उन्‍हीं बचे कागज़ों में से एक पुरची थी लिथुआनियन लेखक सॉलियस कोंद्रोतास के अपना या मालूम नहीं किसका देश की आत्‍मस्‍वीकृति का, जिसे मूल लिथुआनियन में पढ़कर पिता सुना रहे थे, मैं पुर्चगाली तर्जुमे में उसे नहीं समझने की ज़ि‍द कर रहा था, “I do not believe that one can escape one’s origins. I am obviously not a patriot; I do not care about the fate of Lithuanians.. and yet I cannot stand completely outside. I cannot escape the fact of being Lithuanian. I speak Lithuanian; I also believe that I think Lithuanian.”

इतना पढ़कर पिता फिर उदास हो गए. बाहर के निचाट खालीपने में आंखें गड़ाये बकते रहे. उठते-बैठते, चार लोगों के बीच हंसते, किसी की मरनी में चोट खाये दारु पीकर पहुंचे तुम देश की नहीं सोचते, जीवन के चार पल चैन से कैसे निकल जायें की चिंता में रहते हो, मगर यह देश जो तुम्‍हारे खून में घुसा धम्‍म् धम्‍म् बजता रहता है उसको तुम किस निबंध में लिखोगे, कैसे लिखोगे, वो सिड़ी मास्‍टर तुम्‍हारा क्‍या समझेगा? मिरोसलाव क्रलेज़ा तक इस गहरी गुत्‍थी, राष्‍ट्रीयता का क्‍या समूह है, इसके बीच कैसे गुम हैं हम की कोई वाजिब पहचान कर पाये थे? नहीं, आह भरते थे और दीवानी पंक्तियां लिखते थे!

“(It’s just) a nostalgia born of pure subjectivity, the recollection of youth that is long past! Memories of military service, of flags, war, the sound of the bugle, uniforms, the days of yesteryear, memories of carnival and of bloody fighting, a whole theatre of memory that seems much more interesting than the reality. Nationality consists in large measure of the dreams of individuals who imagine a better life here below; for an intellectual, it is a childhood completely filled with books, poems, and works of art, books read and paintings contemplated, wild imaginings, conventional lies, prejudices, very often an incredibly acute perception of stupidity, and an unspeakable quantity of blank pages. Nationality, in bad, patriotic, sentimental, maudlin poetry, consists of women, mothers, childhood, cows, pastures, prairies, a material condition into which we are born, a miserable, backward patriarchal state in which illiteracy is mixed with moonlight.. Children learn from their fathers what their father learned according to the law of tradition, namely that their own nation is ‘great’, that it is ‘glorious’, or that it is ‘unhappy and weighed down’, imprisoned, duped, exploited, and so on.”

(बाकी..)

Sunday, May 13, 2012

हिंदी का जलवाघर: एक निहायत सस्‍ता संस्‍करण

हिंदी की चिरकुटइयों का अंत नहीं. कोई लेखक किसी विरोधी मंच पर विचार व्‍यक्‍त करता दीख जाए तो तत्‍काल बीस प्रगतिशील कर्णधार हैं, लेखक से जवाबदेही शुरु कर देते हैं, कि महाशय, आप ऐसे कैसे वहां पहुंच, नहीं, नहीं, जवाब दीजिए? बा‍तचीत करें, खूब करें, लेकिन इसी हमारे आपस के बीस लोगों के गुट में करें. कोई दूसरा लेखक, किसी मंच पर जाकर पुरस्‍कार प्राप्‍त कर ले- अच्‍छी बात है, बुरी बात है, पैसों का टेंप्‍टेशन है, जो है वह लेखक का निजी, नैतिक चुनाव है- तो तत्‍काल कुछ दूसरे कर्णधार हैं इस तरह से पुरस्‍कार-प्राप्ति के खिलाफ़ हस्‍ताक्षर अभियान चलाने लगते हैं. अपने को सही और सामनेवाले को ग़लत कहने की तीव्र, उत्‍कट, ज़रूरी इच्‍छा, जताये बिना, उसके विरुद्ध चट बाईस लोगों की गोलबंदी किये बिना, हिंदी के इन प्रगतिशील साहित्यिकों का खाना हजम नहीं होता. उनकी आंख में उंगली डालकर कोई इन्‍हें दिखाये कि यह इनका अपनी तरह का जातिवाद है, मगर अपनी थेथरई, अहं के आत्‍मलीनलोक में इनको अपनी संकीर्णता, अपना जातिवादी होना नहीं दिखता. नहीं दिखेगा. क्‍योंकि सच्‍चाई देखना चाहने लगने से ही इनके साहित्‍य के ताशघर की हवा निकलना चालू हो जाएगी. 

पहली बात तो यही दिखेगी कि तीन सौ से ज़्यादा प्रकाशकों के शहर दिल्‍ली में, छोटे शहरों की तो छोड़ ही दें, क्‍या वज़ह है कि हिंदी किताबों की तीन अच्‍छी दुकानें नहीं हैं. इसलिए नहीं है कि हिंदी किताबें पाठकों को ध्‍यान में रखकर छपती ही नहीं. थोक की सरकारी व पुस्‍तकालयी खरीद में सिफ़ारशी व दलाली खिलाने के रास्‍ते कहां, कैसे खपाई जायें की समझ में छपती हैं. और बौद्धिक, प्रवीण, तीक्ष्‍ण अनुशीलन की नज़र रखनेवाला इतना नहीं देखता, समझता तो पता नहीं घंटा फिर क्‍या साहित्‍य और समाज समझता है. पचीस-पचीस सालों से चल रही पत्रिकाएं, इतने अर्से के बावज़ूद दस और बारह हज़ार के सर्कुलेशन से ऊपर कभी क्‍यों नहीं जातीं, और एक बनी-बनायी वही लीक उन पन्‍नों पर क्‍यों पिटती चलती है, साहित्‍य का ‘बेस’ नहीं फैलता, पाठकों के बूते कोई उसकी स्‍वायत्‍त दुनिया नहीं बनती; लोकप्रिय सिर्फ़ सिनेमा रहता है, प्रगतिशील साहित्‍य की कहीं कोई जगह नहीं निकलती. मंच पर उर्दू के किसी औसत शायर को खड़ा कर दिया जाए तो आज भी हिंदी के किसी बड़े कवि की बनिस्‍बत उसकी बात ज़्यादा सहजता से दर्शकों तक पहुंचती है, ऐसा कैसे और क्‍यों होता है इसे जानने, और समझकर सुधारने की चिंता अपने प्रगतिशील साहित्यिक को नहीं है. क्‍योंकि सच पूछें तो- प्रकाशक की ही तरह- उसकी चिंता के राडार में भी पाठक नहीं है. अंतत: आठ और नौ, बारह, बीस पुरस्‍कार हैं, कुछ ख़ास दायरों व मंचों पर ‘पहचान’ लिया जाना और आदर पा लेना है, इन दायरों से बाहर तो सच्‍चाई है, सब जानते हैं, कि उनके घर तक के बच्‍चों को हैरी पॉटर और चेतन भगत से भले हो, हिंदी साहित्‍य से मतलब नहीं है!

किसी भी पिछड़े समाज में, और उस भाषा में, साहित्यिक समृद्धि का पैमाना होता है कि उसमें वैश्विक ज्ञान-संपदा के अनुवादों की कैसी उपस्थिति है, कहां-कहां का और क्‍या–क्‍या लगातार उसमें जुड़ता चल रहा है. समाज विज्ञानी ज्ञान की कैसी उपलब्‍धता है. हिंदी का प्रकाशक बाहरी मुल्‍क और विदेशी ज़बान की कोई चीज़ छापता भी है तो यह देखकर और तय करके छापता है कि इसके पीछे संबंधित दुतावास से इतने और कितने पैसे निकल जाएंगे, इसलिए नहीं कि समाज और पाठकों के बीच इसकी ज़रुरत बनेगी. सामाजिक व पाठकीय ज़रुरत में नहीं, मुनाफ़े की अपनी सहूलियत में उसके यहां किसी भी सीरीज़ की लिस्‍ट तैयार होती है. और यह एक नहीं, छोटे-बड़े सब प्रकाशनों की कहानी है. इस हमाम में सब एक से हैं, सब नंगे हैं. किताब के चौथे पृष्‍ठ पर किताब के मुद्रण की सिलसिलेवार, व्‍यवस्थित सूचना (ज्ञानपीठ, व चंद सरकारी प्रकाशनों से अलग) हिंदी का कोई प्रकाशक नहीं छापता, जो न केवल लेखक को उसकी रचना की छपाई व वितरण की व्‍यवस्थित जानकारी के संबंध में अंधेरे में रखना हुआ, पुस्‍तकों की समाज में क्‍या कैसी खपत है की सहज पाठकीय पुस्‍तक-संबंधी जिज्ञासा की भी सीधी धांधली है. पचास-पचास लोगों के छै नेटवर्क हैं, छै आलोचक हैं और उसके गिर्द बने छै प्रकाशकीय नेटवर्क हैं जिसकी पीठ पर हिंदी समाज व हिंदी साहित्‍य का दारोमदार है और इन्‍हीं के मार्फ़त किताबें छपती और खपती हैं. किताब की दुकानों से तो नहीं ही बिकतीं. दुकानों से बिकती होतीं तो समाज में हिंदी किताबों की दुकानें दिखती भी होतीं. 

समाज को दीक्षित करने का माथे पर सेहरा बांधे व हस्‍ताक्षर अभियानों के निपुण सिपाही किसी दिन मन बांधकर बड़े, चंद स्‍वनामधन्‍य प्रकाशकों का फिर घेराव करते दिखते कि महाशय, सरकारी व पुस्‍तकालय वाली खरीद रहने दीजिए, पाठकों के बीच सीधी किताबों की कितनी बिक्री है, तीन या चार कितना जितना भी परसेंट है उसका हिसाब दीजिए, नहीं, नहीं, उसके बिना आज हम आपके दरवाज़े से हिलनेवाले नहीं हैं, चलिए, चलिए?

चक्‍कर है साहित्‍य की, भाषा और पाठक और समाज की यह सहज चिंता किसी धड़े, गोलबंदी की नहीं है. और किन्‍हीं क्षीण, मद्धिम सूरतों में वह व्‍यक्‍त होती भी हैं तो आपस में कभी घबराये से ज़ाहिर किये विचार की तरह ही होती है, साहित्यिक सामाजिक मंचों पर उसका वास्‍तविक क्रियान्‍वयन कैसे किया जाए की रणनीति सुझाने व तैयार करने में नहीं होती. गोलबंदियों का स्‍टेटस-क्‍वो बना रहे, मंचीय सक्रियता का एक मजमा चलता दिखे और उसके केंद्र में हम दीखते रहें, उससे बाहर की कोई चिंता है, न विचार का विस्‍तार. इसीलिए मुझे यह निहायत हास्‍यास्‍पद लगता है कि ज्ञानपीठ, या अन्‍य किसी भी प्रकाशक को निशाना बनाकर कोई शहादत का पोज़ अख्तियार करे. अरे, दुनिया आपको तभी नज़र आती है जब आपके खुद के पिछाड़े लात लगे? कल तक फलाने और ढिकाने आपके कंधे पर बांह धरे थे तब तक आपको उस दुनिया से शिकायत न थी, सब रंगीन था, आज हाय-हाय होने लगी है, अरे? ज्ञानपीठ में इस तरह का, और किस तरह का आदमी बैठा हुआ है, और सही है कि किसी भाषा और साहित्‍य के लिए यह सम्‍मानजनक स्थिति नहीं है, मगर आप कृपया मुझे बतायें किस प्रकाशन में आपको सुशिक्षित, वैश्विक साहित्यिक संस्‍कारों में दीक्षित, प्रवीण प्रकाशक दीख गया? सब कहीं वही अर्द्धशिक्षित, मुनाफ़े की चिंता में गल रहे बनिया बैठे हैं, जेनुइन साहित्‍य-रसिक कोई कहीं नहीं बैठा. ज्ञानपीठ कम से कम (मेरी जानकारी में) पैसे लेकर तो किताबें नहीं छापता, बहुत सारे प्रकाशक हैं मंच पर सार्वजनिक रुप से चाहे जो कहें, धंधा वह पैसे लेकर किताब छापने का ही कर रहे हैं. प्रगतिशीलता की आरती घुमा रहे किसी सिपाही ने ऐसे प्रकाशकों की जाकर कभी गरदन थामी, उनका सामाजिक बॉयकाट किया?

सच्‍चाई है ऐसे बॉयकाट के लिए भी पाठकीय-सामाजिक स्‍पेस होना चाहिए, वह तो है नहीं, विचार विचार, विचारों की ढेरों अगरबत्तियां हैं, पाठक तो कहीं है नहीं, इस पूरे संसार में पाठक की कहीं कोई उपस्थिति नहीं है, तो ऐसे में किसी प्रकाशक की तरफ़ उंगली उठाकर उससे संबंध बिगाड़ने का क्‍या फ़ायदा. किताबें ठिल-ठिलाकर किसी तरह छप जायें, छपती रहें, भले कुछ ही महीनों बाद असाहित्यिक घरों के धूल और गर्द में गुमनाम हुईं जायें, बस चार जगह कविजी-कहानीकारजी जान लिये जायें, ढाई पुरस्‍कारों का तमगा और पुरची घर की दीवार पर मढ़वाकर चिपका लें, उतने में साहित्‍य को समाज और सार्थकता प्राप्‍त हुई जाएगी.

छै छै लोगों के गुट से बाहर चिंता और विमर्श का कोई बड़ा परिदृश्‍य नहीं है, नई ज़मीन तोड़ने की रणनीति नहीं है तो गलाजत उजागर करने का कोई सा भी हल्‍ला अपने निजी हर्ट के रणनीतिक, सधे प्रमादगान और सेल्‍फ़ प्रोमोशन की टिनहा चतुराई और मार्केटिंग से ज़्यादा कुछ नहीं है. क्षमा करें वह भी मुझे कुछ वैसा उतना ही चिरकुट दीखता है जिस चिरकुटई के ‘खिलाफ’ खड़ा ‘युद्ध-गर्जना’ की हुंकार भरता अपने को वह बताता दीखता है. ज्ञानपीठ के खेलों (मगर किस प्रकाशक के नहीं हैं?) से दुखी और खेमा-पलट के अवसरवादी नाटक पर लुत्‍फ़ ले रहे चंद लोगों की उसे तालियां भले मिल जायें, हारी हिंदी के भविष्‍य का कोई बड़ा इशारा उसमें भूले से भी न मिलेगा. 

Wednesday, May 9, 2012

पानी, शायद..

शुक्‍ला कहती है एइ जागा छेड़े आमरा आर कोथाये चोले जेते पारी, शोब दिनेई कनो नतून झामेला, क्‍या ज़रुरत है यहां बने रहने की, मुझे नहीं पसन्‍द, तुम समझते क्‍यों नहीं?

मैं नहीं समझता. यही तो एक शहर है जिसे हम ज़रा पहचानते हैं (वह भले हमें पहचानने से इंकार करता रहा हो, बट स्टिल..), घर से निकलकर तीन ठिकाने हैं जहां जा सकते हैं, जो इतने वर्षों से हमें संभाले हुए है, यहां से निकलकर फिर कहां जाएंगे, और जाना हुआ ही तो क्‍या गारंटी है कि वहां झमेले न हों? हो सकता है यहां की बनिस्‍बत और ज़्यादा हों, तब!

लेकिन यह भी सच है कि यहां शहर हमारी नाक से ऊपर चढ़ चुका है. इस पर प्रतिक्रिया के लिहाज़ से शुक्‍ला और मुझमें फर्क़ इतना ही है कि मैं सर के पीछे बांहों में गमछा ताने शहर की ओर पीठ करके उसे अनदेखा करने लगता हूं, शुक्‍ला खिड़की में धंसी अपनी साड़ी के आंचल पर तक़लीफ़ों का डेफिसिट दर्ज़ करती रहती है.


किंतु कोथाय जाबे, बलो त? मैं सिर्फ़ कहने के लिए कहता हूं. शुक्‍ला भी जानती है इसीलिए झटके में सन्‍न नज़रों से एक बार मुझे देखकर उतनी ही तेज़ी से मुंह फेर भी लेती है. मानो इस एक बेमतलब, टुटपुंजिये वाक्‍य को हवा की रस्‍सी पर टांगते हुए, जीवन किसी सूरत जीये चले जाने के दर्शन का मैं पैशनेट पक्षधर हो रहा हूं!

जबकि सच्‍चाई ऐसी है नहीं. जबकि सच्‍चाई मगर फिर पता नहीं कैसी है.

बिजली जाती रहती है. पानी आता नहीं रहता. कभी एकदम ही नहीं आता.

सुबह शुक्‍ला से कहता हूं उठो शुक्‍ला. शुक्‍ला कहती है आया? मैं कहता हूं नहीं आया, लेकिन आ जाएगा, उठो भी. शुक्‍ला मुझे परे धकेलकर वापस चादर खींचकर उसमें चेहरा छिपा लेती है. मैं चादर खींचकर एकदम उसकी पीठ पर गिरा उसकी गरदन चूम लेता हूं, मगर फिर वैसी ही फुर्ती से उल्‍टे हाथ होंठों से गर्द का स्‍वाद पोंछने भी लगता हूं. तर्जनी से मुझे पीछे ठेलकर शुक्‍ला मुस्‍कराने लगती है.

हद है यार, क्‍या जीवन है, यही है? इसी में समाये हम बड़े होंगे, बूढ़े होंगे? यही बिना पानी का देश आया हमारे हिस्‍से, मग गिन-गिनकर पैर और पीठ पर गिराते रहने का जीवन हमारा जीवन हुआ?

हां, यही हुआ, गरदन और पीठ पर गर्द सजाने का मेरा और उसे चूमकर धन्‍य होते रहने का तुम्‍हारा, शुक्‍ला कहती और हंसने लगती.

इसीलिए लोग अपना घर, देश छोड़कर पराये अजनबी संसारों में भाग जाते होंगे कि बेमुरव्‍वत हौंकता अकेलापन होगा, जलालत होगी लेकिन कम से कम मई के महीने में पैर पर गिराने को पानी तो होगा, झुलसते देह पर चलाने को बिजली का पंखा?

शुक्‍ला का चेहरा संजीदा हो जाता, कहती चलो हम भी भाग जायें, मेरी बाली बेच दो, मेरा हार, मेरा सब.. मैं शुक्‍ला को बांहों में लिये अपना चेहरा उसके गरदन में छिपाकर कहता मैं पहले ही भागा हुआ हूं, शुक्‍ला, और आंखें मूंदकर फिर उसके लिए अंग्रेजी में जर्मनी के आप्रवासी मज़दूरों के जीवन की एक डॉक्‍यूमेंट्री की शुरुआती पंक्तियां बुदबुदाने लगता..

“I leave my home In what people call a moderate climate. The sulking wolf from the North watches me go. My sons are growing up. I am a man, It seems.. journeying In my mind when I'm standing still. Marking time when I'm moving. I go from face to face. In the slush of overproduction, disdain.. madness and profit-making. I know that even those who want to die.. would rather live. I believe..” 


Tuesday, May 8, 2012

ऐ रंजन, अबे से रंजन..

फिर एक पुरनका पाडकास्टिन है.. बिकास-बिनोद चुगलबंदी.. प्रसंग, माचिस खोजाई के बहाने जीवन की निस्‍सारता का है..

Friday, May 4, 2012

पुरानी शराब..

(मीठल बही छापे की कुछ पुरानी रचनाएं.. गरमी का असर होगा जो सीधे पांच पैग उंड़ेल रहा हूं, अंग्रेज़ी में मेरी आंखें मिची हुई हैं, उसमें बहकने का उद्यम सुश्री दरभंगाकुमारी के दु:स्‍साहसी पराक्रम से ही संभव हुआ है..)

(यह भी पुराना ही है..)












देशकाल से परे..


दौलतपुर, नीमतरा, हरहरा क्‍या जगहें थीं जहां रुक जाता बेमतलब. साइकिल अड़ाकर तकता उजबकों की तरह टहलता कौन लोग हैं कैसे बात करते हैं. झबरे मूंछ व पोपले मुंह वाला एक बूढ़ा हंसता बुदबुदाता कातिक-अगहन. कोई औरत दौरी उतारकर रखती ज़मीन पर, साड़ी के किनारे से पोंछती श्‍याम चेहरा, देखती ललियांही राह, थकित-चकित बूझती मन ही मन अभी और कितना आगे जाना होगा पत्‍ते में जामुन और नून सजाकर खोजने गाहक चार कौड़ी कर कमाई बास्‍ते. नंग-धड़ंग एक बच्‍चा घिसटता-दौड़ता चला जाता, कोई मुर्गी फुदकती झाड़ि‍यों से बाहर चेहरा करती जैसे बीच काम देखने आयी हो बाहर के हाल.
अभाव व दुरव्‍यवस्‍था की बड़ी-काली मक्खियां ताड़ व बांस के पत्‍तों पर गोल बांधे भिनभिनातीं, घूमतीं करियाई पुरानी मटकी पर. लगता सदियों पहले का कोई दृश्‍य हो लगता देश-काल से परे में जाने कहां घुसी चली आयी साइकिल.

Outside the frame
What were those places where I could just stop purposelessly, Daulatpur, Neemtara, Harhara? Holding the cycle by my side, looking at people with curiosity, who are they? What do they talk? A bushy moustachioed and hollow faced old man whispers smiling toothlessly, autmn? eh, spring? A woman puts away the basket from her head, wipes her tanned weary face, glances at the dust laden rust colored path, wonders with bone weary fatigue, how far still to go to sell the berries sprinkled with salt , in woven leaf parcels to customers. A naked small child runs after her listlessly, a hen peeks inquisitively from the shrubbery, as if to see in between work, the routine of the day.
Lack of system and absence of plenty hover like fat black house flies in dizzying circles over palm and bamboo leaves, take a swing over old rusted pots. A scene from ill begotten olden times, standing on the margins, and a cycle, propped up against a wall, enters the picture , outside the frame.
***

 

दोपहर में फंतासी


खुद से आंख बचाकर चुपके रोज़ निकल जाता हूं पहाड़ि‍यों के पार किसी छोटे गांव. या रियु द सविन्‍यॉं से निकलती है जो पगडंडी पकड़े हुए उसे आगे दूर किसी ग़ुमनाम ठांव. धीमी दुलकी चाल चलते गदहे पर धंधे का माल ढोये जाता किसान. वेर्गा की कहानियों से बाहर चली आयी काली-सफ़ेद सीपिया किसी छूटी तस्‍वीर-सी धुंधली. प्‍यात्‍ज़ा सांता मारिया के सूने चौक के आख़ि‍र में उतरते कुम्‍हलाये मैदान और दूर-दूर तक जैतून के खेत. आंखों पर हाथ धर तकता आगे समुंदर के पार वहीं कहीं होगा त्रिपोली-दामासकस-माराकेस. हहराती पानियों में डोलती पुरानी नाव, जाने तीन कि तेरह दिन के सफ़र के बाद. किसी ऊबे अधेड़ अरब को समझाता होगा मलाबारी मलयाली छोकरा अपने गांव की कोई बेमतलब-बेतरतीब कहानी. मैं डेक पर पैर पसारे सुलगाता होऊंगा हुक्‍का गुड़गुड़ गुड़गुड़. या पत्‍थरों पर दौड़ता, रेत पर भागता बच्‍चे की शक्‍ल में देखता होऊंगा खुद को मुंह से बबूले बनाते, सुनकर ताजुब्‍ब करते, बांसुरी बजाते.

Mid Aftrnoon Fantasy
Running away from myself I escape every day to the small hamlets beyond the hills. Or to the forgotten little unknown destinations, taking that small path that forks away from rue de savignon. Emerging, like a blurred, black and white sepia half remembered half lost impression from a Verga story, a peasant ambles by, carrying his load on a slowly cantering mule. The withered fields at the edge of the deserted square of Piazza Santa Maria and beyond the fields of olive trees spread far and wide. Shielding my eyes with my palms, squinting at the sea I wonder at the distant shores that lie somewhere beyond the oceans.. Tripoli Damascus Marakesh at the end of long endless uncharted journeys. A Malabari Malayali lad regaling an old bored Arab with some chaotic tales from his distant home left long long ago and I lounging on the deck, lighting a pipe, the smoke swirling out in lazy circles, looking at myself, a small child skipping on the stones and scampering on the beach, blowing bubbles, being awed at listening to myself playing the flute.
***

भोर में अकेले..


मुंह पर साड़ी ढांपे उन्‍नीस वर्ष की मां माधवी है सोयी. सात गांव की पुरोहिताई की थकान में थके सोये बाबू सीताकांत, नया-नया पिता बने पिताबोध की जिम्‍मेदारी की बोझ दबे. रेंगनी पर खोंसे कपड़े, दीवार पर शंकरजी का कलेंडर और आईने पर साटी टिकुली सोयी. फूलदार टिन के बक्‍से पर धरा सिंगारदान सोया चुपचाप और सिंदूरदान सोया. तीन पैर वाली कुरसी का पंचांग, और कांटी पे टांगा अंगौछा और बरामदे का सोये कैसी नींद में खोये. आंगन का अमरूद और पीपल के डुलडुल डोलते पत्‍ते ऊपर ओढ़े चांदनी की खड़ाऊं व हवाई चप्‍पल सब सोये. चूल्‍हे से टिका के धरा चिमटा और धुले-चकमक बरतन चुनरी, किस कदर शांत एकदम निष्‍प्राण.
छै महीने का ढुनमुन चिंहुक कर आंख खोलता है. और फिर जगा, दूध की साफ़-सफ़ेद आंखों तकता-निरखता रहता भोर का नीलापन, निश्चिंत-आत्‍मनिर्भर अपने अकेलेपन में.

Solitary in the Morning
Covering her face with her sari, nineteen year old Madhavi sleeps. Babu Sitakant drops in a death tiring sleep after wandering through seven villages doing odd priestly jobs, stressed out by the new found responsibility of becoming a father. And sleeps alongside him, the clothes hung on the wire rack, Shankarji on the calendar and the bindi stuck to the mirror. The vanity case kept on the flower bedecked aluminum tin and the tiny box holding the sindur, all lie silently in somnolence
Lost in slumber, the three legged chair and the old torn towel on the hook, the slippers and the flip-flops in the veranda all sleep .The tongs by the stove and the shiny washed utensils,  the guava tree in the courtyard , and the trembling peepal leaf, wearing the moonshine scarf,  all sleep as well, so silent so lifeless. Lost in a trance of deep oblivion
Six months old Dhunmun, startled, opens his eyes, watches with his milk clear gaze, beholds the morning blue, calm and content in his self absorbed solitude.
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शहर में शहर से बाहर..


पटना रहा हूं मोना टॉकीज़ से निकलकर गांधी मैदान में मूंगफली खायी, डाकबंगला सड़क पर बेमक़सद टहलते रहे, कभी ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी नहीं गया. कहते हैं इस्‍लाम पर हस्‍तलिखित पांडुलिपियों की यह दुनिया का सबसे अमीर किताबख़ाना है! इमारत से लगी सड़क की तंगहाली के दृश्‍य देखे, किताबों की अमीरी देखने से रह गयी. जैसे इलाहाबाद में श्‍याम बीड़ी के होर्डिंग देखे, ब्रिज के बाद विश्‍वम्‍भर सिनेमा व दारागंज की तंग गलियां व टूटे छतों से रिसता काई का जल देखा, संगम की नाव से, ओह, डोलता इलाहाबाद न देख सके.
दो दोस्‍त और चार किताबों से बाहर दुनिया फैलती है लेकिन मन व संस्‍कारों की गरीबी से पार पाना बड़ा उलझा, पेचीदा काम है. इच्‍छाओं के गुलगुले फूलते भी हैं तो उसका नक़्शा जाने क्‍यों दो कौड़ी की छपाई वाला होता है.
पान-तंबाकू की गुमटी में जैसे सजी हो फॉर स्‍क्‍वॉयर की खाली डिब्बियां एक पर एक और दुकानदार भूल गया हो वैसे ही भूले रहते हैं अपने होने में हम. जीते हैं शहर में, अपनी समूची संभावनाओं में मगर शहर हममें नहीं जीता. चंद सड़कें, कोई पुलिया, अस्‍पताल, डिपो, रिक्‍शे से दिखा कलक्‍टर का बंगला, एक पार्क यादों में उकेरता है शहर इतिहास से बाहर.
लोग कहते हैं तो याद पड़ता है अरे, हम भी तो रहे शहर में..

In the city and out of it
I have lived in Patna, strolled outside Mona talkies, walked to Gandhi Maidan nibbling peanuts, wandered aimlessly on dakbangla road but never found time to visit Khudabaksh library. It is said that in terms of handwritten manuscript on Islam it is the world’s richest library. It is funny that I witnessed the poorness of the narrow bylanes near the library but never tasted the richness of the books inside. It is similar to my seeing the hoardings of Shyam beedi in Allahabad, of seeing the Vishwambhar cinema next to the bridge, of seeing the narrow lanes of daraganj and the seeping water from moss laden broken roofs but alas never being able to see Allahabad from the gently swaying boats on the sangam.
A few friends and a dozen books widen the horizon but to go beyond the destitution of mind and values is an intense complex complication. So many dreams are born but mapping it in detail reduces it to some cheap farcical joke. We are lost to ourselves like the empty packets of four square forgotten by the kiosk owner in his stocked dusty roadside shop, we are lost in our being. We exist in our completeness of being in the city but the city does not exist in us. A few roads, some small culvert, any dispensary, a passing view of the shuttered bungalow of some government official, a park .. all these etched in memory hover outside the time frame suspended still
Its only when people talk about the city that one remembers, arre ? we also lived in this city once ?
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दिन बीतते हैं..


शब्‍दों की पगडंडी हौले-हौले रस्‍ता उकेरती है दीखते-दीखते छिप जाती है. सोया रहता है फ़ोन जगता है फिर सोता है लम्‍बी ताने. दिन बीतते हैं.
पुलिंदे, चिट, चिट्ठि‍यां, कागज़ रहते-रहते फड़फड़ाते हैं, नयी ऊर्जा की चमक फैल जाती है कमरे में मगर फिर कितना तो धूल खाते हैं. दिन बीतते हैं.

हर समय बजता रहता है एक ख़ामोश सांगीतक. उठती हैं सांसें उतरती हैं, पुकारती रहती है कोई पुकार. दबे रंगों में सपनों का दीया टिमटिमाता है, बुझी-बुझी-सी लौ लपकती है एकदम उठी चली जाती है. दिन बीतते हैं.

त्‍वचा का स्‍पर्श बदलता है, हड्डि‍यां कहती हैं देखो, हमारा क्षरण हो रहा है. हंसी-हंसी में देह कांपती है. पैर निरखती आंखें कहतीं अभी तो कहीं निकले भी नहीं, अभी तो भूगोल समूचा अनछुआ पड़ा, अभी तो बीती है बस एक रात एक लाख एक हज़ार रातों में.

किसी उजबक़ बैल की-सी हारी पनीली आंखें हड़बड़ाकर हटती हैं सड़क से, देखती पलटकर धीमे यह कैसा समय बन्‍दूक की गोली की तरह धायं-धायं दगता चला जाता है. दिन बीतते हैं.
कोई नक़ाबपोश दबे पैरों आता है चुपचाप, गठरी खोल दिखाता है खेल, मंत्र बुदबुदाता है जाने किन भाषाओं में और वैसे ही गायब हो जाता है. चुपचाप.

कहीं जलती है आग कहीं बहती है शराब. दिन बीतते हैं.

बीतती है रात, एक दिन खुलता है..


The days goes by..
The dusty lanes of words now visible now hidden, carves a pathway, the phone slumbers then awakens, falling asleep again in a deep sleep, the days goes by..
Heaps of paper, chits, letters and notes rustle amidst a lethargy, a new energy is born, shining and shimmering in the room, but still gathering so much dust, the days goes by..
Music plays all the time, a silent orchestra, a breath rises then falls slowly, someone harkens, a yearning call. A dream flickers in faded colors, the half burnt flame leaps and reaches out suddenly, the days goes by..
The feel of the skin changes, the bones call out, see we are decaying. The body trembles in mirth. The eyes look at feet not travelled an inch, the entire terra remains unexplored, only one night has been lived in a million nights
Like a dumb defeated bull ‘s the watery lost eyes shift their glance from the road, turn and look back, how the day gets spent furiously like a fast moving bullet, the days goes by..
A masked man stealthily approaches, opens the bundle to show some trick, chants a mantra in god knows what archaic tongue and disappears as silently
Somewhere a fire burns, somewhere the wine flows, the days goes by..
The night is spent and a day unfolds.
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मुहाने में, भोजपुरी..

घरों की अपनी कोई महक होती है ? नया होने में, उनके पुरानेपन की ? सूने और परित्‍यक्‍त मकान के गर्दधुले नीम अंधेरे रंजन दीवार से लगा धीमे-धीमे चलता रहा । चेहरा कुछ दीवार की ओर झुका । मानो अपनी ही नज़र बचाये, सचमुच ही किसी पुरानेपन की महक की टोह लेता हो । क्‍या मालूम कोई महक तैरती ही हो इन दीवारों पर, इस हवा में ? यह इस दीवार के पीछे क्‍या है ? क्‍या है उधर उस अंधेरे में ?

‘अन्‍हारा में का होई, अन्‍हारा में अन्‍हारा बा, एने ओने सगरे.. एतना बखत ले सूंघतारा तहरा बुझात नइखे ?’

दीवार की ओर पीठ करके रंजन एकदम थिर हो गया । किसकी आवाज़ है इस निर्जन में ? चाभी सौंपते हुए चंद्रिका ने तो यही कहा था बड़ा धूल-धक्‍कड़ होगा, बाबू, केतने टाइम से हम्‍मो उधर झांकने नहीं गए हैं, कहिए तो केहू के संगे कर दें ? चाभी लेकर मुट्ठी में भींचते हुए रंजन ने ही अकेले आने की ज़ि‍द की थी । लेकिन था अकेला ?

आने की ज़रूरत ही क्‍या थी ? इतने वर्षों नहीं आकर नहीं चल रहा था जीवन ?

‘नाहींये चलत रहुए, पूछ हमरा से ! अऊर ना अउत हियां त कहंवा जइत, ई पूछ अपना से ? कउनो ठेकाना छेंकले रहुअ, मन के मोह के कवनो दूसर पाता, अं ?’

दीवार पर एक बिस्‍तुइया दौड़ जाती है । बिस्‍तुइया और उसके सिवा उस सूने फैलाव में और कोई नहीं । रंजन दीवार से लगा धीरे-धीरे चलता है । माथे में अभी भी महिला का महीन स्‍वर गूंजता, बज रहा । रंजन डर नहीं रहा । संकोच व शर्म का अहसास हो रहा हो सो अलग बात है, डर वह कतई नहीं रहा ।

‘हमरा से कवनो छुपल बा,’ फिर वही आवाज़, कौन ? किसकी ? ‘जानतनि, डेराइल तू खाली अपने से जानेल.. जइसे नंदकिसोर भइया रहुअन, बाघ-बिलार केहु से कहंवा डेरात रहुअन ? बस एक कोना अन्‍हारा उनका अकेला छोड़ द त तड़ देना चेहरा उतर जात रहुए, पसीना छोड़े लागत रहुअन,’ और फिर एकदम से महीन हंसी । फिर ख़ामोशी । फिर एक लम्‍बी सांस ।

‘तहरे जइसन ऊहो कहंवा केहू के संगत में रहत रहुअन । हरमेसा अकेले । चुपाइल पटाइल । अगवा चाह रख द त पी लीहें, मत रख त अइसन शायदे होई कि अपना से पूछिहें.. मेहरारुओ उनकर जे त जनाना भेंटाइल रहुए, आह रे भगवान..’ फिर वह लम्‍बी सांस ।

किस नंदकिशोर भैया की बात हो रही है ? रंजन किसी नंदकिशोर भैया को नहीं जानता । इस पुराने जर्जर मकान से जुड़ी रंजन की यादों से अलग इस मकान के और भी इतिहास हैं ?

‘नगीना, पूरनचन्‍न, मैना दीदी, बेनी बाबू के के केतना न जतन कइल हा, लेकिन भइया केहू के बात सुनत रहुअन ? ना सुनले । निकल गइले । जइसे तू निकल गइल रहुअ, बऊआ.. आइलो बाट त हमरा काजे आइल हव्‍व ? ना, अपना संगत में बाट, अपने संगत में निकल जइब, कह, बऊआ, झूठ कहतानिं ?’


यह तो काफ़ी वर्षों बाद रंजन के बात समझ आई कि वह उस जर्जर खस्‍ताहाल संसार में वापस फिर कभी लौटकर गया ही नहीं था.

Thursday, May 3, 2012

ए पार ओ पार कोन पार जानि ना..

मानिक दादा ने मुझे करेक्‍ट किया कि बच्‍चा, भूल रहे हो, हमारी जोरहाट में पहले मुलाकात हो चुकी है. मैंने सनकी बुड्ढे की कुहनी छूकर मचलते हुए कहा, ‘दादा, मैं ठेठ पूरब का बिहारी बच्‍चा, इतना उत्‍तरांतर किस जोम में जाता? आपको ग़लतफ़हमी हो रही है!’

दादा दाढ़ी का खूंटा सहलाते रहे, मेरी ओर देखा तक नहीं, बोले, ‘तुमने हांड़ी भर हं‍ड़ि‍या पी रखी थी, तोमको कोच्‍छ याद नहीं.. हम जोरहाट में मिले थे एंड से टा फ़ाईनाल, आगे बलो!

सूखते घास की छोर पर एक नाव का अस्थि-पिंजर औंधा गिरा था, तीन बकरियां उसकी आड़ में ज़मीन का सूखा चर रही थीं, एक दुष्‍ट बकरी-छौना था, नाव पर चढ़ा उसे चबाने की कोशिश कर रहा था. दादा किसी भी क्षण मेरी पकड़ से छूट, अपनी में गायब हो सकते थे, इसीलिए उनसे बेमतलब की बहस में उलझने की जगह मैंने आंखें तरेरकर दूर खड़े तोमास से अपनी खीझ का इशारा किया, जाने पेल्‍लेग्रिनी ने क्‍या समझा, अगले ही क्षण वह कमर से झुका, दादा की चरण-धूलि ले रहा था. दादा एकदम खुश हो गए. उठाकर हमारे एकमात्र विदेशी मित्र को अंकवांर भर लिया. असमंजस और दुविधा में मैंने अपने दोनों हाथ पैंट की जेब में डाल लिये, फिर गौर से नाव-चढ़े बकरी-छौने का निरीक्षण करने लगा.

तोमास का कंधा थपथपाकर दादा वहीं घास पर ढुलककर बैठ गए. खादी के पुराने झोले से पंचांग सरीखा कोई पत्रा और क्‍वार्टर की एक बोतल बाहर किये, पत्रा तोमासिनो के हाथ थमाकर स्‍वयं पीने की क्रिया में न्‍यस्‍त हुए. मुझे अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि खब्‍ती बूढ़े को पत्रा-समेत मैं यहां तक लाने में कैसे सफल हुआ था..


“कौन ज़बान थी जिसे वह नहीं जानता था. आर्मेनी, कीरगिज़, पश्‍तो, बंग्‍ला, तुर्की, गुजराती, कोंकणी, फ्रेंच, अंग्रेजी, मांदारिन सब ज़बानों के लोगों के बीच उसका उठना-बैठना था, चुटकियां काटता-कटवाता उनकी औरतों के वह छोटे-मोटे काम करता, उन्‍हें भगाकर अपने देस ले जाने के उनसे मज़ाक करता, मगर किसी का वह दोस्‍त नहीं था- यह उसकी बूढ़ी, एक पैर से बेकार, मां कहती. मालूम नहीं किस बात का रंज था, बुढ़ि‍या उसे देखते ही गंदी गालियां बकने लगती. और वह शैतान का सिपहसालार हमेशा हंसता रहता. मुंह से ज़हर उगलती बुढ़ि‍या को बांहों में भरकर हवा में उछाल देता.

कहते हैं बूढ़ी ने एक बार सोते बेटे के तम्‍बू में अपने हाथों से आग लगा दी थी. जब लह-लह सब लहकने लगा तो खुद तंबु के भीतर चली गई, कि खत्‍म हो जाये सब. लैफ्टि‍नैंट विलियम पैरी साहब कहते, अतीत के संत्रास और भविष्‍य के अंधेरे ने बुढ़ि‍या में इस तरह का दीवाना पागलपन भर दिया था.

लेकिन बुढ़ि‍या उस रात मरी नहीं. न उसका ‘जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स’ शातिर बेटा मरा. मज़े की बात तो यह कि दसेक साल बाद, जब ग़दर के ख़ूं-खराबे का गर्द उतरना शुरु हुआ और बदले की उलट कार्रवाई में अंग्रेजों ने छांट-छांटकर देसियों की धर-पकड़ करी, सरेआम रस्सियों लटकाया, उन्‍हें गोलियों से भून दिया, तब भी अपनी मां के कपूत, हमारे ख़ासम-ख़ास, चौक-बाज़ार बाइयों से ठिठोली करते फिरे, इनका बाल तक बांका न हुआ!

अलबत्‍ता यह कहानी सच्‍ची ज़रूर है कि तवेर्नीयर और शर्ली की घुड़सवार टुकड़ी की ने कभी रात के सूनसान में घेरकर इन्‍हें एक किनारे किया, पंजों के बल खड़ा करने पर मजबूर किया था; मगर बेहया की मजाल देखिए, जवान के होश तब भी फाख्‍ता न हुए थे, लपकती आवाज़ में जवान ने अफ़सरों को चिंघाड़कर चुनौती दी थी, ‘हैव यू सीन मी एवर मेस्सिन विद् मुल्‍लास, ऑर फॉर दैट मैटर, विद् बामिन्‍स, एवर, हैव यू? आई एम फाइटिंग फॉर नॉ बडी, एम नॉट सेविन माई कंट्री, बिकॉज़ आई डोंट नो व्‍हेयर इट इज़!

मगर कहानी यह भी है कि कलकत्‍ते और शांघाई के बीच चंदन की लकड़ी का कारोबार करनेवाले किसी अमीर की बेवा ने बीच-बचाव करके, या क्‍या मालूम पीठ पीछे अंग्रेजों को मुंहमांगी रकम खिलाकर नालायक की जान बचाई थी.

कहते हैं बाद के दिनों में बुढ़ि‍या का दिमाग़ सचमुच चल गया था, बेटे के सामने पड़ते ही उसे झिंझोड़ती बस एक ही बात की रट लगाये रहती, कि मरने के पहले एक मर्तबा अपना घर देखना चाहती है! यह बेग़ैरत नालायक, ठहाके लगाकर जवाब देता, ‘तेरा कोई घर नहीं, बूढ़ी, मेरा कोई घर नहीं. हम बेघर-बार, बे-देश-दुआर जनम-जनम के खानाबदोश ठहरे, कपीश?’

बुढ़ि‍या आखिरकार पागलपने में ही मरी, और उस बदहाल, तबाह, तंगी की चोट में ही मरी जब शायद उसे एक निवाला खिलानेवाला तक कोई नज़दीक न था. घर लिये जाने वाला तो नहीं ही था, जो कुछ अर्सा गुज़रे अचानक जाड़े की हाड़ कंपाती एक रात वह ग़ायब हुआ कि उसके बाद फिर कभी उसकी ख़बर न हुई.”

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Wednesday, May 2, 2012

इतिहास कल्‍पना है. मसलीपट्टम की हार भी..

‘अच्‍छा हो यह कथा न लिखी जाये. प्रथम पुरुष में तो न ही लिखी जाये,’ लिखनेवाले हाथ किंचित संकोच में ठहर गए. डोलती गाड़ी में सिर उठाकर देखा तो लगभग बाहर की ओर, घुटने पर हाथ आगे गिराये बैठे उस श्‍यामवर्णी नौजवान को गहरी मलिन उदासियों में नहाया पाया. उतना वैसा ही गाढ़ा जैसा उसका रंग. किंतु अंधेरे में उसकी बड़ी सफ़ेद आंखें अब भी किसी चौंध-सी चमकती थीं.

‘तृतीय पुरुष के लेखन में भी यह संभावना किंचित रहेगी ही कि केंद्र में मेरी स्‍थापना की जाये, कथा का वह शिल्‍प बनते ही उस कथा में मेरी प्रासंगिकता, उसमें होने की मेरी सौद्शेयता ख़त्‍म हो जायेगी,’ श्‍यामवर्णी ने कुछ व्‍यंग्‍य में कहा और लिखनेवाले की सामर्थ्‍यता को मानो परीक्षक नज़रों से जांचने लगा, ‘हम लोग कभी प्रचलित कथा के केंद्र में नहीं रहे, समुदायबद्ध गल्‍प-गायन, या आराधना-वंदन से बाहर कभी हमारी कथा गई नहीं, हमारे लोग नहीं गए; मैं अभागा, चिन्हित कुलनाशी रहा होऊंगा जो अपनी मातृभूमि से हज़ारों मील दूर इस मेघप्रबल रात्रि में सूखा, निर्जन भटक रहा हूं, इस यात्रा का निश्चिंत ही कभी अंत होगा, मेरी अनिश्चिताओं का नहीं!’

इतनी दूर निकल आने के उपरांत भी अभी आगे दूर-दूर तक जंगल के गाढ़े अंधेरों का ही साम्राज्‍य था. नौ सौ घोड़ों के काफिले का हरेक प्राणी थकान और निरुत्‍साह में टूटा हुआ, मैदान में तलवार ताने कूदने से पहले ही मानो सब युद्ध के अंतिम नतीजे से परिचित हों. फ्रांसीसियों के निकट सहयोग की अंतिम गुहार लेकर वेर्साइ पहुंचे दल को क्‍या ख़बर थी कि स्‍वयं समूचा फ्रांस उलट-पुलट के महाचक्र में उलझा हुआ है, और महाप्रभु अपने अंत की घड़ि‍यां गिन रहे हैं. नौका से उस दल की वापसी के साथ ही जैसे मसलीपट्टम की नियति भी लिखी जा चुकी थी, अब खुद बाघबच्‍चा टीपू भी उस लिखे को मिटा नहीं सकते थे!

क्‍या फर्क़ पड़ता था अब यह काफिला मसलीपट्टम कब पहुंचे. ये अपरिचित, संशयग्रस्‍त वृक्ष यूं ही चुपचाप अपनी जगह खड़े रहें, पवन कोई संवाद न करे, मेघ रह-रहकर गरजें किंतु बरसने में सकुचा जायें.

‘तुम कभी वापस अपने घर नहीं गए?’ लिखनेवाले ने सवाल किया, ‘अब जा सकते हो, अब तो टीपू भी मना न करेंगे? संभवत: अंगरेज़ अपनी निगरानी में तुम्‍हें तुम्‍हारे घर छोड़ आयें, तुम से काबिल नौजवान को अपने यहां बड़ी नौकरी की भरती में ले लें?’

श्‍यामवर्णी युवा गोद में धरे अपने भारी तलवार से खेलता रहा, मंद-मंद मुस्‍कराये, ‘आपने कभी विचार किया है, कुमार, टीपू की फौज में इतना सम्‍मान हासिल करने के अनंतर मैंने इस्‍लाम कबूल नहीं किया? लौट-लौटकर डाभोल, पश्चिम की यात्राएं करता रहा, और इसलिए नहीं कि वह भूमि मेरे किसी आपदाग्रस्‍त पुरखिन की शरणस्‍थली रहा, या चीनी फुजियान, ग्‍वॉंगदॉंग के मेरे व्‍यापारिक मित्रों का स्‍थानिक निवास.. नहीं, कुमार, सत्‍य यही है मैं उस भूगोल अब नहीं लौट सकता जिस भूमि से इतने वर्षों परित्‍यक्‍त रहा.. मेरे उस खोये, वंचना के समाज के माथे लिखा मंत्र जैसे मेरी किस्‍मत का भी अभिशाप-पत्र हो- सबके बीच हूं, लेकिन नहीं हूं, कहीं नहीं हूं! - वर्षों से मन-कातर, अनिद्रा-पीड़ि‍त इस मानुस-वन में रहते हुए भी, संभवत: इसीलिए होगा कि आपका यह हेम्‍ब्रम, अब भी समुदाय-वंचित रहा है! उस भय से जूझने की तृष्‍णा, छटपटाहट ही होगी जो बारम्‍बार मुझे युद्ध के घने पराक्रम में उछालती रही है, नहीं तो मेरे वैराग्‍य को आपसे अधिक कौन जानता है.. अंगरेज़ों के छल से इतनी नफ़रत न होती तो आज निश्‍चय ही यह काया मसलीपट्टम न जाती होती.. मैं भगोड़ा होकर टीपू और इस युद्ध से भाग जाता और जानता हूं कि आप स्‍वयं मेरी मदद करते.. किंतु चोट तो यह है कि इस नफ़रत के साथ मैं भाग भी नहीं सकता; उसकी आंख में आंख डालकर उसे पहचानने और अपना अंतस शुद्ध करने के लिए भी ज़रूरी है कि मैं इस हारी लड़ाई के केंद्र में जाकर खड़ा होऊं,’ श्‍यामवर्णी योद्धा अचानक जाने कैसी सनकभरी हंसी हंसने लगा, ‘भले मेरी कथा का कोई केंद्र न हो.. भले मसलीपट्टम महाबली टीपू के साथ-साथ इस गुमनाम आदिजीवन का भी अंत हो! न, कुमार?’

लिखनेवाले के हाथ की तरह ही उसका मन भी बंधा रहा. बिंधा. घोड़ों के निस्‍तेज खुर रात के सन्‍नाटे में जाने कैसा आलाप लिख रहे थे.

कुछ क्षणों की बिंधी ख़ामोशी के उपरान्‍त उस श्‍याम चेहरे पर एक तरल स्निग्‍घता उतर आई, विचित्र उस लुप्‍तात्‍मा ने सरस मीठेपन में धीमे से कहा, ‘आपसे सचमुच मन की कहूं तो इस क्षण मैं युद्ध-आपद की नहीं, बुद्ध की सोच रहा हूं, और जानता हूं असम्‍भव है, किंतु मेरा वश चले तो मसलीपट्टम किम्‍बा अपना बिसराया घर नहीं, चीनोन्‍मुख निकल जाना चाहता हूं!’

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शीर्षकहीन..

कौतुक के अंधेरे में चोटखायी चिड़ि‍या फिर उड़ जाती होगी
नीम की पत्तियों में जागकर हाथी का छौना कोई घबराने लगता होगा
बनिये की अटारी में अंड़से जाने किस ज़माने की कालिख घिरे लालटेन
चिटककर शिकायती आवाज़ लगाने लगते होंगे, कपड़ा फिरानेवाला कोई है, भाई अरे ओ?
पुराने क़ि‍स्‍सों का मशहूर, कब का भुलाया नचनिया, बैठता होगा कीच चढ़े ईनारे
हारे, दिनों पुरानी दाढ़ी की खूंट सहलाता, सहेजता टीन के तीन बेमतलब सामान


जब तब हल्‍ले में जागना होता होगा-      और फिर बहुत बहुत रातें
जागना, जागे रहना किन्‍हीं लम्‍बी नींदों में


घर का भागा पसलियां घायल किये लड़का मदद की गुहार में
झूलकर खिड़की पर रोता होगा, आसमानी कैलेंडर पर उड़ता जहाज
अटक-अटककर उड़ता, पीछे कोई चुपके बुदबुदाता
किस भाषा में उड़ते हो, जहाज?
लाला के नये छापेखाने की दीवार गंदा किये जाता होगा दुखियारा भंगी
चिपकाये उस पर अस्‍पतालों का अन्‍तरंग गुप्‍त इतिहास


कमली और विमली दो बहनें जुड़वां, शहर के औंजाईन में भागकर
कभी भी चली आती होंगी, बजाती नींद का उखड़ा दरवाज़ा
छत के बंद में बेतहाशा दौड़ता मुन्‍ना घुड़कता होगा, ऐ लड़कियो
दिखता नहीं इमारत में कुआं खुद रहा है, पंडितजी खाली शीशियां
बेचने गांव गए हैं, और हम आंख मूंदकर चोरी करना सीख रहा हूं


राधेमोहन (जूनियर) लोटे में सतुआ घोलते, रोती नीरजा थाली के कोने
सहजन की चबाइन सहेजती, जिला डिपो का बस मुकुंद  दुआरे 
चला आता होगा, गो उसमें चढ़ने को अब मुकुंद स्‍वाईं नहीं होते होंगे
जैसे घुटने की चोट होती होगी, हंसते मुन्‍ने का मुखड़ा, दौड़ना नहीं होता होगा
धूल औ’ सूख गुज़रे बहुत सारे फरियाये, अझुराये कागज़-पत्‍तर होंगे
सारंगी से निकलकर तैरता, तैरा जाता मीठा
सीधा कोई हिसाब नहीं ही होता होगा


नीम और कहां कितने हकीमों के ऊपर
सलेटी आसमान की खुरदुरी बांहों में
चिड़ि‍या अब भी अटक-अटककर उड़ती
हाथी का छौना चौंक-चौंककर जागता
      
     - नींद चौंकन्‍नी, चुप्‍पै जागे की गिनती गिनती होगी.


(स्‍केच, फेथमाउस ब्‍लागस्‍पॉट से साभार) 

Tuesday, May 1, 2012

दौंरा की सुबली..

इतने बखत बाद अब ठीक से याद नहीं कि मैं खुदे भागी थी कि हमको अगवा करके ले गए थे. बड़ी-बड़ी बज्‍जर मूंछ और राच्‍छस जैसी ऊंच काठी का एक हरमेसा मुस्‍कि‍राता रहता, हमको बहुत पसिंद था, लेकिन अकेला नहीं था, उसके संगे छौ और थे, और पांच गाड़ी भर का लाव-लश्‍कर. यहां-वहां गांव के ठिकाने मंडली जमाय के, हल्‍ला-गुल्‍ला मचाय के, हथेली पर चांदी के सिक्‍का खनकाय के, गांव के अमदीयन से सामान ढोये वाला, लाठी-बल्‍लम चलाये वाला भरती कर लेते, जबकि उनकी बोली, उनका ब्‍यौहार उधर के लोगों को कुच्‍छो बुझाता नहीं था. हम बज्‍जर मूंछ वाले का कुरती खींचके पूछीं, ई काफिला कहां जाता है, बाबू साहिब? हमको कहंवा लिये जाते हो? ऊ हरामी कुच्‍छ न बोले, हम्‍मर हाथ अप्‍पन हाथे लिये कनखी मारे, मुंहजार मुस्कियाये जाये!

खाये की दिक्‍कत (मालूम नहीं तसले में कौने का काढ़ा पकाते थे, कांसे के कटोरे में सबके बीच फिराय दिया जाता, और गांव के कम-अकिल देहात मनई, तीन मर्तबा कटोरा में उंगली डुबायें, हदबद घबराये तय करें कि कवन चीज है, खायें न खायें, कि आगे के सफर का हल्‍ला शुरू हो जाता. एक बल्‍लम धारी अपने गांव के पहिलवान रहे होंगे, भुईं पर गोड़ पटककर जम गये कि ई खाना नहीं खायेंगे, हमको हमारी खुराक दो! तो मुच्‍छल के छोट कद का एक साथी था, पीछे से पहिलवान के गर्दन पर झूलकर जवान ने छुरी से पहिलवान की गर्दन अलग कर दी!), बात-बोली की मुसीबत, दो दिन निकल जाये के बाद अब हमें घबराहट होये लगी कि घर-जंगलात से दूर कहां निकल आये, किनके संगे निकल आये.. फिर एक दिन भूखे पेट सोये रहे, या माथा में पिरानी पड़ा रहा, जाने कब तलक वहीये दशा बनल रही, होशे लउटे, आंख खुली के चेती में देखे तो दीखा सगरे लाव-लश्‍कर पानी के दहाज पर चढ़ा हुआ है! और हम्‍मन सगरे लोग बीच समुंदल में! बज्‍जर मूंछ वाले बाबू साहेब का कहींयो पता नहीं, हम ज़ोर-ज़ोर से रोये लागे, मगर हुआं दहाज के हल्‍ले में कौन हमरी रोवाई सुनता था? कोई घड़ी भर सामने ठाड़ा पड़े तो हम वही दो सब्‍द उच्‍चारते- सुबली (हमरा नाम) और दौंरा (हमरे गांव का नांव)- और आगे रोये जाते!

पीपों के सिरहाने, आंख तक चदरा गिराये, चुप्‍पे हुक्‍का गुड़गुड़ाये एक मुल्‍ला साधु रहीन, उंगली से इशारा कै के हमे नजीके बुलाये, बुदबुदाय के कुच्‍छो बोले लागे, तनी कुछ-कुछ हमरे समिझ में आया.. जौन राच्‍छस मनई के पीछे हम दौंरे से भाग आई रहीं, ऊ सब अरमैनी (आर्मेनियन) ब्‍यौपारी हव्‍वैं.. मन के मलंग और भीतरी से खूबे खूंखार.. लाव-लश्‍कर में बारह मनई हैं जिनकी पहिलही बिक्री होय चुकी है.. सुबली, बबुनी, तोहरो सौदा होय चुका!

हम भर्र-भर्र रोते रहे और नाव हम सबके जाने कवन अनजाने लिये जाती रही. जौन ठौरे पे जाके नाव लगा, ऊ अनजान देस के नाम हुआ, तिसवादी (गोवा का प्राचीन नाम).. अलग-अलग लोक अलग-अलग हाथन बिके, हमारी बिक्री जौन बड़े मालिक के हाथ हुई उन असद खान की हस्‍ती का समूचे तिसवादी में डंका था.. मगर हमरी गुलामी के अभी महीना डेढ़ महीनो न हुआ था कि टापू पर फिरंगी फौजन के भारी हमला हुआ.. दुई रात घमासान मचा रहा.. बेलांव (बेलगांव) भागे की कोशिश में हमरे मालिक धर लिये गये और अपनी जान गंवाई.. 


टापू के मुसलमान खोज-खोजके बाहिर किये गए और कवनो के जान न बख्‍शी गई. हम्‍मर मलकिनी, कुदसिया ऊरु बसाना, हमसे बोलीं, हवेली में चा‍लीस नवकर हैं, बाईस जनाना, कल बिहाने तलक कितने बचेंगे, अल्‍लो नहीं जानत हैं! हमार तो अब जे होयेगा, सो होयेगा, तू पूरब के ओतने दूर कवने देस से आई रही, हमरे हियां पनाहदार रहीं, हमें तोहार चिंता है, सुबली.. इन हरामी फिरंगन से जान बचाये का एके तरीका है कि तू फुजियान के हमरे चीनी संगी के संगे पच्छिम (गुजरात) की ओर निकल जा..

आज सोचें तो अब यकीन नहीं होता मगर ऊ रात खून और आग की होली के बीचों-बीच फिरंगियन के आंखी में धूलि झोंक के हम सच्‍चो निकल आये.. अपनी काबिल नेक मलकिनी के फैसले पर उस रात तिसवादी से न भागे होते तो आज ई कहानी सुनाये के खातिर हम जिन्‍ना न होते, बाबू..!”

पूर्वी भारत के दुर्गापुर देहात के किसी बाबा आदम ज़माने की पुरानी इमारत में (कभी दक्खिन में जेसुइट पादरी रहे, अब पूर्णकालिक अघोरी जीवन का अन्‍वेषण कर रहे) बुढ़ाते, पगलाते रिचर्ड शंकर को तोमासिनो ने अपने बूते ही खोजा था, और ये टेढ़ी, अटपट कहानी उन्‍हीं पियरायी पुर्चियों से बाहर आई थी जिसे वह पादरी के पुराने कागज़-पत्‍तरों से संधानकर लाया और अब सहेजता, धर्मशाला के सूनसान दुपहरिया में अटक-अटककर उनका इतालवी में पाठ कर रहा था. मैंने तोमास को टोककर सवाल किया, यह सब क्‍या है? इतालवी में कैसे है, क्‍यों है?

मेरे सवाल का जवाब देने की जगह तोमास मुस्‍कराने लगा, फिर रहस्‍य की हवा खींचते सूचित किया, इतालवी में नहीं, ख़ास फिरेंज़े की बोली में है, और बताता हूं फिरेंज़े की बोली में क्‍यों है.. क्‍योंकि 1510 ईस्‍वी के गोवा के गिर्द की कहानी, सुबली के जीवन का जो यह समय, सोलहवीं सदी का पूर्वार्द्ध पढ़ रहे हैं, तब इटली ही नहीं, दुनिया भर में भले वेनिस और जेनोवा की आर्थिक, राजनीतिक ताक़त का डंका बज रहा था, संस्‍कृति व भाषा की मिठास, उसका नेतृत्‍व फिरेंज़े (फ्लोरेंस) के ही हाथों था; यहां मज़ेदार यही है कि उस जबान में कोई सुबली की कहानी लिख रहा है!

मेरे कुछ भी पल्‍ले नहीं पड़ रहा था. उस नहीं पड़ने के तनाव में ही मैंने आगे कहा, आगे क्‍या है? दौंरा की सुबली रानी और क्‍या कहती हैं?”

कुछ नहीं कहतीं, कागज़ों को आगे-पीछे उलटते, तोमास ने हंसकर इत्तिला की, इससे आगे सुबली का कहीं नहीं, किसी हेम्‍ब्रम का ज़ि‍क्र है, और काल में एक सीधी 'छलांग' है; कहानी सोलहवीं सदी की शुरुआत के गोवा से सीधे अट्ठारहवीं के अंत के मसलीपट्टम पर दौड़ी चली जाती है!”

व्‍हॉट डस इट मीन?” मैंने चिढ़कर भोजपुरी में कहा.

सर को हाथों में बांधकर तोमासिनो इतालवी मुस्‍की हंसता रहा, की ल्‍लो सा!”