Friday, January 6, 2012

कितना अच्‍छा होता..

कितना अच्छा होता जनवरी चमकीली धूप की तरह हथेलियों पर पसरी आती, सुबह विनोदकुमार शुक्ल की कहानियों-सा लजाया चमक जगमग जाता, तुम खिलखिलाये ख़बर करते कि दोब्लातोव की सारी लिखाइयां एक ज़ि‍ल्दी में मिलीं, अब? अरे, मैं कहता, दुनिया क्या कुछ ज़रा बेहतर जगह हुई? सकुचाये अबकी तुम्हारा जवाब होता, शायद, ज़रा, क्या मालूम? मैं घबराकर चिल्लाने लगता, देखो, दिल टटोलो, दिल में कितनी हवा उतरी है, बोलो? छाती भरी-भरी लग रही है, ‘धर्मयुग’ के पुराने फ़ाइलों में देखो, पड़ताल करो, काले-सफ़ेद में मुस्कराती चित्रा सिंह फ़ोटो की आड़ में क्या वाक़ई खुशी पा रही है? पल्लीनाथ साहू सर के हाथ के ठोंगे में कड़कड़ाती कचौड़ी सूंघकर सुराग दो, चुमकी की कान पर पड़ती रौशनी की लकीर को सींक से दुलराकर, चौंका कर, बुच्चन को तड़ हवा में लोक, गोदी में लहरदार चक्कार घुमला कर, पता, पता, पता करो, ज़रा, थोड़ी, इत्ती इतनी भी बेहतर हुई है दुनिया?

जनवरी के छलावे में, देखो, क्या मालूम चमकीली धूप फेर में पड़ी, फिसली चली ही आये, गाल भौं के बाल, गोद में सजी बैठी रहे, सारा दिन मुस्काये, तो इतनी आसानी से हाथ खड़े मत करो, हो सकता है इतनी सी दुनिया हुई जाये, इतना, ज़रा-सा, बेहतर, आं? हां, हां, तुम बिना सोचे तड़ जवाब देना, मैं फड़ ताबड़तोड़ बेवक़ूफ़ी में मुस्कराने लगूं, अपने हिस्से का इतना-सा हम बेहतर, अमूर्तन में सजाने लगें, आधा दिन गुज़र चुकने पर फिर याद आए पूछना कि नहीं अच्छा होता, कितना अच्छा होता जनवरी चमकीली धूप की तरह हथेलियों पर पसरी आती, सुबह विनोदकुमार शुक्ल की कहानियों-सा लजाया चमक जगमग जाता?

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और सबको नया साल, मुबारक..

2 comments:

  1. कितना अच्छा होता जनवरी चमकीली धूप की तरह हथेलियों पर पसरी आती, सुबह विनोदकुमार शुक्ल की कहानियों-सा लजाया चमक जगमग जाता?

    सही है! नया साल शुभ हो! मंगलमय हो!

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  2. कितनी अच्छी सुबह कि रात भर जागन के बाद यह खूबसूरत टुकड़ा पढ़ा।

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