Tuesday, January 17, 2012

सुन सुन गोल-गोल

पियराये, धुंधले दिनों में एक सियाह लकीर सी खिंची रहती है, बुरी ग्रहदशा है, बदनसीबी का दाग़ है, जाने क्या, है क्यों है? बिंदु, बताओ, सच्ची, चहकता मन इन पसलियों से निकलकर किसी दूसरे ठौर पहुंच दमकना चाहता है, तरतीब से तीन बातें गुनकर इतनी इधर और उतनी उधर, ज़रा सी ज़मीन सजाना चाहता है, मगर ठौर वह पकड़ाती नहीं, ज़मीन हाथ भेंटाती नहीं, गोल-गोल घूमने की लैफ्ट-रैट होती रहती, कहीं पहुंचने की नहीं होती, कहीं पहुंचना नहीं होता, सच्ची, बिंदु..

जीवन में क्या है कि यही दो चीज़ें बची दिखती हैं, सिर्फ़ इस देह का अहसास, और बातें बनाता, लफ्फड़ बहलावनकुमार टी-टी-टेलीविज़न.. या फिर, अंतहीन थपकियों के आश्वासन में, अपने बहत्‍तर हज़ार तिलिस्मों में बांधे, दुलराता-थकाता अंतरजाल- जिसके जादुई थाल पर आंखें मूंदें फिसलते जागते में सोते, और सोते में कांपते, हम खुद से बुदबुदाते फिरते-फिरे रहते हैं, बाहर का कुछ, कोई और आवाज़़ सुनाई नहीं पड़ती, कहो, पड़ती है? तुम तक मेरी आवाज़ पहुंचती है, बिंदु?

धूप में सूखने को डले कपड़ों की बास के बीचोंबीच खड़ा कहता हूं, बिवाय फटी एड़ी पर नारियल तेल की रगड़ के नज़दीक खड़ा. कौवे और कबूतरों के दावं-दावं के दरमियान गुमसुम कातरता में अपनी ज़बान पहचानने के बीच, जानने का जाने कैसा गोरखधंधा है, जीवन का, लगता है इस बेनसीबी में कुछ सोहाता नहीं, कहीं कुछ सधता नहीं, फिर भी बेक़रारी कमाती नहीं, कान फैलाये टोहती रहती है, सुन सुन सुन, सुनती है कुछ समझती भी है? तुम समझती हो, मन की देहरी तक कैसे, कौन व्यथाराग उतरते हैं, बिंदु?

ऊंची इमारतों के अनगिन धंधों और बेशुमार गाड़ि‍यों की सड़कों पर खिंचे फंदों की भागाभागी में गिरता-पड़ता दिमाग़, कहां पहुंचता है, कल्पंना की एक चील उड़ती फिरती है आवारा आसमान, सच की गोरैया पंख सिकोड़े नुचे पंख निरखती है, बुदबुदाहटों में तुम तक पहुंचती है, जाने कितना पहुंच पाती है, सुनती हो, बिंदु?

मुझसे लगा खड़ा है साया, संदेह से देखता हूं मेरे साथ नहीं है, क्या है जो पास है, तुम हो, बिंदु?

2 comments:

  1. आपकी अद्भुत लेखनी को बारम्बार प्रणाम!

    ReplyDelete