Wednesday, January 25, 2012

तुमको देखा था..



देखा मैंने बहुत देखा खूब देखा
हाथ की घड़ी बूढ़े का बिवाय देखा
चिलकती धूप में गाता बंजारा
आवारा, गुमनाम सितारा देखा
तीन शहर चार नदियां देखी
जलते जंगलों के पीछे दहकता आसमां
तिलिस्मी रात काली, तनी दोनाली देखी
गूंगों का गांव मरने के दावं देखे
आह की औकात उफ्फ की जात
देखा क्या क्या कि आंखें दुख गईं
तुमको देखा, हां, देखा था, अगर
मगर सचमुच कब देखा था ?

धुंध धुआं बरसात और रात
की पाली से लौटते मजूर देखे
अमीरों की अस्पताल का बगीचा
छापे में छपा गलीचा देखा था
इक लावारिस हाथी की आंख के आंसू
झाड़ि‍यों फंसा बच्ची का फ्राक धांसू देखा
हवाईयन गिटार पर उदासियों के सैरे
कितने पहचाने चेहरे कितने गैरे, देखे
तुमको देखा, हां, देखा था, अगर
मगर सचमुच कब देखा था ?

बांस के जंगलों के कहीं दूर
कोई चरवाहा था बजाता बांसुरी
कोई बेशऊर भैंसा थी गाती
मैं गोड़ के नाखून उतरवाकर
पिसा बहुत घिसा, कीचों नहाकर आया
था की पिटी कहानी देखी
हंसियों में छुपके रोता सैलानी
बेमुरव्वती की नानी, देखी
तुमको देखा, हां, देखा था, अगर
मगर सचमुच कब देखा था ?

5 comments:

  1. देखी सचमुच ये पोस्ट आपकी प्यारी देखी!

    ReplyDelete
  2. देख रहे हैं आपको यह सब देखते हुये।

    ReplyDelete
  3. बांस के जंगलों के कहीं दूर
    कोई चरवाहा था बजाता बांसुरी
    ......

    ReplyDelete
  4. इक लावारिस हाथी की आंख के आंसू
    ...
    नमन कवि हृदय की इस संवेदनशीलता को!

    पढ़ते रहे पोस्ट्स... कहीं कहीं यूँ कुछ लिख दिया लिखे पर, कहीं कुछ त्रुटी हो गयी हो तो क्षमा कीजियेगा!

    ReplyDelete
    Replies
    1. सोच रहे हैं कहां, जमशेदपुर के बांसडीह में ठाड़ा होकर क्षमा करें, कैसे करें?

      Delete