Wednesday, February 1, 2012

कहना, छिपा हुआ..

मैंने कुछ कहा (मगर कहां कहा? गुफ़्तगू के जाले मेरी कुहनियों पर लिपटे कांपते, डोलते, कनपटियों से फिसलकर कंधों पर झरे आते, मैं उन्‍हें बीनता पहचानने की कोशिश करता, उनके रेशे अलग करता सवाल करता, क्‍या कह रहे हो? क्‍या कहे, आं? ज़ोर से बोलो, साफ़? बाबा, साफ़ बोलते नहीं बनता, मुंह में दही जमाये हो, ओ? फिर.. फिर क्‍या, ख़ामोशी का धुंधलका पसरता, पसरा जाता, आवाज़ें काठ की पुरानी काली दीवारों पर होंठ दाबे फुसफुसातीं, मैं कुछ भी सुनने से बाज आया, बाहर लावारिस तनतनाता हाथ पटकता होता.. गुफ़्तगू, ओ गुफ़्तगू, व्‍हॉट इस दाई गेम!)..

मैंने कुछ कहा.. क्‍या, या जुसेप्‍पे ने?

मगर जुसेप्‍पे कहां कुछ कहता है? मां कभी कुछ कहती थी? या, झोले में दो साड़ी धरके निकलते में सुचित्रा ने ही कुछ कहां कहा था? मन के निर्झर में अर्थों की नाव का सुरीला जैज़ बजे, एक छोर से बजता उस पार पहुंच जाये जैसा कभी कहां गमकता है, अख़बारी ख़बरों-सी बातें बजती हैं, अंतरंग के असल दीये, बलते-बलते हमेशा अनकहे, अगोचर, सूनसान में छिपे रहते हैं. कहा कहा का एक झंखाड़ी अबूझ शोरिल कंटाव खिंचा रहता है, सूती के साफ़ धुले चादर पर चारकोल की खांटी चित्रकारी का नक़्शा खुले ऐसी समझदारी अपने को बुरके में बचाये लिए जाती है..

“जुसेप्‍पे, तुमने कुछ कहा?”

जुसेप्‍पे कुछ नहीं कहता. पास्‍काल के ‘पेंसीज़’ की एक पुरानी कापी के पन्‍नों पर पेंसिल के निशान बिंध रहा है. मैं हवा में हाथ टटोलता हूं कि सुचित्रा के कहे की सरसराहट है, या अप्रकट हुए दीनानाथ मास्‍टर हैं, कुम्‍हलायी आवाज़ में समाज-विज्ञान का कोई छूटा सबक फिर याद करा रहे हैं. या पांच साल का बेनुआ है कांख में सिपाही का खिलौना दाबे, पलंग के नीचे छिपे रेमो को सवालों से हलकान करने उसके करीब सरकता है, “तुम यहां क्‍यों छुपे हो, रे? ज़्यां, बेरनार्द और फ्रांसुआ गराज में छुपे हैं, बीलो पापा के कंवर्टेबल में छुपा है, बेतील मामान की अलमारी में, मैं किधर छिपूं, रे?”

आठ साल का रेमो कुछ नहीं कहता. आंखें मूंदकर मन ही मन गिनती गिनता है फिर हारकर फटी आंखों बेनुआ को तकता है. बेनुआ के नन्‍हें चेहरे पर हैरानी की एक मासूम लकीर खिंच जाती है, “तुम इतने दुखी क्‍यों हो, रे?”

“तुम्‍हारी मां के माइग्रेन होता तब तुम समझते क्‍यों दुखी हूं,” यह बेनुआ को दिया जवाब नहीं, रेमो की खुद को जारी खबरदारी है. बेनुआ के लिए वह कहता है, “मैं सांस नहीं ले सकता, समझे?”

बेनुआ सांस लेकर सवाल करता है, “माइग्रेन माने?”

“माइग्रेन माने.. जैसे तुम्‍हारे सर पे कोई हर समय हथौड़ी बजाता रहे?”

मैं आंख खोलकर देखता हूं बेनुआ के चेहरे पर क्‍या भाव हैं, मगर बेनुआ की जगह मुझे सुचित्रा दीखती, और उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं का स्थिर चित्र दीखता, उससे लगा जुसेप्‍पे का सवाल सुन पड़ता, “तुमने कुछ कहा?”

मां सूप का गेंहू चटाई पर बिछे चादर पर पलटकर उठती, पास्‍काल ‘पेंसीज़’ के घिसे पन्‍ने पर कुछ समझाते-से दिखते, मगर हवा की आवाज़ से अलग मुझे अभी भी सुनाई नहीं पड़ता.. कुछ भी..

1 comment:

  1. क्या कहूँ? आपके शब्द कुछ कहने दें तब कहूँ ना...आपके लिखे पर कुछ कहना वैसे भी कहाँ सरल होता है?

    नीरज

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