Monday, February 6, 2012

अंधेरों में, नाविल..


चेहरे को देखना कष्‍टकारी है, चेहरे से नज़र फेरकर लेखक स्‍त्री के पैर जांचने लगता है, मगर पैरों पर भी वही चेहरे की ही तस्‍वीर बुनी दीखती है. त्‍वचा खिंची-खिंची, रंग उड़ा-उड़ा. स्‍त्री के पैर भारी हैं. भारी पैरों वाली सुचित्रा के बेमतलब पैर पढ़ता लेखक का मन कहीं ज़्यादा भारी हो जाता है. प्राइवेट क्‍लि‍निक के संकरे कॉरीडोर में दीवार से लगे बेंच पर धंसे, अडोलावस्‍था में इंतज़ार करता तक़लीफ़ के भार में वह और भारी होता है, “यह स्‍त्री क्‍या कर रही है उसके असनाफ़ी दुनिया (रचनात्‍मक संसार) में? वह क्‍या कर रहा है किन्‍हीं भारी पैरों को गोद में लिए धंसा, दबा हुआ? पिछड़े समाजों का यह कैसा असनाफ़ी मंजर है, इसकी बोझों तले दबा नस्‍त्र (गद्य. मगर ‘बोझों’? कहीं कहते हैं? नहीं कहते तो बे लेखक, तेरी नस्‍त्र में कहेंगे, न कहेंगे तो सुचित्रा के भारी पैरों का भार कमनीय, बे-बोझ व ओझल बना रहेगा) इस कॉरीडोर के धुंआंए अंधेरों से निकलकर किसी दूसरे करियाए कॉरीडोर के अंधेरों में खाक़ होगा, नस्‍त्र आवारा सज़्दे होंगे, मुए मज़ाह (व्‍यंग्‍य) तक को कोई वाजिब पनाह न होगा!”

क्‍यों होती हैं ये स्त्रियां, जो हमारे रूहानी, अजस्‍त्र अदबी अरमानों की सुनहली धूप घेरने पहुंच जाती हैं, कि चंद लम्‍हात बाद ज़िंदगी के झमेलातों के पर निकल आते हैं, अटकी सांसों और कनपटियों पर तनाव अभी सुस्‍ताने की सांस नहीं भरता कि भारी पैर दिखने लगते हैं, और जहां तक सुनहली धूप की बात रही तो वह तो क्‍या, उसका ख़याल तक नहीं बचता..
अडोलावस्‍था में लेखक गोद में गिरे अपने हाथों पर एक उड़ती नज़र फेंक फिर कहीं टेक पाने को हदसने लगता है. गोद में नहीं है, मगर है कहीं नाविल आस-पास, इन बेहया, बेशऊर आवारा हाथों की ज़द में आएगा कैसे भी करके नाविल, कैसे नहीं आएगा? कि सचमुच नहीं ही आएगा? लेखक यकबयक उखड़ी खरखराती सांसें गिनने लगता है. सुचित्रा घबराकर कांखती-सी आवाज़ बकती है, “क्‍या हुआ, पानी पियोगे?” लेखक कराहघुले इशारे में औरत को हाथ से हुड़कता है, तू अपनी जगह बैठी रह! हिल्‍ल मत्‍त!
औरत हमेशा आंख के सामने रहती है, नाविल क्‍यों नहीं रहता. एक अमरीकी नाविलनिगार लेखक की दानिशमंदी (विवेक) पर अंधेरा फेंकता कहीं एक इंटरव्‍यू में कह जाता है, “वर्ल्‍ड न्‍यूज़ इज़ द नाविल पिपल वॉंट टू रीड,” सुनते ही लेखक की कांख और पीठ के नामौज़ूद बाल सुलगने लगते हैं, उंगलियों के पोर पर बैठी नाविल की तमहीद (प्रस्‍तावना) मुमताज़ और धरमिंदर के पीछे-पीछे झील के उस पार पहुंच जाती है, आसाइश (आराम) जाकर रोज़े पर बैठ जाती है, आलिम औ’ फ़ा‍ज़ि‍लपना दोज़ख़ (नरक) को हासिल होते हैं!
“पानी लाऊं?” सुचित्रा की उखड़ी बुदबुदाहट सुन पड़ती है, “डाक्‍टर के बुलावे में अभी देर है, मैं उठ सकती हूं.” लेकिन लेखक का नाविल उसकी हिन्‍दी की तरह ही बैठा हुआ है, अपने में घर-घुस्‍सा, बाहरी दुनियाओं में बहुत व्‍याप नहीं पाता, आज़ादी के दस सालों में भाषा का घरघुस्‍स—घिस्‍सू, परंपरा-पिटा और अपने चिथड़ों में बंद वह चित्र जो कवि ने खींचा था, अभी भी व्‍यर्थ नहीं हुआ है.. दूसरी ज़बानों के नाविलनिगार ‘मेरा नाम लाल’ की महीन और ‘अंडरवर्ल्‍ड’ की ज़हीन, महत्‍वाकांक्षी यात्राओं पर निकल जाते हैं, हमारी ज़बान का मुसन्निफ़ (राइटर) अभी भी मुतवस्‍त (औसत दर्जा) की तरबियत (शिक्षा-दीक्षा) के रघ्‍घुओं और रेहनों के तरक़्क़ीपसंद मुतालों (पुस्‍तक-पठन) में खुशमंद और बंद रहता है.. ‘कई चांद थे सरे आसमां’ की तारीफ़ में इंतज़ार हुसैन एक वाक्‍य कहते हैं, “शोधकर्ता फ़ारूक़ी यहां पर उपन्‍यासकार फ़ारूक़ी को पूरी-पूरी कुमक पहुंचा रहा है.” हिंदी का लेखक अपना सारा शोधकर्म लघुपत्रिकाओं के पुराने अंकों और सातवीं में अपने साथ पढ़े यारों से जिरहबाजी में दुरुस्‍त कर लेता है, र.स. की दुहाजू की नई मेहरार की मानिंद, हिंदी में लिखनेवाले की रचना-यात्रा पत्रिका में छपवाने के लिए लिखे लेखमाला सीरिज़ के लिए होती हो तो हो, वास्‍तविक और दिमाग़ी जीवन में नहीं होती, अट्ठारह साल की उम्र में कस्‍बे और देहात के जिन अंतरंग तिलकुट बिम्‍बों के साथ पहली छपाइयों के वह मैदान मारता मार लेता है, चौंसठ की उम्र पहुंचने पर भी वह उन्‍हीं मैदानों के गिर्द, ‘देखो, दौड़ रहा हूं, कितना अच्‍छा, अहा, लालित्‍यपूर्ण दौड़ रहा हूं! तरक़्क़ीपसंदगी में दौड़ रहा हूं!’ का बाजा बजाता दिखता है, उससे परे की दुनिया भले इस दरमियान सिर के बल खड़ी हो गई हो, लिखनेवाले को अपने अवचेतन, दु:स्‍वप्‍नों और रोज़-बरोज़ के जीवन में उससे दो-चार होना भी पड़ता हो, उसकी अफ़सानानिगारी अहदी[1] की तनख़ाह में खुश रहती है, ‘अंधेरे में’ उतरने का डील, हसरत और हौसला नहीं रखती, न ऐसे कोई ऊंचे अरमान पालती है..
लेखक अंधेरों में नहीं उतरना चाहता. जानता है वह अंधेरे की असलियत, अंधेरे में सिर्फ़ अंधेरा होता है, विचार और विवेक का संस्‍कार जिन समाजों में नहीं गुज़रता, ज़ाहिर है वह अंधेरों के विमर्श को भी ठीक रौशन नहीं करेगा. सलमान रुश्‍दी के पक्ष और विपक्ष के ‘हू’ और ‘हा’ को पहचानेगा, नमिता गोखले और डैरलिंपलों के तमाशों और संस्‍कृति मेलों के सेलेब्रेटीज़ की फोटुएं उतारेगा, अरविंद कृष्‍ण महरोत्रा के ‘‍साहित्यिक संस्‍कृति’ के विमर्श के पन्‍ने खुलेंगे तो चट उस पर चूतड़ दाबकर बैठ जाएगा, बैठा रहेगा. सोचनेवाली बात है देश के दूसरे हिस्‍सों में होता हो तो हो, हिंदी पत्रिकाओं के लघुकाय संसार में विज्ञमूढ़ कितनाहू गाल बजावें, हिन्‍दी का साहित्यिक समाज कहां है, नहीं है. हिन्‍दी का अध्‍यापक है, पत्रिका संपादक, प्रकाशक, हिन्‍दी अधिकारी और अट्ठारह गुट के साढ़े तीन सौ सदस्‍य और सोशल नेटवर्क पर आठ सौ मेम्‍बरानों की हुलूलू के हंसोड़ कारनामे और खुद की तारीफ़ वाली फोटोकारियां, कारगुज़ारियां हैं, साहित्‍य का स्‍वायत्‍त विचार-संपन्‍न समाज हो ऐसा कोई समाज नहीं है. हिंदी लेखक की सारी तरक़्क़ीपसंदगी स्‍टाफ़रुम की अलमारी में रखी उसकी वो निजी चिमरख बंडी है जो उसके परिवार के बाहर समाज तक में तो दूर, खुद परिवार के भीतर भी गुप्‍तरोग की ही तरह मौज़ूद है. खुद लेखक किस महाकाय गुप्‍तरोग का नाम है उसे ख़बर नहीं, न ही यह बतानेवाला कोई मित्र उसके नज़दीक खड़ा है. क्‍योंकि लेखक के नज़दीक जो खड़े हैं वे यूं भी अडोलस्थिति के अनुचर, चेले, शिष्‍य, गुटपंथी, बकलोल तमाशाई हैं, मित्र कतई नहीं हैं. मित्र कहीं नहीं है. जैसे लुगदी साहित्‍य है समाज नहीं है. ‘मेरा नाम लाल’ और ‘बर्फ़’ जैसे महीन पाठों का जंजाल होने का भी, इसीलिए, क्‍या तुक है? यारबाशों के हाथ में किलकने, उछलने, खिलने और खेलने की बालसुलभ किलकारियां हैं..
लेखक बदहवासी में अमरीकी नाविलनिगार से घबराया सवाल करता है, “ऐसे साहित्‍त सेज़ पर फिर अरमान सजाने के क्‍या माने, तू ही किसके लिए लिखते हो?” जवाब ई-मेल से काफ़ी मुद्दत बाद सामने खड़ा होता है, “Listen, Mr. Laddoo, when my head is in the typewriter the last thing on my mind is some imaginary reader. I don’t have an audience; I have a set of standards. But when I think of my work out in the world, written and published, I like to imagine it’s being read by some stranger somewhere who doesn’t have anyone around him to talk to about books and writing—maybe a would-be writer, maybe a little lonely, who depends on a certain kind of writing to make him feel more comfortable in the world.”
डैमिट्ट. डैम इट, डैम इट.
“And, as of novel, let me add a few lines more.. The novel’s not dead, it’s not even seriously injured, but I do think we’re working in the margins, working in the shadows of the novel’s greatness and influence. There’s plenty of impressive talent around, and there’s strong evidence that younger writers are moving into history, finding broader themes. But when we talk about the novel we have to consider the culture in which it operates. Everything in the culture argues against the novel, particularly the novel that tries to be equal to the complexities and excesses of the culture. This is why books such as JR and Harlot’s Ghost and Gravity’s Rainbow and The Public Burning are important—to name just four. They offer many pleasures without making concessions to the middle-range reader, and they absorb and incorporate the culture instead of catering to it. And there’s the work of Robert Stone and Joan Didion, who are both writers of conscience and painstaking workers of the sentence and paragraph. I don’t want to list names because lists are a form of cultural hysteria, but I have to mention Blood Meridian for its beauty and its honor. These books and writers show us that the novel is still spacious enough and brave enough to encompass enormous areas of experience. We have a rich literature. But sometimes it’s a literature too ready to be neutralized, to be incorporated into the ambient noise. This is why we need the writer in opposition, the novelist who writes against power, who writes against the corporation or the state or the whole apparatus of assimilation. We’re all one beat away from becoming elevator music.”
लेखक चेहरे पर उल्‍टे हाथ धरे, आंखें मूंदे एक दूसरे अमरीकी के लिखे लेख की सोचना चाहता है- 'क्‍यों लिखें' की ही सोचना है- मगर तब तक दबे पांव सुचित्रा कान पर झुकी फुसफुसाती ख़बरदार करती है, “अंदर डाक्‍टर बुला रहे हैं!”

[1]. बादशाही ज़माने में वे लोग जो घर बैठे बेखिदमत तनख़ा पाते थे; अब बेकार, सुस्‍त, आलसी की शक्‍लों में पहचाने जाते हैं.

3 comments:

  1. "“Listen, Mr. Laddoo, when my head is in the typewriter the last thing on my mind is some imaginary reader. I don’t have an audience; I have a set of standards. But when I think of my work out in the world, written and published, I like to imagine it’s being read by some stranger somewhere who doesn’t have anyone around him to talk to about books and writing—maybe a would-be writer, maybe a little lonely, who depends on a certain kind of writing to make him feel more comfortable in the world.”
    What else is desired?

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  2. तो आपको रेहन पर रग्घू घटिया लगा। इसे पुरस्कार भी मिला है, शायद इसीलिए आप इतने खीज रहे हैं।

    मैंने इसे पढ़ा तो नहीं है, पर इसके लेखक की टिप्पणी थी कि 'काशी का अस्सी' मेरा नगर था मगर 'रेहन पर रग्घू' मेरा घर है।

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