Wednesday, February 8, 2012

शहर में ठिकाना..

क्या बतायें कहां हैं, शहर पीठ पर है कि उंगलियों, पसलियों, बेचैनियों में दौड़ता, गरदन पर सवार कौन है तुम बताओ.

हाथ थामकर कब देखा था आख़ि‍री बार, आंख दाबकर, कांपती पिंडलियों में एक अघटित दौड़ मची फिरती, ख़ून धमनियों में, तेल के पीपों की जलती हवायें हैं, तिलिस्मी तीतर-बटेर, मैं जागी नींद चीख़ता बताओ बताओ, तुम एक दरवाज़े से निकल दूसरे में दाखिल होते, बिपाशा बसु अख़बार में हंसती लहकती कितनी एकदम ‘फट्टू’ है, धुएं में एक कोई काफ़ि‍ला गुज़रा जाता, सारंगिए की तान कोई पुलिस बद्ज़ुबान, धूल की बारिशों नहाये चंद पेड़, गुज़रते तुम.


रोज़ मिलते हो, हाथ उठाये, थपकियों की दुलार में अलसाये, दोस्त़-ओ-दुश्मन कौन हो, संगाती? जानता हूं तुमको उतना ही जितना शहर जानता हूं, पेंचो-ख़म बेदम, शहर कितना कम जानता हूं, उस अंधियाये कमरे के कोने धरे काग़ज़ों के अंबार में जो अनलिखा बाक़ी इतिहास हुआ उसके घावो-मरहम, प्रियवर, कौन जानता है?

घर दूर है अभी, घर हमेशा रहता आया दूर-दूर, ढेरों घेरों, घिरनों कुएं कड़ाह कबाड़ि‍यों मनहारियों सीढ़ि‍यों सांप की बांबी सियाहियों के पार पकड़ आता है कभी घर, जैसे कभी सपने में दीखते सच्चे हम, बेचारा मार-खारा मगर घर हारा तब भी तो कितना अकुलाया, लजाया अपने में सकुचाया हुआ, नंगी पीठ की अरेड़ों औ’ कंधे के मरोड़ों पीठ मोड़े अंधेरे मैं बैठा रहता, नींद में बुदबुदाता क्या बतायें कहां हैं, तुम कहां हो कौन, वह जगह इस शहर में नहीं हम जहां हैं.

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना। धन्यवाद।

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  2. कल 30/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. सार्थक रचना...

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