Wednesday, February 8, 2012

सड़क पे गिरे, उड़ते हुए..

“वेवज़ह मेरे पीछे सर फोड़ते रहते हो, चुपचाप की अदेखी यात्रा हूं, ज़ि‍रह की बजती बंसी कहां हूं, नहीं हूं?” शहर के चुप्‍प शोर में जुसेप्‍पे की शरीफ़ शिकायत सुन पड़ती, दिमाग़ी दूर देहातों की पीली सांझ, काठ के पुराने घिसे आईने में धुंधले अक़्स तैरते, “वेर्गा को पढ़ो, वहीं अंतरंग दिखेगा, साहित्‍य का आलोक, मैं भी जितना होऊंगा, तुम्‍हारा कुल्‍ली भाट, वहीं दिक्‍खूंगा.”

शहर की चोटखाई पसलियां, भरी सड़क पर कसकती सरकती, कुछ दूर जाकर फिर अटकती हैं, ताबड़तोड़ एक लड़का मोबाइल पर भिन्‍नाता है, कार की एक खिड़की बाजा सुनाती. दुपहिये की पिछले सीट के मुहाने धंसी एक औरत अपने बच्‍चे के खुले कसमसाहट पर कपड़ा डालती, मैं भीड़ में फिर ख़यालों की अपनी हांक उड़ाता, “जुसेप्‍पे, कारो मियो, तुम हमें फुसलाओ नहीं, बताओ, पेर फावोरे, इन बेसबबी बेहया नागर धंसानों में छितराये हमारे जीवन की परती-परिकथा का सुरा, ससुरा टेक्‍स्‍ट कहां है? सब दीवार पर सर फोड़ती ज़ि‍रहमुक्‍त आलोक की कविताओं की औरतें नहीं, दीवार के आगे खड़े खुद से कही बातें, जिनके शब्‍द तुमने दिये हैं, हमारे साथ की गढ़ी बातें, हमारे अंतरंग की गुफ़्तगू, हवा में तैरा तिरता फिरता है, हमारी संगतों के जीवन्‍त गुफ़्तगुओं की वाजिब तवक़्क़ो (उम्‍मीद) और तसनीफ़ (लिखाई) में नहीं बदलता, उस ख़ामोश चाबुक की चमकार तुम तक नहीं पहुंचती?”
“नहीं, बच्‍चों की नेह, पहाड़ की वादियों पर रपटते-गिरते मेमन छौनों का दुलार, तमारा से दूर हुए छूटे सब मेरे प्‍यार मुझ तक कहां पहुंचते हैं, मेरी कनपटियों पर सी ऑफ़ मारमारा की सनसनाती हवायें दौड़तीं, रसोई के छोटे स्‍पीकर पर जॉन कॉल्‍त्रेन की हूकती नातें, मन कहीं अनातोलिया के आवारा सैरों में घुला-भूला, अंगूरी बेलों भरे भारी महक के किसी सिसिलियन देहात में मेरी चेतनता छितराई, टीवी के परदे म्‍यूट में चलता किसी इंडिपेंडेंट चैनल पर किसी तुरुक पुरईन का फ़साना डोलता, थिरता, उंगलियों पर बर्फानी सर्द चढ़ी हुई, कहां कैसे किधर सुनूंगा कोई और गुफ़्तगू, पिटुंगा और किसी फटकार, बताओ?”
सड़क के पार कोई पुरानी इमारत है जिसकी दीवारें ढहाई जातीं, फिर किसी नये बाज़ार की ज़मीन बनाई जाती, कमीज़बंद मेरी सुन्‍न पसलियों में दौड़ता है कोई छौना कछुआ, पंजे मारता, ठुनकता, सन्‍न होता, मुझे सुन्‍न करता, “दद्दू, गुफ़्तगू के मैदान, हमरे भींजे मन की जान, कहां है कहां है? बचा-बचाके चल रहे हो, मुझे जीते-जी निगल रहे हो?”
सड़क पर गाड़ि‍यां सरकती हैं, हवाओं पर फिर धूल का एक रेला चढ़ता है, धूल उतरने पर विकराल झंझड़ का सिलसिला दीखता है, छौना कछुआ और जुसेप्‍पे की आवाज़ कहां फिरती है, एक मेरा मींजा दिल तक नहीं दिखता..

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