Sunday, March 18, 2012

खैर मनाता..


इतना ज़रा ज़ोर होता कि देह का दरकना नहीं देखते, सुनते बटुये का न खनकना
निकल आते दरवाज़े दायरे शहर से बाहर, किसी और शहर-समय में होते
कोई और शहर हममें चमकता, त्वचा पर कोई और तीलियां चटकतीं
जलातीं, खाक़ होने का इतना एक ज़रा अलग तरीका सुझातीं
इतनी थोड़ी बेअकली होती कि दो कुरतों के झोले में
दांत बहरियाये, झोले में ज़िंदगी झौंसाये ठिकाने टोहते
तुमरे ठीया पहुंच जाते, खुद का गमकना देखते, बेबात हंसना
शर्मिंदगी की तीर इक ज़रा सी लकीर पर लहराये थिरकना
कहते बहुत बहुत बहुत सारा फिर भी अनकहा रहता
बीच पानी चुप्प थिर शरीर मानो रहता अनबहा
कि बेअकली काम आती नहीं ज़ोर जमता नहीं
अकल खुलता और बेवक़ूफी बोलती, मैं सिर नवाये
चीन की दीवार के उस पार बुदबुदाता, अच्छा हुआ
अपनी ख़ैर मनाता मैं इस दरवाज़े से बाहर कहीं नहीं जाता.

Saturday, March 17, 2012

अंधेरे में बाजा..

फिर पॉडकास्‍ट. बहुत हुआ कि कवने मुंह क्‍या रिकार्ड करें, और कर लें तो मटिरियल कहां होस्‍ट करें, कवने प्‍लेयर पर बजाये, बजवाये की सहूलत रहे.. मतलब टंटे रहते हैं तो टंटों का अंत फिर कहां रहता है, नहीं ही रहता. रबीजी रतलामीजी और अपने बीकास बेहारी से मदद का दरखास्‍तो किये तो पता चला दोनों मुंह पर बुरका चढ़ाये मध्‍ध परदेस के मुरैना में लापता हैं. ख़ैर, गरीब के रंगीन झोला न होगा तब्‍बो फटुली में तरकारी कीने त निकले सकता है, हम्‍मो निकल लिये हैं, पीछे लेडी सैकिल पे बबुनी दरभंगा कोमारी हैइये हैं, होस्टिन सैट आरकाइव आर्ग है, प्‍लेयर भी ससुर उन्‍हींये के हियां का है. दू ठो पाडकास्‍ट है, एक पतनशील है, दूसरे के बारे में असमंजासाये कह सकते हैं लगनशील है.



Wednesday, March 14, 2012

बिपत दिनेर बलाबली..

एक

मैं भर पाया. बांह मोड़कर कंधा खुजाते खुदी से बुदबुदाते मैले कपड़ों का गट्ठर बनाते यह कर लेंगे और उसमें वह धर देंगे के तिलकुट बुनावट बुनते मैं भर आया. चप्‍पल चटकाये ज़रा बाहर झांक आये इनको यह कह दिया उनका वह सुन लिया कमर सीधी की पिंडलियां चटकाई घर की बासी तरकारी चख ली ख़्यालों का अदहन सूंघ लिया उनींदे कुछ कुलबुलाये सूने दरवाज़े कई थपथपाये लहककर जगे और जागे की चौंक में थरथराये से मैं भर पाया. मुश्किल नहीं है सीख लेंगे तीन ज़बान और हो लेंगे अभी इतना कुरबान और का मीठा नशीला नोटबुक में टांक लिया चार अज़ीज़ सपने निकाले और फटी कमीज़ से सजीला वह पतीला ढांप लिया हंसकर उमगने लगे जाने किसके बाबा की बताई सीढ़ि‍यां चढ़ने, लपककर सीढ़ि‍यां चढ़ने से मैं भर आया. फेसबुक की बकलोलियों से. मैं भर पाया.

दो

इतनी सी थी बात. इतनी सी पर तुमने कितने दिन खराब किये. मैंने एक समूची ज़ि‍न्‍दगी.

तीन

मिलेगा कुछ तो साथ रहना कभी कहा होगा नशे में तुमने भी नशे में ही सुना होगा. और मिलने से ज़्यादा नशे के ही बसर में एक यह उम्र तुमने तमाम की कि जाने क्‍या कब कुछ तो मिलेगा जो जाने क्‍या कब कुछ कहां से मिलता. अलबत्‍ता मैं कभी शर्मिन्‍दगी और उससे कहीं ज्यादा थेथरई के नशे में आंखें मूंदे हंसता रहा, एक पूरी उम्र बहलता.

Wednesday, March 7, 2012

मेला मेला

कोई तो होता होगा, किताबों के पिटे सतरंगी मेलों, रात तीसरे पहर के झमेलों में, बगल से गुनता कुछ गुनगुना जाता होगा; दुपहरिया के अंधेरों की थाह सुझाता, थके पैरों को इतनी ठांह, के झिलमिल ज़रा भर ही सही, इशारे कुछ बता जाता होगा? गुलज़ारी गीत वृंद होंगे, या कक्षा नौ का भाषायी टेक्‍स्‍टबुकीय पाठ, इससे बाहर सखा संसार, नेह-ओ-दुलार, उंगलियां पकड़ कुछ दूर लिये टहल का सुरीला नहीं थिरकेगा कहीं? तुम नहीं दीखोगे, कहीं? किसी स्टॉल प्रकाशक के किसी गुप्त बेमतलब भभ्भड़ में, कामू के अजनबी पन्नों, किसी आजिज सियाही धुली छपाई, अपहचानी रचाई में? कहीं तो, कोई तो होगे तुम, मेरे अपने, व्यो‍मकेश दरवेश, पकड़ आते नहीं, गुरुई सुझाते नहीं, क्या मिलता है इस धूप-छांही में इतना दिल दुखाते, इतने नज़दीक रहते कि नज़र नहीं आते हो..