Wednesday, March 7, 2012

मेला मेला

कोई तो होता होगा, किताबों के पिटे सतरंगी मेलों, रात तीसरे पहर के झमेलों में, बगल से गुनता कुछ गुनगुना जाता होगा; दुपहरिया के अंधेरों की थाह सुझाता, थके पैरों को इतनी ठांह, के झिलमिल ज़रा भर ही सही, इशारे कुछ बता जाता होगा? गुलज़ारी गीत वृंद होंगे, या कक्षा नौ का भाषायी टेक्‍स्‍टबुकीय पाठ, इससे बाहर सखा संसार, नेह-ओ-दुलार, उंगलियां पकड़ कुछ दूर लिये टहल का सुरीला नहीं थिरकेगा कहीं? तुम नहीं दीखोगे, कहीं? किसी स्टॉल प्रकाशक के किसी गुप्त बेमतलब भभ्भड़ में, कामू के अजनबी पन्नों, किसी आजिज सियाही धुली छपाई, अपहचानी रचाई में? कहीं तो, कोई तो होगे तुम, मेरे अपने, व्यो‍मकेश दरवेश, पकड़ आते नहीं, गुरुई सुझाते नहीं, क्या मिलता है इस धूप-छांही में इतना दिल दुखाते, इतने नज़दीक रहते कि नज़र नहीं आते हो..

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