Wednesday, March 14, 2012

बिपत दिनेर बलाबली..

एक

मैं भर पाया. बांह मोड़कर कंधा खुजाते खुदी से बुदबुदाते मैले कपड़ों का गट्ठर बनाते यह कर लेंगे और उसमें वह धर देंगे के तिलकुट बुनावट बुनते मैं भर आया. चप्‍पल चटकाये ज़रा बाहर झांक आये इनको यह कह दिया उनका वह सुन लिया कमर सीधी की पिंडलियां चटकाई घर की बासी तरकारी चख ली ख़्यालों का अदहन सूंघ लिया उनींदे कुछ कुलबुलाये सूने दरवाज़े कई थपथपाये लहककर जगे और जागे की चौंक में थरथराये से मैं भर पाया. मुश्किल नहीं है सीख लेंगे तीन ज़बान और हो लेंगे अभी इतना कुरबान और का मीठा नशीला नोटबुक में टांक लिया चार अज़ीज़ सपने निकाले और फटी कमीज़ से सजीला वह पतीला ढांप लिया हंसकर उमगने लगे जाने किसके बाबा की बताई सीढ़ि‍यां चढ़ने, लपककर सीढ़ि‍यां चढ़ने से मैं भर आया. फेसबुक की बकलोलियों से. मैं भर पाया.

दो

इतनी सी थी बात. इतनी सी पर तुमने कितने दिन खराब किये. मैंने एक समूची ज़ि‍न्‍दगी.

तीन

मिलेगा कुछ तो साथ रहना कभी कहा होगा नशे में तुमने भी नशे में ही सुना होगा. और मिलने से ज़्यादा नशे के ही बसर में एक यह उम्र तुमने तमाम की कि जाने क्‍या कब कुछ तो मिलेगा जो जाने क्‍या कब कुछ कहां से मिलता. अलबत्‍ता मैं कभी शर्मिन्‍दगी और उससे कहीं ज्यादा थेथरई के नशे में आंखें मूंदे हंसता रहा, एक पूरी उम्र बहलता.

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