Saturday, March 17, 2012

अंधेरे में बाजा..

फिर पॉडकास्‍ट. बहुत हुआ कि कवने मुंह क्‍या रिकार्ड करें, और कर लें तो मटिरियल कहां होस्‍ट करें, कवने प्‍लेयर पर बजाये, बजवाये की सहूलत रहे.. मतलब टंटे रहते हैं तो टंटों का अंत फिर कहां रहता है, नहीं ही रहता. रबीजी रतलामीजी और अपने बीकास बेहारी से मदद का दरखास्‍तो किये तो पता चला दोनों मुंह पर बुरका चढ़ाये मध्‍ध परदेस के मुरैना में लापता हैं. ख़ैर, गरीब के रंगीन झोला न होगा तब्‍बो फटुली में तरकारी कीने त निकले सकता है, हम्‍मो निकल लिये हैं, पीछे लेडी सैकिल पे बबुनी दरभंगा कोमारी हैइये हैं, होस्टिन सैट आरकाइव आर्ग है, प्‍लेयर भी ससुर उन्‍हींये के हियां का है. दू ठो पाडकास्‍ट है, एक पतनशील है, दूसरे के बारे में असमंजासाये कह सकते हैं लगनशील है.



4 comments:

  1. चकाचक पॉडकास्ट है।

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  2. bahut badhiya...black humor se labrez

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  3. कई बार सुना बार बार आँखें नम हुईं!

    अभी लिख रहे हैं, सादर चरणस्पर्श! कौन जाने जीवन में कभी साक्षात् आपके दर्शन भी हों, और हमें चरणस्पर्श करने का सच में सौभाग्य भी मिले!
    तब तक यहीं है... अज़दक की अलमारी से एक एक पन्ना निकालते पढ़ते हुए...

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  4. अँधेरा लेकिन है... बहुत सारा अँधेरा है,
    ***
    ये शब्द कल से ही साथ थे और बहुत सच लग रहे थे!
    भाषा सीखी है, तो यहाँ की कवितायेँ पढ़ते रहते हैं... उन्हें अपने लिए अपनी भाषा में सहेजते रहते हैं. एक स्वीडिश कविता पढ़ी कल उसका अनुवाद किया, जैसे लगनशील वाली पॉडकास्ट ही ले गयी हो हमें उस कविता तक और पॉडकास्ट की जीवंत आवाजों ने ही हमसे यह अनुवाद करवाया हो...
    नील्स फर्लिन की कविता कहती है::

    उन्होंने कहा है कि फूल खिलेंगे
    --- अँधेरे में और बर्फ़ में
    जितनी भी रौशनी देखी हमने स्वप्न में
    सब होगी फल में परिवर्तित और होगी स्पंदित बीज में.
    उन्होंने कहा है कि फूल खिलेंगे
    जैसे कि खिलते हैं सनौबर और नींबू के पेड़ों के इर्द गिर्द.
    लेकिन उनके हाथ खाली हैं
    और उनकी आँखें अंधीं.

    यहाँ तो इतनी समृद्धि है, बाजा अँधेरे में होगा..., पर बज तो रहा है पूरी निष्ठा से, जो आये ले जाए अपने लिए यहाँ से रौशनी!
    इसी रौशनी ने, इसी बाजे ने हमें कवि की इन पंक्तियों के प्रति आश्वस्त किया
    कि फूल खिलेंगे अँधेरे में...!

    इस श्रेय के लिए कोटि कोटि आभार!

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