Mar 18, 2012

खैर मनाता..


इतना ज़रा ज़ोर होता कि देह का दरकना नहीं देखते, सुनते बटुये का न खनकना
निकल आते दरवाज़े दायरे शहर से बाहर, किसी और शहर-समय में होते
कोई और शहर हममें चमकता, त्वचा पर कोई और तीलियां चटकतीं
जलातीं, खाक़ होने का इतना एक ज़रा अलग तरीका सुझातीं
इतनी थोड़ी बेअकली होती कि दो कुरतों के झोले में
दांत बहरियाये, झोले में ज़िंदगी झौंसाये ठिकाने टोहते
तुमरे ठीया पहुंच जाते, खुद का गमकना देखते, बेबात हंसना
शर्मिंदगी की तीर इक ज़रा सी लकीर पर लहराये थिरकना
कहते बहुत बहुत बहुत सारा फिर भी अनकहा रहता
बीच पानी चुप्प थिर शरीर मानो रहता अनबहा
कि बेअकली काम आती नहीं ज़ोर जमता नहीं
अकल खुलता और बेवक़ूफी बोलती, मैं सिर नवाये
चीन की दीवार के उस पार बुदबुदाता, अच्छा हुआ
अपनी ख़ैर मनाता मैं इस दरवाज़े से बाहर कहीं नहीं जाता.

4 comments:

Pratyaksha said...

आखिरकार सही हुआ नक्शा लगता है , सार्थक किया कल का दिन

mridula pradhan said...

bahut achcha likhe hain.....

अभय तिवारी said...

कुछ-कुछ मेरी सी बात.. मेरे ही दिल की बात..

Ek ziddi dhun said...

कुछ समझा, कुछ समझ न पाया, पर नक्शा दिल के करीब ही ठहरा।