Thursday, April 12, 2012

सांझतारे की रात..

सलोना एक शब्द ही है, टोटल गप्‍प
सहेजकर जिसे सिरहाने रखता हूं
रात-बिरात उनींदे टटोलता, उंगलियों में बोलता
का हो, पाजी, हव्वs कि फरार हुए?
इमली, ईनार, इक्कों के पार के अजनबी अंधेरों में
गवैयों के तबेलों औ’ कलमचियों के मेलों में
कितनी मर्तबा गुम हुआ

कि पहुंचते ही जी धक्क हुआ
मुट्ठी भींचे घबराये कुम्हलाये हदसकर
पूछा कितनी बार फुसफुसाये
का हो, पाजी, हव्वs कि फरार हुए?

सलोना जी मगर कब्ब कुच्छौ बोले हैं.

3 comments:

  1. आपने सलोना रखा है और हमने सलोनी। दोनों की यही कहानी है।

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