Sunday, April 15, 2012

नॉक नॉक, हू इस देयर?



बुनकी का रोते-रोते दिल सूज गया है. उसके लाल फूल वाले रिबन की चोरी हो गई है. जबकि मनोज के पेट में इतना दरद उठ रहा था, रो-रोकर बच्‍चा का बुरा हाल, तब्‍बो मन्‍नो मौसी से कान उमेंठवा कर स्‍कूल जाये से जवान को छुट्टी कहां मिली, नहींये मिली. और इसके ललखोर चढ़ा है! रोती रहो, बुच्‍ची, जादा देर नहीं है, लप्‍पड़ का प्रसाद चहुंप रहा है तुमरो रस्‍ते. खाली हो लेने दो मन्‍नो मौसी को सिल-बट्टा पर मेथी, धनिया, हल्‍दी, आदी और लहसुन का कुचाई से. मगर पीढ़ा पर बैठी मन्‍नो मौसी ठेहुना तक साड़ी उठाये, गोड़ के बीच दाबे बट्टा पर एक हाथ टिकायी हैं, दुसरका तो गोदी में धरे चुप्‍पे लगायी हैं, कि गेलु दास के रेडियो से उड़ रहा सहगलजी के गजल पर मचल रही हैं, कवनो मसाला पीस रही हैं, जी?

मेरी तबीयत हो रही है सूप की फटकन लेकर गौरी चाची बरामदे से हटें कि मैं इस लड़की के एक लात लगाऊं. तीन पैर की लंगड़ी बिलार लखेदता हुआ मैं तीन मर्तबा अंगने में भागा, मेरे पीछे-पीछे कनिया बो का बुचकन, मगर बुनकी की रोवाई की मुरझाई हवा में हमरे खेले की ओर किसी का ध्‍यान न गया. लइकी को लात लगाये बिना आज रहना नहीं है! ब्रूस ली की तरह हवा में उछलकर, घूमकर वह गिरुंगा कि बुनकिया भां-भां करके ढेर हो जायेगी. हवा में उछलने की एक हड़बड़ रिहर्सल करता हूं, माथा खंभे से टकराते-टकराते बचता है, आंखों का अंधेरा अभी ठीक से साफ़ हुआ भी नहीं कि दीवार पर एकदम सामने तेजी से एक छिपकिली दूसरे का पीछा करती दिखती है, मैं मुंह में कलेजा लिये छत की तंग सीढ़ि‍यां दौड़ता दीखता हूं. मां सरबदया आंटी के साथ उनकी पुरानी साड़ी पर स्‍टील के कठवत से चने की बड़ी काढ़ रही है. एकदम लहराकर अम्‍मा पर गिरा हूं लेकिन अपने बतकुच्‍चन में बझी औरत को कवनो होश है? सुबह से चौथी बार है कि मेरा दिल टूट जाता है.

‘छिपकिल्‍ली के चार गो टुकड़ा कै के तुमरा आगे धै देंगे, तब्‍ब हमरा बात सुनोगी?’ चीखकर कहता हूं तब भी मां मेरी ओर नहीं देखती.

सरबदया आंटी हाथ का कचकड़ा बजाकर मुझे आगाह करती हैं, ‘छिपकिली के मारेगा तो पाप पड़ेगा, जानो तोS?’

‘तो अपना घरे देवाली पे ले के जाइये ना, सजाइये हुएं!’

अबकी मां आंख फाड़कर मुझे देखती है, और बड़ी-बूड़ा हाथ कठवत से बाहर करके हवा में नचाती मुझे डराने की कोशिश करती है, ‘अभींये चैली से एतना मारेंगे कि ठेहुना और लीलार फूट जाएगा, बात करे का कवनो अकिल है कि नहीं? भाग के सुदामा के हियां से जाके मुट्ठी भर इमली ले के आ, जा?’

‘घेंवड़ा लायेंगे,’ मां से डेढ़ कदम की दूरी बनाकर मैंने ऐलान किया, ‘सुदामा के हियां जायेंगे, न दूध पियेंगे, ज्‍जा!’ और सीढ़ि‍यां फलांगता मैं वापस खंभे के सामने वाली दीवार के सामने था, छिपकिलियों का कहीं पता नहीं था, मगर हरामखोर बुनकी अभी भी बुलके सजा रही थी!

***

बुन्‍नू भैया के आगे बेल का शरबत धरा हुआ है, मगर वो उसे हाथ नहीं लगा रहे. मालूम नहीं बुन्‍नू भैया का माथा कहां अटक जाता है. और अटक जाता है तो वहीं अटके रहता है.

गोबर्द्धन परिड़ा और बुन्‍नू भैया पुराने संगी हैं. इंजीनियरिंग कालेजों का एंट्रेस एक्‍ज़ाम दोनों साथ-साथ देते. सेलेक्‍शन हो जाने के बाद गोबर्द्धन कुन्‍नूर चला गया था, बुन्‍नू भैया कहीं नहीं गए. अब उनकी अलमारी में किताबों की ढेरी रहती है (और बकौल शांति चाची, कपार में भूसा!)..

बुन्‍नू भैया: ‘कहीं कोई कनेक्‍ट नहीं है. किसी का किसी से नहीं है. सेल्‍फ़ इंटरेस्‍ट है, इससे अलग और कोई वैल्‍यू नहीं है. सेल्‍फ़ प्रोमोशन से अलग परश्‍यू करने के लिए सोसायटी में कोई सपना नहीं है; दोस्तियां, सांठ-गांठ सब स्‍वार्थ-सिद्धि के इसी बेसिक मोटिव के पीछे हैं, कितना देना पड़ रहा है, कितना पा रहा हूं, कंटिन्‍युअस हिसाब-किताब, यू अंडरस्‍टैंड? मुझे तो यही दीखता है, दोस्‍त, इससे अलग कोई समाज होगा तो मुझे तो नहीं दीखता. कब आया था अल-बेरुनी, ऐसे ही हमारी खबर लेकर नहीं गया, कि गोबर की पूजा करते हैं, और सभ्‍यता के जो वास्‍तविक मणि-रत्‍न हैं उसे गोबर बनाकर रखते हैं! अल-बेरुनी के पीछे और भी आये होंगे, उनके पास भी वही कहानी होती है कि सुनकर तुम्‍हारा सिर शर्म से झुक जाये..’

गोबर्द्धन परिड़ा: ‘राय का हम ‘नायोक’ देख रहा था, अरिंदम मुखोपाध्‍याय, वो उत्‍तम कुमारेर खेला, मने पड़े तो? वो कैसा हीरो है, सेल्‍फ सेंटार्ड, सेल्‍फ इंडालजेंट, उसी के माफिक लोकS गुलS तो सोसायटी में पूजित होइछंति, वइसा ही तो सोसायटी हेबS, नाहीं क्‍या?’

मैं: ‘शरबत नहीं पीजियेगा, भैया?’

बुन्‍नू भैया मेरी बात का जवाब नहीं देते. शायद वैसे ही जैसे मैं भी बुनकी को लात कहां लगा पाता हूं.

सेक्‍टर चार वाले मैच के लिए रंजन की जगह बापी का सेलेक्‍शन हुआ है. मतलब रंजन मैच के दिन नहीं जायेंगे, न मुझे जाने का मौका मिलेगा. सोनाली ‘नदिया का पार’ का कैसेट लेकर आई है, मैं पूछता हूं इसके बाद ‘पहेली’ का लायेगी, दीदी? दीदी मुझे आंख बनाकर ऐसे देखती है मानो उसका सारा स्‍नो तीन गोड़ की लंगड़ बिलार पर मैंने ही खरच किया हो! क्‍या हरमपंती है.

अम्‍मा छत से चेहरा निकालकर चीखती है, ‘तुम सुदामा के हियां अभी ले नहीं गए? आयें हम नीचे?’

मैं गोड़ पटकता घर से बाहर आता हूं, मगर इमली के पेड़ के नीचे से फिर कहां जाता हूं इसकी मुझको क्‍या, किसी को याद नहीं है.

(बाकी..)

1 comment:

  1. नॉक नॉक, हू इस देयर?
    ***
    It's me here....
    turning the pages, reading and trying to understand the interesting tales that have so much to say...!

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