Monday, April 23, 2012

मंडीमूढ़ में नाम गिनाना..


मालूम नहीं आज फकीरमोहन होते तो कैसा आत्‍मजीवनचरित लिख रहे होते, संभवत: अपना लिखने की जगह, दानियेल पेन्‍नाक की तर्ज़ पर, किसी तानाशाही का महीन, कुहरीला चित्र उकेरते होते.. या नागराज के लेखों के संचयन पर एक नज़र फिराने के बाद उड़ि‍या में कुम्‍हलाते, “हम जैसों के कहने को अब क्‍या बचता है, तुम बताओ?” मैं कहता, “गुरुवर सेनापति, क्‍या कह रहे हैं, ऐसा क्‍यों कह रहे हैं, डैरलिंपल जयपुर मेले का हमें न्‍यौता नहीं भेजते, मंडीगढ़ (कहीं किन्‍हीं जगहों में स्‍थानशेष को ‘मंडीमूढ़’ लिखने की प्रवृति भी पायी गई है, मेरे यहां नहीं गई है. पायी. मैं विषपायी रहा होऊंगा?) की अपने को मिस सिंपल कहने, मगर घनघोर टेढ़ा चलनेवाली, प्रताप भानु मेहता की जगह पलाश किशनों को याद करती है, मुझको सिर्फ़ यह बताने के लिए करती है कि हां, हां, कर रही है, याद; तो इतना टेढ़ा तो सिंपल कपाड़ि‍या तक नहीं चलती थी, बावज़ूद इसके मैं मुंह में उंगली चबाने की जगह, उंगली दायें गाल पर धरे, बायें से की-बोर्ड पर उंगलियां चलाता रहता हूं, लजाता, या फेसबुक की दीवार पर सर भिड़ाता नहीं रहता.. क्‍योंकि क्‍या तो वह बदनाम शायर था, उसने लिखा ही है, ‘और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्‍बत के सिवा, तू नहीं न सही, दिल की जेब में चंद टैबलेट्स ही सही’.. संस्‍कृति और संस्‍कृत का मर्सियागान ही सही, साइंस तक का बे-सही.. क्‍या गुरुवर फकीरमोहन, बुरा वक़्त होगा तो बुरे वक़्त का गाना न होगा? मैं पड़पडाया, अटका, सकुचाया, अपनी संजीदगी में अलसाया ढेर गिरा होऊंगा, हमेशा का रहा हूं, और यह इतनी बात समझ भी आती है, मगर आपका कहना कि कैसे चरित लिखें, एकदम नहीं आता, सचमुच.. एक बंगाली लड़का हिमाचल में पांच साल गुज़ारकर एक प्‍यारी डॉक्‍यूमेंटरी सिरज देता है, और आप हैं कि मंडीमूढ़ पर चढ़ने से घबरा रहे हैं?.. चलिए, शुरु होइए?”

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