Monday, April 30, 2012

कबीबर औ' अप्रतिम अरुणिम..

छंददीन, प्राणहीन, सुर-संगीतविहीन अब जो जैसा है, यही है, कसरत में घिसा, काट-पीटकर नि:सृत, सुबह के लड़खड़ाये अकुलाये साहित्‍य-कातर मन निकल आयी, पद्यमयी, नयनों की ठीह औ’ मन की पपीह पर सजाकर, अरुणाचल देश के ओ अप्रतिम अरुणिम पाठक, धन्‍य भरो. और अच्‍छा हो अंधेरे कविता की मनस्‍थली ठुनकते, शिकायती मूंड़ी न ही हिलाओ, फेसबुक के उठे अंगूठे से पसंदियाओ और आगे बढ़ो फिर चाहे भाड़ में जाओ. इससे इतर किसी भी पटरे चलोगे, गहरे उतरकर, भगवान कसम जाने किस गहरे, कविता पाठ की ज़ि‍द करोगे तो यही होगा कि स्‍वयं को बेहया औ’ मेरे कविधर्म को हास्‍यास्‍पद मनवाने की दुष्‍टामी रचोगे. 

हे अरुणिम दुष्‍टधनी पाठक, इतना ज़रा सा तो प्रीत-बंध है हमारे बीच, उससे आगे तुम अगोचर प्रेत ठहरे, क्‍यों किधर के कैसे ठहरे, अल्‍ला कसम, मुझे क्‍या लेना है? और सच पूछो तो रचना ही तीन आलोचकों की आंख में गड़कर कहीं किसी पाठ्यक्रम में चढ़ जाये, अजमेर, लखनऊ, दिल्‍ली से कहीं मेरे लिए दुशाला औ’ दो महीनों का किराया निकाल लाये, इससे ज़्यादा ससुरी कहां जायेगी, उखाड़कर मेरे और बेमतलब तेरे लिए खाक़ क्‍या लायेगी, समाज में जो संस्‍कृति-विभ्रम होना है पहले भी हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍मों के योगदान से ही हो रहा था, आगे भी उन्‍हीं की महिमा में फुदकता चलेगा, विमर्श गढ़ेगा, कविता का विमर्श समाज में नहीं, आलोचकों और साढ़े सोलह पत्रिकाओं के कारिंदों, अधिकारियों की छाती की जेब में फले-फूलेगा. 

बाकी कविता क्‍या है दीवार पर जाने किस ज़माने से टंगी प्रेतबाधा है, बिसरायी, प्रेत सामनेवाले कमरे में मूंगफली टूंगते व्‍हि‍स्‍की पीते, मैं एक काव्‍य-संध्‍या आयोजक से सेकेंड एसी के किराये की बाबत रिरियाया गिड़गिड़ा रहा हूं, कविता चीलमख़ोर कोने में पटाई, दम मार रही है, कुछ नहीं होगा घंटा, मैं बजूंगा, रह-रहकर मुझको बजायेगी, नहीं जानते तो तुम भी जान लो, चैन से गोड़ हिलाते दिल खुजाते हुए मेरा और मेरे कविकर्म की जान पर मत बनो, सरकारी अस्‍पताल का कंपांउडर पीली नीली हरी ठेलता है, मैं लाल लालो-लाल ठेलता हूं, इसी गुदगुदी में प्रसन्‍न कोरस की चहकन रहो, इससे आगे पहुंचने की कामना करोगे तो अप्रतिम अरुणिम तुम रहोगे न कहीं की मेरी कविता रहेगी.


(प्रियवर प्रियंकर और बालसखा संगम के लिए, क्षमाकांक्षा सहित..) 

1 comment:

  1. नमस्ते प्रमोदजी...अरसे बाद..... एक ही साँस में पी जाना अच्छा है...मतलब पढ़ जाना......गहरा सोचने वाले और बहुत हैं...

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