Tuesday, May 1, 2012

दौंरा की सुबली..

इतने बखत बाद अब ठीक से याद नहीं कि मैं खुदे भागी थी कि हमको अगवा करके ले गए थे. बड़ी-बड़ी बज्‍जर मूंछ और राच्‍छस जैसी ऊंच काठी का एक हरमेसा मुस्‍कि‍राता रहता, हमको बहुत पसिंद था, लेकिन अकेला नहीं था, उसके संगे छौ और थे, और पांच गाड़ी भर का लाव-लश्‍कर. यहां-वहां गांव के ठिकाने मंडली जमाय के, हल्‍ला-गुल्‍ला मचाय के, हथेली पर चांदी के सिक्‍का खनकाय के, गांव के अमदीयन से सामान ढोये वाला, लाठी-बल्‍लम चलाये वाला भरती कर लेते, जबकि उनकी बोली, उनका ब्‍यौहार उधर के लोगों को कुच्‍छो बुझाता नहीं था. हम बज्‍जर मूंछ वाले का कुरती खींचके पूछीं, ई काफिला कहां जाता है, बाबू साहिब? हमको कहंवा लिये जाते हो? ऊ हरामी कुच्‍छ न बोले, हम्‍मर हाथ अप्‍पन हाथे लिये कनखी मारे, मुंहजार मुस्कियाये जाये!

खाये की दिक्‍कत (मालूम नहीं तसले में कौने का काढ़ा पकाते थे, कांसे के कटोरे में सबके बीच फिराय दिया जाता, और गांव के कम-अकिल देहात मनई, तीन मर्तबा कटोरा में उंगली डुबायें, हदबद घबराये तय करें कि कवन चीज है, खायें न खायें, कि आगे के सफर का हल्‍ला शुरू हो जाता. एक बल्‍लम धारी अपने गांव के पहिलवान रहे होंगे, भुईं पर गोड़ पटककर जम गये कि ई खाना नहीं खायेंगे, हमको हमारी खुराक दो! तो मुच्‍छल के छोट कद का एक साथी था, पीछे से पहिलवान के गर्दन पर झूलकर जवान ने छुरी से पहिलवान की गर्दन अलग कर दी!), बात-बोली की मुसीबत, दो दिन निकल जाये के बाद अब हमें घबराहट होये लगी कि घर-जंगलात से दूर कहां निकल आये, किनके संगे निकल आये.. फिर एक दिन भूखे पेट सोये रहे, या माथा में पिरानी पड़ा रहा, जाने कब तलक वहीये दशा बनल रही, होशे लउटे, आंख खुली के चेती में देखे तो दीखा सगरे लाव-लश्‍कर पानी के दहाज पर चढ़ा हुआ है! और हम्‍मन सगरे लोग बीच समुंदल में! बज्‍जर मूंछ वाले बाबू साहेब का कहींयो पता नहीं, हम ज़ोर-ज़ोर से रोये लागे, मगर हुआं दहाज के हल्‍ले में कौन हमरी रोवाई सुनता था? कोई घड़ी भर सामने ठाड़ा पड़े तो हम वही दो सब्‍द उच्‍चारते- सुबली (हमरा नाम) और दौंरा (हमरे गांव का नांव)- और आगे रोये जाते!

पीपों के सिरहाने, आंख तक चदरा गिराये, चुप्‍पे हुक्‍का गुड़गुड़ाये एक मुल्‍ला साधु रहीन, उंगली से इशारा कै के हमे नजीके बुलाये, बुदबुदाय के कुच्‍छो बोले लागे, तनी कुछ-कुछ हमरे समिझ में आया.. जौन राच्‍छस मनई के पीछे हम दौंरे से भाग आई रहीं, ऊ सब अरमैनी (आर्मेनियन) ब्‍यौपारी हव्‍वैं.. मन के मलंग और भीतरी से खूबे खूंखार.. लाव-लश्‍कर में बारह मनई हैं जिनकी पहिलही बिक्री होय चुकी है.. सुबली, बबुनी, तोहरो सौदा होय चुका!

हम भर्र-भर्र रोते रहे और नाव हम सबके जाने कवन अनजाने लिये जाती रही. जौन ठौरे पे जाके नाव लगा, ऊ अनजान देस के नाम हुआ, तिसवादी (गोवा का प्राचीन नाम).. अलग-अलग लोक अलग-अलग हाथन बिके, हमारी बिक्री जौन बड़े मालिक के हाथ हुई उन असद खान की हस्‍ती का समूचे तिसवादी में डंका था.. मगर हमरी गुलामी के अभी महीना डेढ़ महीनो न हुआ था कि टापू पर फिरंगी फौजन के भारी हमला हुआ.. दुई रात घमासान मचा रहा.. बेलांव (बेलगांव) भागे की कोशिश में हमरे मालिक धर लिये गये और अपनी जान गंवाई.. 


टापू के मुसलमान खोज-खोजके बाहिर किये गए और कवनो के जान न बख्‍शी गई. हम्‍मर मलकिनी, कुदसिया ऊरु बसाना, हमसे बोलीं, हवेली में चा‍लीस नवकर हैं, बाईस जनाना, कल बिहाने तलक कितने बचेंगे, अल्‍लो नहीं जानत हैं! हमार तो अब जे होयेगा, सो होयेगा, तू पूरब के ओतने दूर कवने देस से आई रही, हमरे हियां पनाहदार रहीं, हमें तोहार चिंता है, सुबली.. इन हरामी फिरंगन से जान बचाये का एके तरीका है कि तू फुजियान के हमरे चीनी संगी के संगे पच्छिम (गुजरात) की ओर निकल जा..

आज सोचें तो अब यकीन नहीं होता मगर ऊ रात खून और आग की होली के बीचों-बीच फिरंगियन के आंखी में धूलि झोंक के हम सच्‍चो निकल आये.. अपनी काबिल नेक मलकिनी के फैसले पर उस रात तिसवादी से न भागे होते तो आज ई कहानी सुनाये के खातिर हम जिन्‍ना न होते, बाबू..!”

पूर्वी भारत के दुर्गापुर देहात के किसी बाबा आदम ज़माने की पुरानी इमारत में (कभी दक्खिन में जेसुइट पादरी रहे, अब पूर्णकालिक अघोरी जीवन का अन्‍वेषण कर रहे) बुढ़ाते, पगलाते रिचर्ड शंकर को तोमासिनो ने अपने बूते ही खोजा था, और ये टेढ़ी, अटपट कहानी उन्‍हीं पियरायी पुर्चियों से बाहर आई थी जिसे वह पादरी के पुराने कागज़-पत्‍तरों से संधानकर लाया और अब सहेजता, धर्मशाला के सूनसान दुपहरिया में अटक-अटककर उनका इतालवी में पाठ कर रहा था. मैंने तोमास को टोककर सवाल किया, यह सब क्‍या है? इतालवी में कैसे है, क्‍यों है?

मेरे सवाल का जवाब देने की जगह तोमास मुस्‍कराने लगा, फिर रहस्‍य की हवा खींचते सूचित किया, इतालवी में नहीं, ख़ास फिरेंज़े की बोली में है, और बताता हूं फिरेंज़े की बोली में क्‍यों है.. क्‍योंकि 1510 ईस्‍वी के गोवा के गिर्द की कहानी, सुबली के जीवन का जो यह समय, सोलहवीं सदी का पूर्वार्द्ध पढ़ रहे हैं, तब इटली ही नहीं, दुनिया भर में भले वेनिस और जेनोवा की आर्थिक, राजनीतिक ताक़त का डंका बज रहा था, संस्‍कृति व भाषा की मिठास, उसका नेतृत्‍व फिरेंज़े (फ्लोरेंस) के ही हाथों था; यहां मज़ेदार यही है कि उस जबान में कोई सुबली की कहानी लिख रहा है!

मेरे कुछ भी पल्‍ले नहीं पड़ रहा था. उस नहीं पड़ने के तनाव में ही मैंने आगे कहा, आगे क्‍या है? दौंरा की सुबली रानी और क्‍या कहती हैं?”

कुछ नहीं कहतीं, कागज़ों को आगे-पीछे उलटते, तोमास ने हंसकर इत्तिला की, इससे आगे सुबली का कहीं नहीं, किसी हेम्‍ब्रम का ज़ि‍क्र है, और काल में एक सीधी 'छलांग' है; कहानी सोलहवीं सदी की शुरुआत के गोवा से सीधे अट्ठारहवीं के अंत के मसलीपट्टम पर दौड़ी चली जाती है!”

व्‍हॉट डस इट मीन?” मैंने चिढ़कर भोजपुरी में कहा.

सर को हाथों में बांधकर तोमासिनो इतालवी मुस्‍की हंसता रहा, की ल्‍लो सा!” 

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