मानिक दादा ने मुझे करेक्ट किया कि बच्चा, भूल रहे हो, हमारी जोरहाट में पहले मुलाकात हो चुकी है. मैंने सनकी बुड्ढे की कुहनी छूकर मचलते हुए कहा, ‘दादा, मैं ठेठ पूरब का बिहारी बच्चा, इतना उत्तरांतर किस जोम में जाता? आपको ग़लतफ़हमी हो रही है!’
दादा दाढ़ी का खूंटा सहलाते रहे, मेरी ओर देखा तक नहीं, बोले, ‘तुमने हांड़ी भर हंड़िया पी रखी थी, तोमको कोच्छ याद नहीं.. हम जोरहाट में मिले थे एंड से टा फ़ाईनाल, आगे बलो!’
सूखते घास की छोर पर एक नाव का अस्थि-पिंजर औंधा गिरा था, तीन बकरियां उसकी आड़ में ज़मीन का सूखा चर रही थीं, एक दुष्ट बकरी-छौना था, नाव पर चढ़ा उसे चबाने की कोशिश कर रहा था. दादा किसी भी क्षण मेरी पकड़ से छूट, अपनी में गायब हो सकते थे, इसीलिए उनसे बेमतलब की बहस में उलझने की जगह मैंने आंखें तरेरकर दूर खड़े तोमास से अपनी खीझ का इशारा किया, जाने पेल्लेग्रिनी ने क्या समझा, अगले ही क्षण वह कमर से झुका, दादा की चरण-धूलि ले रहा था. दादा एकदम खुश हो गए. उठाकर हमारे एकमात्र विदेशी मित्र को अंकवांर भर लिया. असमंजस और दुविधा में मैंने अपने दोनों हाथ पैंट की जेब में डाल लिये, फिर गौर से नाव-चढ़े बकरी-छौने का निरीक्षण करने लगा.
तोमास का कंधा थपथपाकर दादा वहीं घास पर ढुलककर बैठ गए. खादी के पुराने झोले से पंचांग सरीखा कोई पत्रा और क्वार्टर की एक बोतल बाहर किये, पत्रा तोमासिनो के हाथ थमाकर स्वयं पीने की क्रिया में न्यस्त हुए. मुझे अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि खब्ती बूढ़े को पत्रा-समेत मैं यहां तक लाने में कैसे सफल हुआ था..
“कौन ज़बान थी जिसे वह नहीं जानता था. आर्मेनी, कीरगिज़, पश्तो, बंग्ला, तुर्की, गुजराती, कोंकणी, फ्रेंच, अंग्रेजी, मांदारिन सब ज़बानों के लोगों के बीच उसका उठना-बैठना था, चुटकियां काटता-कटवाता उनकी औरतों के वह छोटे-मोटे काम करता, उन्हें भगाकर अपने देस ले जाने के उनसे मज़ाक करता, मगर किसी का वह दोस्त नहीं था- यह उसकी बूढ़ी, एक पैर से बेकार, मां कहती. मालूम नहीं किस बात का रंज था, बुढ़िया उसे देखते ही गंदी गालियां बकने लगती. और वह शैतान का सिपहसालार हमेशा हंसता रहता. मुंह से ज़हर उगलती बुढ़िया को बांहों में भरकर हवा में उछाल देता.
कहते हैं बूढ़ी ने एक बार सोते बेटे के तम्बू में अपने हाथों से आग लगा दी थी. जब लह-लह सब लहकने लगा तो खुद तंबु के भीतर चली गई, कि खत्म हो जाये सब. लैफ्टिनैंट विलियम पैरी साहब कहते, अतीत के संत्रास और भविष्य के अंधेरे ने बुढ़िया में इस तरह का दीवाना पागलपन भर दिया था.
लेकिन बुढ़िया उस रात मरी नहीं. न उसका ‘जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स’ शातिर बेटा मरा. मज़े की बात तो यह कि दसेक साल बाद, जब ग़दर के ख़ूं-खराबे का गर्द उतरना शुरु हुआ और बदले की उलट कार्रवाई में अंग्रेजों ने छांट-छांटकर देसियों की धर-पकड़ करी, सरेआम रस्सियों लटकाया, उन्हें गोलियों से भून दिया, तब भी अपनी मां के कपूत, हमारे ख़ासम-ख़ास, चौक-बाज़ार बाइयों से ठिठोली करते फिरे, इनका बाल तक बांका न हुआ!
अलबत्ता यह कहानी सच्ची ज़रूर है कि तवेर्नीयर और शर्ली की घुड़सवार टुकड़ी की ने कभी रात के सूनसान में घेरकर इन्हें एक किनारे किया, पंजों के बल खड़ा करने पर मजबूर किया था; मगर बेहया की मजाल देखिए, जवान के होश तब भी फाख्ता न हुए थे, लपकती आवाज़ में जवान ने अफ़सरों को चिंघाड़कर चुनौती दी थी, ‘हैव यू सीन मी एवर मेस्सिन विद् मुल्लास, ऑर फॉर दैट मैटर, विद् बामिन्स, एवर, हैव यू? आई एम फाइटिंग फॉर नॉ बडी, एम नॉट सेविन माई कंट्री, बिकॉज़ आई डोंट नो व्हेयर इट इज़!’
मगर कहानी यह भी है कि कलकत्ते और शांघाई के बीच चंदन की लकड़ी का कारोबार करनेवाले किसी अमीर की बेवा ने बीच-बचाव करके, या क्या मालूम पीठ पीछे अंग्रेजों को मुंहमांगी रकम खिलाकर नालायक की जान बचाई थी.
कहते हैं बाद के दिनों में बुढ़िया का दिमाग़ सचमुच चल गया था, बेटे के सामने पड़ते ही उसे झिंझोड़ती बस एक ही बात की रट लगाये रहती, कि मरने के पहले एक मर्तबा अपना घर देखना चाहती है! यह बेग़ैरत नालायक, ठहाके लगाकर जवाब देता, ‘तेरा कोई घर नहीं, बूढ़ी, मेरा कोई घर नहीं. हम बेघर-बार, बे-देश-दुआर जनम-जनम के खानाबदोश ठहरे, कपीश?’
बुढ़िया आखिरकार पागलपने में ही मरी, और उस बदहाल, तबाह, तंगी की चोट में ही मरी जब शायद उसे एक निवाला खिलानेवाला तक कोई नज़दीक न था. घर लिये जाने वाला तो नहीं ही था, जो कुछ अर्सा गुज़रे अचानक जाड़े की हाड़ कंपाती एक रात वह ग़ायब हुआ कि उसके बाद फिर कभी उसकी ख़बर न हुई.”
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3 comments:
चंदन की लकड़ी का कारोबार करनेवाले अमीर की बेवा ने उसे क्यों बचाया - उस पर पैसा खराब क्यों किया. मैया पागल सी हो गयी, और वो हँसता रहा. या कह लीजिए वो पागल हो गया और मैया हँसती रही - वो हांड़ी खाली पड़ी रही क्योंकि नाव भी उलटी थी, उलटी नाव के नीचे ही कहीं अँगरेज़ जनरल की बन्दूक पड़ी थी - जिसके गुम होने दरखास्त उसने कलकत्ता जा कर लिखवाई.... बहुत मुश्किल से,
आई हैव नेवर सीन माय कंट्री...घर कहाँ है...कोई जगह है भी जिसे अपना कहा जा सकता है...जिस मिट्टी में बड़े हुए वही घर हो जाता है क्या? विस्थापितों का कोई घर होता भी है कि नहीं? कहीं जा के बस जाने से उस मिट्टी से घर की मिट्टी की गंध आती है क्या?
पोस्ट से जाने कितने सवाल उतर कर मन से गुत्थमगुत्था हो गए...घर से भाग गए लोग हैं कि हमेशा से बेघर लोग हैं. जाने कैसे हैं.
अजीब तरह से उलझा गयी पोस्ट मुझे...परेशान हुयी बैठी हूँ.
@बाबा, ऐसा?
कहानी में कहानी गुम, अरे?
@पूजा,
परेशान हुई बैठने के बाद, चलिए, अब ठड़ी हो जाइए. अऊर भी पब्लिक है, बैठे की जगह की कमी है.
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