Friday, May 4, 2012

मुहाने में, भोजपुरी..

घरों की अपनी कोई महक होती है ? नया होने में, उनके पुरानेपन की ? सूने और परित्‍यक्‍त मकान के गर्दधुले नीम अंधेरे रंजन दीवार से लगा धीमे-धीमे चलता रहा । चेहरा कुछ दीवार की ओर झुका । मानो अपनी ही नज़र बचाये, सचमुच ही किसी पुरानेपन की महक की टोह लेता हो । क्‍या मालूम कोई महक तैरती ही हो इन दीवारों पर, इस हवा में ? यह इस दीवार के पीछे क्‍या है ? क्‍या है उधर उस अंधेरे में ?

‘अन्‍हारा में का होई, अन्‍हारा में अन्‍हारा बा, एने ओने सगरे.. एतना बखत ले सूंघतारा तहरा बुझात नइखे ?’

दीवार की ओर पीठ करके रंजन एकदम थिर हो गया । किसकी आवाज़ है इस निर्जन में ? चाभी सौंपते हुए चंद्रिका ने तो यही कहा था बड़ा धूल-धक्‍कड़ होगा, बाबू, केतने टाइम से हम्‍मो उधर झांकने नहीं गए हैं, कहिए तो केहू के संगे कर दें ? चाभी लेकर मुट्ठी में भींचते हुए रंजन ने ही अकेले आने की ज़ि‍द की थी । लेकिन था अकेला ?

आने की ज़रूरत ही क्‍या थी ? इतने वर्षों नहीं आकर नहीं चल रहा था जीवन ?

‘नाहींये चलत रहुए, पूछ हमरा से ! अऊर ना अउत हियां त कहंवा जइत, ई पूछ अपना से ? कउनो ठेकाना छेंकले रहुअ, मन के मोह के कवनो दूसर पाता, अं ?’

दीवार पर एक बिस्‍तुइया दौड़ जाती है । बिस्‍तुइया और उसके सिवा उस सूने फैलाव में और कोई नहीं । रंजन दीवार से लगा धीरे-धीरे चलता है । माथे में अभी भी महिला का महीन स्‍वर गूंजता, बज रहा । रंजन डर नहीं रहा । संकोच व शर्म का अहसास हो रहा हो सो अलग बात है, डर वह कतई नहीं रहा ।

‘हमरा से कवनो छुपल बा,’ फिर वही आवाज़, कौन ? किसकी ? ‘जानतनि, डेराइल तू खाली अपने से जानेल.. जइसे नंदकिसोर भइया रहुअन, बाघ-बिलार केहु से कहंवा डेरात रहुअन ? बस एक कोना अन्‍हारा उनका अकेला छोड़ द त तड़ देना चेहरा उतर जात रहुए, पसीना छोड़े लागत रहुअन,’ और फिर एकदम से महीन हंसी । फिर ख़ामोशी । फिर एक लम्‍बी सांस ।

‘तहरे जइसन ऊहो कहंवा केहू के संगत में रहत रहुअन । हरमेसा अकेले । चुपाइल पटाइल । अगवा चाह रख द त पी लीहें, मत रख त अइसन शायदे होई कि अपना से पूछिहें.. मेहरारुओ उनकर जे त जनाना भेंटाइल रहुए, आह रे भगवान..’ फिर वह लम्‍बी सांस ।

किस नंदकिशोर भैया की बात हो रही है ? रंजन किसी नंदकिशोर भैया को नहीं जानता । इस पुराने जर्जर मकान से जुड़ी रंजन की यादों से अलग इस मकान के और भी इतिहास हैं ?

‘नगीना, पूरनचन्‍न, मैना दीदी, बेनी बाबू के के केतना न जतन कइल हा, लेकिन भइया केहू के बात सुनत रहुअन ? ना सुनले । निकल गइले । जइसे तू निकल गइल रहुअ, बऊआ.. आइलो बाट त हमरा काजे आइल हव्‍व ? ना, अपना संगत में बाट, अपने संगत में निकल जइब, कह, बऊआ, झूठ कहतानिं ?’


यह तो काफ़ी वर्षों बाद रंजन के बात समझ आई कि वह उस जर्जर खस्‍ताहाल संसार में वापस फिर कभी लौटकर गया ही नहीं था.

3 comments:

  1. वाकई नहीं गया था...या वहीं अटका रह गया था? कभी वहां से चला ही नहीं था.

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  2. @रउअे बताईं, पड़िताइन जी..

    ज्ञान-गरभ बंगलोरे में छेकाइल बाटे, ना?

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  3. रउआ ई बताई ,चुपाईल पटाईल ई सब खुराफात भुलाए आऊर भूले के ? एतना बकत के कौनों कहानी काहे ला सबके याद दिलावल बाटे जारू बा का ?

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