Tuesday, May 8, 2012

ऐ रंजन, अबे से रंजन..

फिर एक पुरनका पाडकास्टिन है.. बिकास-बिनोद चुगलबंदी.. प्रसंग, माचिस खोजाई के बहाने जीवन की निस्‍सारता का है..

8 comments:

  1. आप अपने आप में एक संग्रहालय हैं सर. समझ में आया की ना यहाँ माचिस खोया है, ना बीडी का मुठ्ठा... ना गाय खुली है बल्कि इसके बहाने कुछ और ही खोजा जा रहा है. आपकी पॉडकास्ट अपने आप में एक भरी पूरी दुनिया होती है. जीवन के सारे रंग प्रतीक के रूप में मौजूद हैं.

    I love you sir... love u..

    ReplyDelete
  2. @सागर पुरानिक,
    बीकास लाल का जोगदान भूलाय रहे हो.. एगो अमदी के काम नै है, चुगलबंदी है..

    ReplyDelete
  3. सर, मुझे लगा था वो हैं यहाँ... उनके एक ब्लॉग परिकथा पर मकान भी सुना था... अद्भुत... मुझे लगता है आपकी आवाज़ और नज़र का खजाना ही मेरे मन को भरता है.

    ReplyDelete
  4. भारत ही नहीं दुनिया के हर देश का यही हाल है! अद्भुत जी! कहां-कहां के रंग हैं इस पाडकास्ट में।

    ReplyDelete
  5. कमाल है भाई!! माचिस से शुरू हुई जुगलबंदी बोरों, सरकारी कामकाज, सास की तीर्थ यात्रा, गाना सुनते और तमाम भड़ास निकालते हुए फिर माचिस पर आ गयी :) दुनिया खुद के गोल होने का कितनी तरह से अहसास कराती है न?
    एकदम इन्द्रधनुषी बातचीत :)

    ReplyDelete
  6. @सुरकिरिया, बंदनाअबस्‍थीजी दुबेजी..
    मगर अइसन गरमी में का इन्‍नरधनुस का बात करती हैं..

    ReplyDelete