Wednesday, May 9, 2012

पानी, शायद..

शुक्‍ला कहती है एइ जागा छेड़े आमरा आर कोथाये चोले जेते पारी, शोब दिनेई कनो नतून झामेला, क्‍या ज़रुरत है यहां बने रहने की, मुझे नहीं पसन्‍द, तुम समझते क्‍यों नहीं?

मैं नहीं समझता. यही तो एक शहर है जिसे हम ज़रा पहचानते हैं (वह भले हमें पहचानने से इंकार करता रहा हो, बट स्टिल..), घर से निकलकर तीन ठिकाने हैं जहां जा सकते हैं, जो इतने वर्षों से हमें संभाले हुए है, यहां से निकलकर फिर कहां जाएंगे, और जाना हुआ ही तो क्‍या गारंटी है कि वहां झमेले न हों? हो सकता है यहां की बनिस्‍बत और ज़्यादा हों, तब!

लेकिन यह भी सच है कि यहां शहर हमारी नाक से ऊपर चढ़ चुका है. इस पर प्रतिक्रिया के लिहाज़ से शुक्‍ला और मुझमें फर्क़ इतना ही है कि मैं सर के पीछे बांहों में गमछा ताने शहर की ओर पीठ करके उसे अनदेखा करने लगता हूं, शुक्‍ला खिड़की में धंसी अपनी साड़ी के आंचल पर तक़लीफ़ों का डेफिसिट दर्ज़ करती रहती है.


किंतु कोथाय जाबे, बलो त? मैं सिर्फ़ कहने के लिए कहता हूं. शुक्‍ला भी जानती है इसीलिए झटके में सन्‍न नज़रों से एक बार मुझे देखकर उतनी ही तेज़ी से मुंह फेर भी लेती है. मानो इस एक बेमतलब, टुटपुंजिये वाक्‍य को हवा की रस्‍सी पर टांगते हुए, जीवन किसी सूरत जीये चले जाने के दर्शन का मैं पैशनेट पक्षधर हो रहा हूं!

जबकि सच्‍चाई ऐसी है नहीं. जबकि सच्‍चाई मगर फिर पता नहीं कैसी है.

बिजली जाती रहती है. पानी आता नहीं रहता. कभी एकदम ही नहीं आता.

सुबह शुक्‍ला से कहता हूं उठो शुक्‍ला. शुक्‍ला कहती है आया? मैं कहता हूं नहीं आया, लेकिन आ जाएगा, उठो भी. शुक्‍ला मुझे परे धकेलकर वापस चादर खींचकर उसमें चेहरा छिपा लेती है. मैं चादर खींचकर एकदम उसकी पीठ पर गिरा उसकी गरदन चूम लेता हूं, मगर फिर वैसी ही फुर्ती से उल्‍टे हाथ होंठों से गर्द का स्‍वाद पोंछने भी लगता हूं. तर्जनी से मुझे पीछे ठेलकर शुक्‍ला मुस्‍कराने लगती है.

हद है यार, क्‍या जीवन है, यही है? इसी में समाये हम बड़े होंगे, बूढ़े होंगे? यही बिना पानी का देश आया हमारे हिस्‍से, मग गिन-गिनकर पैर और पीठ पर गिराते रहने का जीवन हमारा जीवन हुआ?

हां, यही हुआ, गरदन और पीठ पर गर्द सजाने का मेरा और उसे चूमकर धन्‍य होते रहने का तुम्‍हारा, शुक्‍ला कहती और हंसने लगती.

इसीलिए लोग अपना घर, देश छोड़कर पराये अजनबी संसारों में भाग जाते होंगे कि बेमुरव्‍वत हौंकता अकेलापन होगा, जलालत होगी लेकिन कम से कम मई के महीने में पैर पर गिराने को पानी तो होगा, झुलसते देह पर चलाने को बिजली का पंखा?

शुक्‍ला का चेहरा संजीदा हो जाता, कहती चलो हम भी भाग जायें, मेरी बाली बेच दो, मेरा हार, मेरा सब.. मैं शुक्‍ला को बांहों में लिये अपना चेहरा उसके गरदन में छिपाकर कहता मैं पहले ही भागा हुआ हूं, शुक्‍ला, और आंखें मूंदकर फिर उसके लिए अंग्रेजी में जर्मनी के आप्रवासी मज़दूरों के जीवन की एक डॉक्‍यूमेंट्री की शुरुआती पंक्तियां बुदबुदाने लगता..

“I leave my home In what people call a moderate climate. The sulking wolf from the North watches me go. My sons are growing up. I am a man, It seems.. journeying In my mind when I'm standing still. Marking time when I'm moving. I go from face to face. In the slush of overproduction, disdain.. madness and profit-making. I know that even those who want to die.. would rather live. I believe..” 


2 comments:

  1. बड़ी वेधक चीजें पढ़ने को मिलीं आज आपके यहां।... और किसी डॉक्युमेंट्री में ऐसी फिलॉसफिकल लाइनें हो सकती हैं, कल्पना नहीं कर पा रहा हूं।

    ReplyDelete