Tuesday, May 15, 2012

कामरेड फिदेल और मेरा परिवार..

मिरोस्‍लाव क्रलेज़ा (1893-1981) 
कक्षा की घंटी लगते ही पहला काम हुआ कि गिलेर्मो, हेरनान, अमादो, चिकिता, मारिसा सबने हंसते-हंसते डेस्‍क पर अपना गृहकार्य निकालकर बाहर किया, सौहार्दपूर्ण चुहल में अटकते-दौड़ते, मास्‍टर की मेज़ तक अपना खाता पहुंचाकर आपस की आनंदी फुसफुसाहटों में मझे-बझे रहे. जबकि मेरी घिग्घी बंधी थी. मरी मुर्गी की तरह मुर्दा पड़ी अपने खाली खाते पर हाथ बांधे मैं अपनी मौत की घड़ि‍यां गिन रहा था. वैसे मेरा खाता पूरी तरह खाली नहीं था. गृहकार्य के निबंध का शीर्षक ‘मेरा देश’ की सुघड़ लिखाई (रंगीन खड़ि‍या और पेंसिल से जिसे मैंने लिखा था) के नीचे चूल्‍हे की जली लकड़ी के काले से बड़ा अंडा खिंचा हुआ था (यह गंदी पुताई मेरे पिता की 'करतूत' थी). गलती मेरी ही है. मुझे मदद मांगने पिता के पास जाना ही नहीं चाहिए था. मां भी जब मांगना होता है, गांव के दूसरे दरवाज़े खटखटाती है, पिता से कभी कहां मांगती है. पिता खुद भी अपने से कुछ नहीं मांगते. लेकिन खाली पृष्‍ठ के ऊपरी हिस्‍से में काफी मेहनत और तल्‍लीनता से शीर्षक लिखने का काम खत्‍म करने के बाद ‘मेरा देश’ जैसे विषय की अमूर्त भव्‍यता की सोचते हुए मेरे कमज़ोर माथे के हाथ-पैर फूलने लगे थे, शायद इसीलिए मैं घबराया हुआ पिता के पास गया था. वैसे भी खिड़की पर खाली बैठे हुए वह बाहर के उचाट खालीपन को घूर रहे थे, निबंध का शीर्षक देखकर एकदम से उनका पारा चढ़ गया, भागकर चूल्‍हे की ज़रा सुलगती लकड़ी जो वह अपनी सिगरेट जलाने के लिए लेकर आये थे, पैंट की फटी जेब और रसोई की मेज़ पर पिछले हफ्ते के तहाये अख़बार कहीं भी जिसके न मिलने पर पिता का बावलापन उनकी नाक तक चढ़ आया, गुस्‍से में लकड़ी वापस चूल्‍हे में फेंकने की बजाय मेरा खाता खींचकर, निबंध के शीर्षक के नीचे अंडे की गंदी तस्‍वीर खींच, खाते को उन्‍होंने हवा में उछाल दिया. मैं रोने लगा. पिता उचककर वापस खिड़की पर चढ़े बड़बड़ाने लगे, मेरा देश मेरा देश, घंटा कहीं नहीं है मेरा देश, मुट्ठी भर कामरेड हैं और दलाल पूंजी का एक गिरोह है, उनके बीच का समझौता, उनका देश है ये, हमारा तुम्‍हारा इसमें कहीं कुछ नहीं है, ते एंतियेंदो, चिको?

मगर मैं नहीं समझा, रोता रहा. घर पर मां होती तो शायद समझती. घर पर मां होती तो शायद यह हादसा भी न घटता. मगर कामरेडों की धमकी के बाद गांव के लोगों ने जब से पिता से काम कराना बंद कर दिया है मां घर पर रहती कहां है. और जब रहती है तो आपे में नहीं रहती. पिता का कागज़-पत्‍तर उठाकर भागती चूल्‍हे में जलाने जाती है, कि सुधर जाओ, या एक दिन मैं ही इस चूल्‍हे में कूदके जल मरुंगी तब चलाना जीवन अपनी मर्जी से, घर में दो छोटे-छोटे बच्‍चे हैं, आगे की उनकी पूरी जिंदगी है, मगर तुम कहां क्‍यों चेतोगे? मैं चुपके से बुदबुदाकर मां को याद दिलाता कि दो कहां, अब एक ही है मां, पेद्रिनो तो बीमारी और इस घर की भुखमरी में कब का काल-कवलित हुआ, मगर मां पर टूटकर गिरते, उसके हाथों से अपना कागज़ छीनने को झगड़ते पिता के गुस्‍से में मेरी सुनवाई कहां किसके बीच होती! माल एदुकादो, म्यिेर्दा, मे कागो इन दीयोस के हल्‍ले में कभी पिता का हाथ जल जाता, कभी कुछ कागज़ बच भी जाते. उन्‍हीं बचे कागज़ों में से एक पुरची थी लिथुआनियन लेखक सॉलियस कोंद्रोतास के अपना या मालूम नहीं किसका देश की आत्‍मस्‍वीकृति का, जिसे मूल लिथुआनियन में पढ़कर पिता सुना रहे थे, मैं पुर्चगाली तर्जुमे में उसे नहीं समझने की ज़ि‍द कर रहा था, “I do not believe that one can escape one’s origins. I am obviously not a patriot; I do not care about the fate of Lithuanians.. and yet I cannot stand completely outside. I cannot escape the fact of being Lithuanian. I speak Lithuanian; I also believe that I think Lithuanian.”

इतना पढ़कर पिता फिर उदास हो गए. बाहर के निचाट खालीपने में आंखें गड़ाये बकते रहे. उठते-बैठते, चार लोगों के बीच हंसते, किसी की मरनी में चोट खाये दारु पीकर पहुंचे तुम देश की नहीं सोचते, जीवन के चार पल चैन से कैसे निकल जायें की चिंता में रहते हो, मगर यह देश जो तुम्‍हारे खून में घुसा धम्‍म् धम्‍म् बजता रहता है उसको तुम किस निबंध में लिखोगे, कैसे लिखोगे, वो सिड़ी मास्‍टर तुम्‍हारा क्‍या समझेगा? मिरोसलाव क्रलेज़ा तक इस गहरी गुत्‍थी, राष्‍ट्रीयता का क्‍या समूह है, इसके बीच कैसे गुम हैं हम की कोई वाजिब पहचान कर पाये थे? नहीं, आह भरते थे और दीवानी पंक्तियां लिखते थे!

“(It’s just) a nostalgia born of pure subjectivity, the recollection of youth that is long past! Memories of military service, of flags, war, the sound of the bugle, uniforms, the days of yesteryear, memories of carnival and of bloody fighting, a whole theatre of memory that seems much more interesting than the reality. Nationality consists in large measure of the dreams of individuals who imagine a better life here below; for an intellectual, it is a childhood completely filled with books, poems, and works of art, books read and paintings contemplated, wild imaginings, conventional lies, prejudices, very often an incredibly acute perception of stupidity, and an unspeakable quantity of blank pages. Nationality, in bad, patriotic, sentimental, maudlin poetry, consists of women, mothers, childhood, cows, pastures, prairies, a material condition into which we are born, a miserable, backward patriarchal state in which illiteracy is mixed with moonlight.. Children learn from their fathers what their father learned according to the law of tradition, namely that their own nation is ‘great’, that it is ‘glorious’, or that it is ‘unhappy and weighed down’, imprisoned, duped, exploited, and so on.”

(बाकी..)

1 comment:

  1. So many things to identify with in this post with one of its labels as साहित्यिक झोला!

    Worth reading again and again!
    Thanks!!!

    ReplyDelete